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निरंकार सिंह का लेख : जंग के मुहाने पर दुनिया

चीन की गंदी नजर सिर्फ लद्दाख के गलवान और पैंगोंग पर ही नहीं है। वो कई देशों की जमीन को हड़पने में लगा हुआ है। अपने बारह पड़ोसी देशों की जमीन के बाद उसकी लालची नजर ढाई सौ अन्य द्वीपों को भी हड़प जाने की है। साउथ चाइना सी को लेकर क्यों चीन की लार टपकती है, ये बात अब सारी दुनिया को समझ में आ गई है। दरअसल साउथ चाइना सी में करीब 250 द्वीप हैं और इन सभी पर चीन कब्जा करना चाहता है। इसके लिए वो दुनिया को जंग के मुहाने पर ले आया है।

निरंकार सिंह का लेख : जंग के मुहाने पर दुनिया
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निरंकार सिंह

दक्षिणी चीन सागर से लेकर प्रशांत, भूमध्य और हिंद महासागर तक कई देशों की सेनाएं और जंगी जहाज आमने-सामने हैं। चीनी वायरस ने लाखों लोगों की जान ले ली और दुनिया की अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया। दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही है, लेकिन चीन सीमा विस्तार में लगा हुआ है। वह भारत समेत सभी पड़ोसियों को लंबे समय से धमका रहा है। उसकी शह पर उत्तर कोरिया के निशाने पर दक्षिण कोरिया जापान और अमेरिका है। वह ईरान को भी सऊदी अरब और अमेरिका के खिलाफ भड़काता रहता है। पाकिस्तान और चीन भारत की सीमा में घुसने की लगातार कोशिश करते रहते हैं। सीरिया बहुत पहले से ही अमेरिका और रूस के बीच जंग का अखाड़ा बन हुआ है। इजरायल और फिलिस्तीन के बीच संघर्ष लंबे समय से चल रहा है। बेलारूस को लेकर अमेरिका और रूस के बीच तनातनी है। लेकिन सबसे ज्यादा खतरनाक स्थिति और चीन की उसके पड़ोसियों के साथ बनी हुई हैं।

विस्तारवादी नीति के कारण भारत के साथ ही रूस, जापान, नेपाल, भूटान, वियतनाम, ताइवान, दक्षिण कोरिया, र्किगस्तान, तजाकिस्तान, मंगोलिया सहित लगभग सभी पड़ोसी देशों के साथ चीन का सीमा विवाद है। कोरोना वायरस को लेकर चीन और अमेरिका में पहले से ही ठनी हुई है। लेकिन अब साउथ चाइना सी में अपने सैन्य अभ्यास के दौरान चीन ने चार मध्यम दूरी की मिसाइलें दागकर तनाव को और बढ़ा दिया है। चीन की ओर से ये मिसाइलें हैनान द्वीपसमूह और पारासेल द्वीपसमूह के बीच वाले इलाकों में दागी गईं। पेंटागन ने कहा कि रक्षा मंत्रालय दक्षिण चीन सागर में पारासेल द्वीपसमूह के आस-पास 23 से 29 अगस्त के बीच बैलिस्टिक मिसाइलों के परीक्षण समेत अन्य सैन्य अभ्यास करने के चीन के हालिया फैसले को लेकर चिंतित है। दक्षिण चीन सागर में विवादित क्षेत्र में सैन्य अभ्यास करना तनाव कम करने और स्थिरता को बरकरार रखने के उलट है। ये कार्रवाई दक्षिण चीन सागर में स्थिति को और अस्थिर करती है।

चीनी गतिविधियां दक्षिण चीन सागर का सैन्यीकरण न करने की उस प्रतिज्ञा के उलट हैं और मुक्त एवं स्वतंत्र हिंद-प्रशांत क्षेत्र के अमेरिकी दृष्टिकोण के भी विपरीत है जिसमें सभी राष्ट्र, छोटे एवं बड़े, सम्प्रभुता के लिहाज से सुरक्षित हैं, दबाव से मुक्त हैं और स्वीकृत अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुरूप आर्थिक विकास आगे बढ़ाने में सक्षम हैं। यह सैन्य अभ्यास दक्षिण चीन सागर में गैरकानूनी समुद्री दावों पर जोर देने और अपने दक्षिणपूर्वी एशियाई पड़ोसियों को नुकसान पहुंचाने के लिए चीन की ओर से लगातार की जा रही कार्रवाइयों में से हुई हालिया कार्रवाई है। पेंटागन ने जुलाई में चीन को चेतावनी दी थी कि वह स्थिति की निगरानी करना जारी रखेगा। वहीं उसने ये उम्मीद भी जताई थी कि चीन दक्षिण चीन सागर में अपनी सैन्यीकरण की कार्रवाई और पड़ोसियों पर दबाव दोनो को कम करेगा। अमेरिका ने इससे पहले दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीपों के निर्माण एवं उपयोग को लेकर 24 चीनी कंपनियों को प्रतिबंधित किया था, जिसकी चीन ने कड़ी आलोचना की थी। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका ऐसा कर के चीन के आंतरिक मामलों में दखल दे रहा है। चीन तो यहां तक दावा करता है कि समुद्र के लगभग 80 फीसदी हिस्से पर उसका ऐतिहासिक अधिकार है। इतना ही नहीं यह ब्रूनेई, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, ताइवान और वियतनाम के ईईजेड को भी ओवरलैप करता है। चीन के ऐसे ही कारनामों के चलते वियतनाम और फिलीपींस ने पिछले महीने ही इस क्षेत्र में चीन के सैन्य अभ्यास की आलोचना की थी।

चीन की गंदी नजर सिर्फ लद्दाख के गलवान और पैंगोंग पर ही नही है। वह दुनिया में बहुत सारी जमीनों को हड़पने की साजिश में लगा हुआ है। अपने बारह पड़ौसी देशों की जमीन हड़पने के बाद भी चीन की लालची नजर ढाई सौ अन्य द्वीपों को भी हड़प जाने की है। साउथ चाइना सी को लेकर क्यों चीन की लार टपकती है, ये बात अब सारी दुनिया को समझ में आ गई है। दरअसल साउथ चाइना सी में करीब 250 द्वीप हैं और इन सभी पर चीन कब्जा करना चाहता है। साउथ चाइना सी में अपनी दादागिरी चलाने की कोशिश में लगा चीन बेवजह अमेरिका से नहीं भिड़ने की तैयारी में है। इन द्वीपों पर काबिज करके चीन यहां से गुजरने वाले जहाजों पर भी नजर बनाए रख सकता है। साउथ चाइना सी की भौगोलिक स्थिति भी चीन के लिये सामरिक दृष्टि से बहुमूल्य है। चीन के सभी प्रमुख पड़ोसी दुश्मन भी इसके इर्दगिर्द ही हैं। साउथा चाइना सी में कब्जा हो जाने से चीन दुनिया के लगभग तीन ट्रिलियन डॉलर के व्यापार वाले इस समुद्री रास्ते को बाकियों से छीनने में कामयाब हो जाएगा। ये तो अच्छा हुआ कि वक्त पर चीन का असली चेहरा दुनिया के सामने आ गया और सारी दुनिया चीन के खतरे को समझ कर उसके खिलाफ गोलबंद हो गई है वरना ये ड्रैगन धीरे-धीरे सारी दुनिया को खा जाने की साजिश में लगा था। प्राकृतिक गैस को लेकर पूर्वी भूमध्य सागर में तुर्की और फ्रांस के जंगी जहाज आमने-सामने हैं।

ये दोनों देश नाटो के सदस्य हैं, लेकिन स्थानीय समीकरणों की जटिलता में उलझकर एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं। तुर्की इस इलाके में ऑफ-शोर ड्रिलिंग को आगे बढ़ाने पर अड़ा है जबकि फ्रांस ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर तुर्की ने विवादित क्षेत्र में ऐसी कोई गतिविधि शुरू की तो वह मूक दर्शक नहीं बना रहेगा। विवाद की जड़ पूर्वी भूमध्यसागर क्षेत्र में साढ़े तीन ट्रिलियन क्यूबिक मीटर गैस है, जिसमें 2.3 टीसीएम स्पष्ट रूप से इजिप्ट, इजरायल और साइप्रस के इकनॉमिक इंट्रेस्ट जोन में है। आर्थिक संकट से जूझ रहे तुर्की को अपनी ताकत एक सदी पहले वाले स्तर तक लाने की संभावना इस गैस भंडार को हथिया लेने में ही नजर आ रही है। उसने लीबिया की सरकार से गैस बंटवारे का समझौता किया है। मगर क्षेत्र के अन्य देश उसकी राह रोकने को तत्पर हैं। ग्रीस, साइप्रस और इजरायल ने जनवरी में समुद्र के अंदर 1900 किलोमीटर की गैस पाइपलाइन बनाने का समझौता किया और इटली, जॉर्डन तथा फिलस्तीन के साथ मिलकर एक ब्लॉक भी बना लिया।

इन सबका साझा मकसद तुर्की को यहां की गैस से दूर रखना है। समुद्री मामलों के अंतरराष्ट्रीय कानूनों को लेकर भी दोनों धड़ों की अपनी-अपनी व्याख्याएं हैं। ग्रीस की दलील है कि हर छोटे-बड़े देश का अपनी समुद्री सीमा और आर्थिक क्षेत्र में अपना ड्रिलिंग राइट है, जबकि तुर्की का कहना है कि पूर्वी भूमध्य सागर के गैस वाले इलाके उसके कॉन्टिनेंटल शेल्फ में आते हैं, वहां किसी अन्य देश का कोई अधिकार नहीं है। तुर्की और चीन दुनिया के उन 15 देशों में हैं जो समुद्री कानूनों के यूएन कन्वेंशन को स्वीकार नहीं करते। ऐसे में भूमध्य सागर में भी स्थिति विस्फोटक हो रही हैं। वहां कभी भी जंग शुरु हो सकती है।

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