केंद्र सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव से महिला आरक्षण लागू करने की तैयारी में है। इसके तहत बिहार में लोकसभा की सीटें 40 से बढ़कर 60 और विधानसभा की सीटें 365 हो सकती हैं।

Bihar News: बिहार की राजनीति में आने वाले कुछ वर्षों में एक बड़ा सांगठनिक और संवैधानिक बदलाव देखने को मिल सकता है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव से 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (महिला आरक्षण कानून) को जमीन पर उतारने के लिए गंभीर नजर आ रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सहयोगी और विपक्षी दलों के साथ इस कानून को लागू करने के रोडमैप पर मंथन शुरू कर दिया है। सरकार का प्रस्ताव है कि सीटों की संख्या को 50 प्रतिशत तक बढ़ाकर महिलाओं के लिए एक-तिहाई भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

कानून में संशोधन की तैयारी
मौजूदा कानून के अनुसार, महिला आरक्षण नई जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू हो सकता था। लेकिन विपक्षी दलों के दबाव और जल्द कार्यान्वयन की मंशा को देखते हुए सरकार अब 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023' में संशोधन करने पर विचार कर रही है।

नए प्रस्ताव के तहत 2011 की जनगणना को ही आधार बनाकर सीटों का विस्तार किया जा सकता है। यदि संसद के मौजूदा सत्र में इस संशोधन पर सहमति बन जाती है, तो परिसीमन की प्रक्रिया में तेजी आएगी और 2029 के आम चुनाव नए स्वरूप में होंगे।

40 की जगह 60 लोकसभा सीटें
इस नए फॉर्मूले का सबसे बड़ा असर बिहार की सीटों पर पड़ेगा। वर्तमान में बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं, जो बढ़कर 60 हो सकती हैं। आरक्षण लागू होने के बाद इन 60 सीटों में से 20 सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित होंगी।

इसी तरह, 2030 के बिहार विधानसभा चुनाव में विधायकों की संख्या 243 से बढ़कर 365 होने का अनुमान है। इन 365 विधानसभा सीटों में से लगभग 122 सीटों पर महिला विधायक चुनकर सदन पहुंचेंगी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीति का केंद्र रही महिलाओं के लिए यह अब तक का सबसे बड़ा अवसर होगा।

किसके हाथ लगेगी कमान?
सीटें बढ़ने और आरक्षण मिलने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इसका लाभ जमीन से जुड़ी 'जीविका दीदियों' और आम महिला कार्यकर्ताओं को मिलेगा? वर्तमान में बिहार से जो 5 महिला सांसद दिल्ली गई हैं, वे सभी किसी न किसी बड़े राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखती हैं।

इनमें मीसा भारती (लालू यादव की बेटी), शांभवी चौधरी (अशोक चौधरी की बेटी), वीणा देवी (दिनेश सिंह की पत्नी), लवली आनंद (आनंद मोहन की पत्नी) और विजयलक्ष्मी देवी (रमेश सिंह कुशवाहा की पत्नी) शामिल हैं। ऐसे में चुनौती यह होगी कि बढ़ी हुई सीटें कहीं केवल नेताओं की पत्नियों, बेटियों और बहुओं तक ही सीमित न रह जाएं।

नीतीश कुमार की 'दिल्ली रवानगी' और बिहार का भविष्य
चर्चा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार की कमान छोड़कर राज्यसभा के जरिए दिल्ली की राजनीति में सक्रिय हो सकते हैं। उनके शासनकाल में बिहार ने पंचायतों में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण देकर एक मिसाल पेश की थी। अब विधानसभा और लोकसभा में सीटों की बढ़ोतरी उनके 'महिला सशक्तिकरण' के एजेंडे को एक नए मुकाम पर ले जाएगी।

2025 के विधानसभा चुनाव में भी जिस तरह से राजनीतिक परिवारों की फौज जीतकर आई है, उसने इस बहस को और तेज कर दिया है कि क्या महिला आरक्षण वास्तव में आम महिलाओं को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा पाएगा।