पटना : बिहार में राज्यसभा चुनाव की सरगर्मी के बीच एआईएमआईएम (AIMIM) ने किंगमेकर की भूमिका निभाकर सबको चौंका दिया है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के पांच विधायकों ने आरजेडी उम्मीदवार अमरेंद्र सिंह को वोट देने का ऐलान कर महागठबंधन की राह आसान कर दी है।
हालांकि, सियासी गलियारों में सवाल उठ रहा है कि क्या तेजस्वी यादव से दूरी बनाए रखने वाले ओवैसी ने यह समर्थन 'यूं ही' दे दिया है या इसके बदले कोई बड़ी डील पक्की हुई है? सूत्रों की मानें तो यह समर्थन मुफ्त नहीं है, बल्कि इसके पीछे बिहार विधान परिषद (MLC) की एक सीट का गणित छिपा है।
राज्यसभा चुनाव में किंगमेकर बनी AIMIM
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों ने राज्य के सियासी समीकरणों को ऐसा बदला कि राज्यसभा की सीट जीतने के लिए तेजस्वी यादव को ओवैसी की जरूरत पड़ गई। आरजेडी के पास फिलहाल 25 विधायक हैं, जबकि महागठबंधन के कुल 35 विधायकों के दम पर एक राज्यसभा सीट जीतना नामुमकिन था।
ऐसे में ओवैसी के 5 विधायकों का साथ तेजस्वी के लिए संजीवनी साबित हुआ है। मतदान से महज एक दिन पहले बिहार AIMIM के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान ने तेजस्वी के साथ रोजा इफ्तार के बाद समर्थन की घोषणा कर दी, जिससे तेजस्वी ने अपने सियासी समीकरण तो दुरुस्त कर लिए, लेकिन आगे की राह अब भी पेचीदा है।
प्रवक्ता आदिल हसन को MLC बनाने की शर्त
चर्चा है कि ओवैसी ने तेजस्वी के सामने अपने 5 विधायकों के वोट के बदले एक बड़ी शर्त रखी है। एआईएमआईएम चाहती है कि बिहार विधान परिषद (MLC) के आगामी चुनाव में महागठबंधन उन्हें एक सीट दे। पार्टी अपने प्रवक्ता आदिल हसन को सदन में भेजना चाहती है। एआईएमआईएम के पास अकेले दम पर एमएलसी चुनने की ताकत नहीं है, क्योंकि एक सीट के लिए कम से कम 25 विधायकों के वोट की जरूरत होती है।
ऐसे में आरजेडी और महागठबंधन के सहयोग के बिना ओवैसी का यह सपना पूरा नहीं हो सकता। इसी 'एक हाथ दे और दूसरे हाथ ले' के फार्मूले पर यह डील पक्की मानी जा रही है।
जून 2026 में खाली हो रही सीटों का गणित
बिहार विधान परिषद के लिए साल 2026 में कुल 17 सीटों पर चुनाव होने हैं। जून में विधायक कोटे की 9 सीटें खाली हो रही हैं, जिनमें 2 आरजेडी, 3 जेडीयू, 1 कांग्रेस और 1 बीजेपी की है। इसके अलावा 2 सीटें पहले से खाली हैं। नवंबर 2026 में भी 8 सीटें खाली होंगी।
जून में खाली होने वाली विधायक कोटे की सीटों में से आरजेडी एक सीट अपने दम पर जीत सकती है, लेकिन दूसरी सीट के लिए उसे अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी। माना जा रहा है कि ओवैसी की पार्टी को इन्हीं में से एक सीट देने का वादा किया गया है।
क्या 2025 विधानसभा चुनाव तक चलेगी यह दोस्ती?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आरजेडी और एआईएमआईएम की यह नजदीकी सिर्फ राज्यसभा चुनाव तक सीमित है या 2025 के विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिलेगी? पिछले विधानसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी ने महागठबंधन में शामिल होने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन तब कांग्रेस और आरजेडी दोनों तैयार नहीं हुए थे।
तेजस्वी के 'सियासी तेवर' के कारण ही यह डील अब तक पेंडिंग थी। अब जबकि तेजस्वी ने भविष्य की चिंता किए बिना ओवैसी का हाथ थामा है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि यह 'सियासी केमिस्ट्री' बिहार की राजनीति में क्या नया मोड़ लेकर आती है।