रायपुर। छत्तीसगढ़ में मार्च से नक्सलवाद का पूरी तरह सफाया हो चुका है। खुद सरकार ने राज्य को नक्सल मुक्त घोषित भी कर दिया है। इसके बाद भी सरकार नक्सल प्रभावित क्षेत्रों ने में सतर्कता और निगरानी कम नहीं की है। यही कारण है कि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया और उसके छह सहयोगी संगठनों पर एक साल का प्रतिबंध बढ़ाया गया है। खास बात ये है कि नक्सलवाद को चरम पर पंहुचाने और उसकी सभी तरह की गतिविधियों को संचालित करने में यही संगठन सक्रिय और प्रभावी भूमिका निभा रहे थे।
राज्य सरकार के गृह विभाग ने किया है। यह प्रतिबंध 12 अप्रैल 2026 से प्रभावी हो गया है। दिलचस्प यह है कि यह निर्णय ऐसे समय में आया है, जब हालिया जमीनी रिपोर्ट्स और सरकार के दावों के अनुसार, मार्च महीने में ही नक्सली विचारधारा और उनके दलम का प्रभाव लगभग समाप्त हो चुका है। बड़े कमांडरों और नेताओं के आत्मसमर्पण के बाद जहां संगठन के खत्म होने की बात कही जा रही थी, वहीं सरकार ने सुरक्षा के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाते हुए एहतियातन यह कदम उठाया है।
लोक शांति को खतरा
सरकार मानती है, इन संगठनों के क्रियाकलाप सार्वजनिक व्यवस्था और विधि द्वारा स्थापित संस्थाओं के कार्यों में बाधक बन रहे हैं। जानकारों का मानना है कि मार्च में नक्सली तंत्र के ध्वस्त होने के बाद भी सरकार किसी भी प्रकार की 'स्लीपर सेल' या पुनर्गठन की संभावना को सिरे से खारिज करना चाहती है। शासन के इस कड़े रुख से साफ है कि जब तक नक्सलवाद की जड़ें पूरी तरह से समाप्त नहीं हो जातीं, तब तक सुरक्षा एजेंसियां किसी भी ढील के पक्ष में नहीं हैं। सरकार का मानना है कि इनका संगठनात्मक ढांचा अब ध्वस्त हो चुका है। सरकार के मुताबिक, नक्सली पदानुक्रम अब पूरी तरह से टूट चुका है।
शीर्ष नेतृत्व का अंत
भाकपा (माओवादी) के महासचिव बसवराजू की अबूझमाड़ में एक मुठभेड़ के दौरान मौत को नक्सली विचारधारा की कमर टूटने का निर्णायक मोड़ माना गया है। हाल ही में दंडकारण्य जोनल कमेटी के 12-14 प्रमुख कैडरों सहित सैकड़ों नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संसद में जानकारी दी कि नक्सलियों की पोलित ब्यूरो और केंद्रीय संरचना लगभग पूरी तरह से बिखर चुकी है।
नक्सलमुक्त घोषित प्रमुख क्षेत्र
छत्तीसगढ़ सरकार और केंद्र ने कुछ समय पहले ही राज्य के सबसे दुर्गम माने जाने वाले इलाकों को नक्सल-मुक्त घोषित किया है। अक्टूबर 2025 में इन क्षेत्रों को आधिकारिक तौर पर नक्सल आतंक से मुक्त घोषित कर दिया गया था। मार्च 2026 तक बीजापुर को 'अंतिम युद्ध का मैदान' माना जा रहा था, लेकिन 8 अप्रैल 2026 की समीक्षा के बाद बीजापुर सहित देश के किसी भी जिले को अब 'नक्सल हिंसा प्रभावित श्रेणी में नहीं रखा गया है।
इन संगठनों पर बढ़ी पाबंदी
सरकार ने छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा अधिनियम, 2005 की धारा-3 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए इन संगठनों को विधि विरुद्ध घोषित किया है। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी), दण्डकारण्य आदिवासी किसान मजदूर संघ, क्रांतिकारी आदिवासी महिला संघ, क्रांतिकारी आदिवासी बालक संघ, क्रांतिकारी किसान कमेटी, महिला मुक्ति मंच, आरपीसी अथवा जनताना सरकार। राज्य सरकार के गृह विभाग के मुताबिक भले ही बड़े स्तर पर आत्मसमर्पण हुए हों, लेकिन इन संगठनों के सदस्यों द्वारा शहरी क्षेत्रों में पैठ बनाने की कोशिशें शांति के लिए खतरा बनी हुई हैं।
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