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सतीश सिंह का लेख: क्या घर लौटने से बच पाएंगे मजदूर

अगर दस लाख प्रवासी मजदूर एवं कामगार भी अपने गांव लौटते हैं तो भी उनके स्वास्थ्य की जांच व संक्रमितों का इलाज तथा उन्हें रोजगार उपलब्ध कराना आसान नहीं होगा, जबकि यह एक संकुचित आंकड़ा है।

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बिहार के मजदूर और कामगार देश के लगभग सभी राज्यों में काम करते हैं, लेकिन पूर्णबंदी के कारण उनके लिए भूखे मरने की नौबत आ गई है। कुछ मुश्किलों के बाद उनके घर वापसी के रास्ते साफ हो गए हैं, लेकिन बिहार सरकार के लिए चुनौतियां बढ़ गई हैं। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार 28.5 लाख मजदूर एवं कामगार रोजगार की तलाश में बिहार से बाहर गए थे, जबकि वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तरप्रदेश और बिहार के प्रवासी मजदूरों एवं कामगारों की संख्या 2.9 करोड़ थी। प्रवासी मजदूरों के बिहार लौटने से मोटे तौर पर बिहार सरकार के समक्ष दो तरह की समस्याएं आ सकती हैं। पहला, प्रवासी मजदूरों एवं कामगारों को 21 दिनों तक क्वारंटाइन कराना व संक्रमितों के इलाज की व्यवस्था करना और दूसरा, उन्हें रोजगार उपलब्ध कराना।

अगर दस लाख प्रवासी मजदूर एवं कामगार भी अपने गांव लौटते हैं तो भी उनके स्वास्थ्य की जांच व संक्रमितों का इलाज तथा उन्हें रोजगार उपलब्ध कराना आसान नहीं होगा, जबकि यह एक संकुचित आंकड़ा है। वैसे, रेल से विभिन्न राज्यों में लौटने के लिए अब तक एक करोड़ से अधिक मजदूर पंजीकरण करा चुके हैं। एक अनुमान के अनुसार मई के अंत तक सभी प्रवासी मजदूर एवं कामगार बिहार लौट जाएंगे, जिससे जून महीने में संक्रमितों की संख्या में तेज बढ़ोतरी हो सकती है। अभी कोरोना के कुल संक्रमित मरीजों में 25 प्रतिशत प्रवासी मजदूर एवं कामगार हैं। इस अनुपात में इनकी संख्या जून महीने में बढ़कर 2,50,000 हो सकती है, जबकि बिहार के सरकारी अस्पतालों में कोरोना के ईलाज के लिए 390 विशेषज्ञ डॉक्टर, 469 सामान्य डॉक्टर और 566 नर्सेज हैं।

वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक बिहार की 43 प्रतिशत यानी 4 करोड़ 30 लाख की आबादी काम करने वाले आयु वर्ग में है, लेकिन यह रोजगार सृजन में शुरू से ही फिसड्डी रहा है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनामी के आंकड़ों के अनुसार बिहार में 12 प्रतिशत लोग ही नौकरी करते हैं। राज्य की 56 प्रतिशत आबादी स्वरोजगार से जीवकोपार्जन करती है, जबकि 44 प्रतिशत आबादी कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में काम करती है। लाखों मजदूरों एवं कामगारों को रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करना पड़ता है। बिहार में 61,07,376 सक्रिय कामगार एवं मजदूर हैं और वह मनरेगा के तहत आवंटित बजटीय राशि का पूरा इस्तेमाल अब तक करता रहा है। ऐसे में तकरीबन 10 लाख अतिरिक्त प्रवासी मजदूरों एवं कामगारों को मनरेगा योजना के तहत रोजगार देने के लिए राज्य सरकार को केंद्र सरकार से अतिरिक्त बजट लेना होगा, जो मौजूदा माहौल में संभव नहीं है। हालांकि, सरकार लौटे हुए प्रवासियों को रोजगार उपलब्ध कराने की पुरजोर कोशिश कर रही है। एक बड़ी समस्या प्रवासी मजदूरों एवं कामगारों के लिये मनरेगा जॉब कार्ड बनाने की भी है।

बिहार की अर्थवयवस्था में रेमिटेंस का अहम योगदान है। वर्ष 2017 में राज्य की जीडीपी में रेमिटेंस का 5 प्रतिशत का योगदान था। एक बिहारी मजदूर या कामगार औसतन 2500 रुपये हर महीने अपने घर रेमिटेंस भेजता है। इस आलोक में बिहार का देश में दूसरा स्थान है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के वर्ष 2017 के आंकड़ों के अनुसार घर भेजे गये रेमिटेंस के लगभग 75 से 80 प्रतिशत हिस्से का इस्तेमाल खाद्य पदार्थों को खरीदने में किया जाता है अर्थात प्रवासियों के परिवार भी उन्हीं की कमाई से गुजर-बसर करते हैं। अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान, मुंबई द्वारा फरवरी, 2020 में करवाए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार बिहार के प्रवासी मजदूरों एवं कामगारों में 80 प्रतिशत के पास या तो कोई भूमि नहीं है या 1 एकड़ से भी कम भूमि है। इसी वजह से प्रख्यात अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ने अपने एक हालिया साक्षात्कार में प्रवासी बिहारियों के घर लौटने पर गहरी चिंता जताई है, क्योंकि फिलवक्त न तो उनके पास पैसे हैं और न ही जमीन। ऐसे में घर लौटने के बाद भी मजदूरों एवं कामगारों के लिये जिंदा रहना आसान नहीं होगा।

बिहारी मजदूरों एवं कामगारों के घर लौटने के बाद बिहार सरकार की असली परीक्षा जून महीने से शुरू होगी। संक्रमित मजदूरों एवं कामगारों की संख्या में बड़ी वृद्धि होने का अनुमान है। सरकार की जिम्मेदारी उन्हें स्वस्थ रखने की है, लेकिन सीमित डॉक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों के बलबूते यह मुमकिन नहीं होगा। सरकार के समक्ष एक बड़ी चुनौती रोजगार उपलब्ध कराने की भी होगी। मनरेगा के तहत अभी पक्की गली-नालियां, शौचालय का निर्माण, तालाबों का जीर्णोद्धार, वृक्षारोपण जैसे कार्यों हेतु ही रोजगार सृजित किया जा रहा है। नए क्षेत्रों में रोजगार सृजन की गुंजाइश कम है। इसी वजह से बिहार में बेरोजगारी दर में भारी इजाफा हुआ है। सीएमआईई के आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2020 में बिहार में बेरोजगारी दर 10.7 प्रतिशत था, जो अप्रैल महीने में बढ़कर 46.6 प्रतिशत हो गया। आगामी महीनों में इसमें और भी वृद्धि की संभावना है।

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