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बीजापुर जिले के नक्सल प्रभावित डुमिरपालनार समेत 4 गांवों में 56 साल बाद सड़क, पानी और बुनियादी सुविधाएं पहुंचीं, ग्रामीणों में विकास की नई उम्मीद जगी।

गणेश मिश्रा- बीजापुर। छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के सुदूर और कभी नक्सलियों के गढ़ माने जाने वाले गांवों में अब बदलाव की बयार बहने लगी है। दशकों से उपेक्षा और भय के साये में जी रहे डुमिरपालनार, दुगाल, हिरोली और करका जैसे गांवों तक आखिरकार विकास पहुंच गया है। 56 सालों के लंबे इंतजार के बाद अब इन गांवों में सड़क, शुद्ध पेयजल और मूलभूत सुविधाओं की शुरुआत ने ग्रामीणों के जीवन में नई उम्मीद जगा दी है।

गौरतलब है कि, बीजापुर जिले के बुरजी पंचायत अंतर्गत आने वाले आश्रित गांव डुमिरपालनार, दुगाल, हिरोली और करका पिछले करीब 56 वर्षों से नक्सलवाद और सरकारी उपेक्षा का दंश झेलते रहे। एनएमडीसी की खदानों के पास बसे होने के बावजूद इन गांवों के ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं से वंचित थे।

बरसात के पानी को तिरपाल में इकट्ठा कर उपयोग करने को थे मजबूर 
ग्रामीणों की स्थिति इतनी बदहाल थी कि, वे पीने के लिए एनएमडीसी से निकलने वाले आयरन युक्त लाल पानी और बरसात के पानी को तिरपाल में इकट्ठा कर उपयोग करने को मजबूर थे। सड़क, स्वास्थ्य और राशन जैसी सुविधाएं उनके लिए किसी सपने से कम नहीं थीं।

नक्सलियों ने यहां अपना बना रखा था सेफ जोन 
स्थानीय लोगों के अनुसार, एक साल पहले तक यह पूरा इलाका नक्सलियों का कोर जोन था। बीजापुर और दंतेवाड़ा की सीमा पर स्थित होने और एनएमडीसी की लोह अयस्क खदानों के पास होने के कारण नक्सलियों ने यहां अपना सेफ जोन बना रखा था। यहां ट्रेनिंग कैंप चलाए जाते थे और आदिवासी युवाओं को गुमराह कर हथियार थमाए जाते थे।

अब यह क्षेत्र हो चुका नक्सलमुक्त 
लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। सुरक्षा बलों की कार्रवाई और प्रशासनिक पहल के बाद यह क्षेत्र नक्सलमुक्त हो चुका है। इसके साथ ही सरकार ने भी विकास कार्यों की शुरुआत कर दी है।

55 साल बाद पहुंच रही सड़क 
करीब 55 साल बाद पहली बार इन गांवों तक सड़क पहुंच रही है। सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि अब ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल मिल रहा है, जिससे उन्हें वर्षों पुराने जल संकट और दूषित पानी की समस्या से मुक्ति मिली है।

स्वास्थ्य सेवाएं भी धीरे-धीरे सुलभ हो रही
इसके अलावा अब गांवों तक राशन वितरण की सुविधा भी पहुंचने लगी है और स्वास्थ्य सेवाएं भी धीरे-धीरे सुलभ हो रही हैं। ग्रामीणों को अब छोटी-छोटी जरूरतों के लिए लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ रही। ग्रामीणों का कहना है कि, अब उन्हें लगने लगा है कि वे भी देश की मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं। नक्सलवाद के खौफ और बुनियादी सुविधाओं के अभाव से निकलकर अब ये गांव विकास की राह पर आगे बढ़ रहे हैं।

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