यशवंत गंजीर- कुरुद। कलम और संवेदना के एक स्वर्णिम युग का अंत हो गया है। प्रख्यात साहित्यकार एवं वरिष्ठ पत्रकार रंजीत भट्टाचार्य अब हमारे बीच नहीं रहे। 74 वर्ष की आयु में रायपुर के एक चिकित्सालय में उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ ही छत्तीसगढ़ के साहित्यिक आकाश का एक जाज्वल्यमान नक्षत्र ओझल हो गया है।
उल्लेखनीय है कि, रंजीत भट्टाचार्य केवल समाचारों के लेखक नहीं थे, बल्कि वे शब्दों के पारखी और भावनाओं के चितेरे थे। उनकी लेखनी ने जहाँ पत्रकारिता को मर्यादा और प्रखरता दी, वहीं साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने जीवन के अनछुए पहलुओं को अपनी कृतियों में पिरोया। उनके दो चर्चित उपन्यास 'पाव बनिहार' और 'अबूझमाड़ का अतिथि' है। इसके अतिरिक्त उनके अनेक कविता संग्रह, गजलें और कहानियाँ समाज के यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं का जीवंत दस्तावेज हैं।
पत्रकारिता का एक दीर्घ तपस्वी सफर
वर्ष 1978 में अपने मित्र रामबिलास अग्रवाल के साथ 'अपना मोर्चा' साप्ताहिक से शुरू हुआ उनका सफर, पत्रकारिता की मर्यादाओं को गढ़ने वाला रहा। 'हरिभूमि' के धमतरी ब्यूरो कार्यालय में उन्होंने 21 वर्षों तक संपादन के दायित्व को एक मिशन की तरह निभाया। वे उन पत्रकारों में से थे जिन्होंने कई नवांकुरों को पत्रकारिता के गुर सिखाए और उन्हें इस क्षेत्र में प्रतिष्ठित किया।
मृत्यु के बाद भी 'अमर': देहदान का संकल्प
भट्टाचार्य जी का जीवन जितना महान था, उनकी विदाई भी उतनी ही प्रेरणादायी रही। उन्होंने अपने जीवनकाल में ही नेत्रदान और देहदान का संकल्प लिया था। उनके पार्थिव शरीर को रायपुर मेडिकल कॉलेज को सौंप दिया गया। समाज को शब्दों से रोशन करने वाली उनकी आँखें अब किसी और के जीवन में उजियारा भरेंगी और उनकी देह चिकित्सा विज्ञान के काम आएगी।
महापौर, साहित्यकारों और वरिष्ठ पत्रकारों श्रद्धांजलि
कलम रुक गई है, शब्द मौन हैं, पर उनके द्वारा रचित साहित्य की गूँज फिजाओं में सदैव जीवित रहेगी। धमतरी के महापौर, साहित्यकारों और वरिष्ठ पत्रकारों ने उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित की है। हरिभूमि परिवार और संपूर्ण प्रबुद्ध वर्ग उनके इस आकस्मिक वियोग से शोकाकुल है।









