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राज्य में कामकाजी लोगों यानी वर्किंग पापुलेशन बढ़ती जा रही है।  ताजा अनुमानों से साफ है कि शहरी और औद्योगिक जिलों में रोजगार के अवसर तेजी से बढ़े हैं।

रायपुर। छत्तीसगढ़ में 2011 की जनसंख्या के आधार पर हमने पिछली रिपोर्ट में बताया था कि राज्य में ऐसे लोगों की संख्या कितनी है जो धनराशि या पैसा अर्जित करने वाला कोई काम नहीं करते, इनमें 14 साल से लेकर 60 साल तक के लोग शामिल थे, लेकिन अब हम तस्वीर का दूसरा पहलू सामने ला रहे हैं, जिससे पता लगता है कि राज्य में मेहनत मजदूरी करने वालों और अपनी पूरी क्षमता से काम करने वाले राज्य को कर्मठ छत्तीसगढ़ बना रहे हैं। 

राज्य में कामकाजी लोगों यानी वर्किंग पापुलेशन बढ़ती जा रही है।  ताजा अनुमानों से साफ है कि शहरी और औद्योगिक जिलों में रोजगार के अवसर तेजी से बढ़े हैं, जबकि वनांचल और दूरस्थ इलाकों में यह रफ्तार अभी भी धीमी है।

औद्योगिक जिलों में मजबूत स्थिति
कोरबा (6.28 लाख), रायगढ़ (5.75 लाख) और जांजगीर-चांपा जैसे जिले भी रोजगार के प्रमुख केंद्र बने हुए हैं। कोरबा में ऊर्जा उत्पादन और रायगढ़ में उद्योगों के चलते रोजगार के अवसर अधिक हैं। हालांकि जांजगीर चांपा राज्य का ऐसा जिला है जहां सिंचाई के साधन सबसे अधिक है। यहां धान का उत्पादन भी राज्य में सबसे अधिक होता है। रायगढ़ जिले में हस्तशिल्प, कोसा उत्पादन, धागा निर्माण वगैरह का काम भी काफी होता है जो यहां के लोगों को कामकाजी बनाने में मददगार होता है।

सामाजिक-आर्थिक असर
आर्थिक गतिविधियां तेजः जहां वर्किंग पॉपुलेशन ज्यादा है, वहां बाजार और उद्योग तेजी से बढ़ते हैं। पलायन का दबावः कम रोजगार वाले जिलों से लोग बड़े शहरों की ओर पलायन करते हैं। ज्यादा रोजगार वाले जिलों में आय और जीवन स्तर बेहतर है। बस्तर जैसे क्षेत्रों में रोजगार सृजन बढ़ाना राज्य के लिए बड़ी चुनौती है।

नारायणपुर, बीजापुर और सुकमा सबसे पीछे
नारायणपुर में सबसे कम करीब 76 हजार लोग ही कामकाज में लगे हैं। इसके अलावा बीजापुर (करीब 1.51 लाख) और सुकमा (लगभग 1.47 लाख) में भी वर्किंग पॉपुलेशन कम है। इन जिलों में बुनियादी ढांचे की कमी, सीमित उद्योग और भौगोलिक चुनौतियां प्रमुख कारण हैं। बस्तर संभाग के इन तीन जिलों में ज्यादातर लोग पारंपरिक रोजगार, वनोपज के भरोसे अपने रोजगार का जुगाड़ करते हैं।

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