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आलोक पुराणिक का लेख : किसे मिला कोरोना का लाभ

कोरोना काल में बहुत अमीर हो गए हैं। भारत की रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुकेश अंबानी कोरोना काल में बहुत अमीर हुए और उन्होंने अपनी कंपनी के कर्ज को लगभग खत्म ही कर दिया। इसमें मुकेश अंबानी के कारोबारी कौशल और चातुर्य का भी हाथ है। उन्हीं के छोटे भाई अनिल अंबानी तमाम कानूनी पचड़ों से जूझते दिख रहे हैं।

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कोरोना

आलोक पुराणिक

बहुत विचित्र तथ्य हैं। कई उद्योगपति कोरोना काल में बहुत अमीर हो गए हैं। भारत की रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुकेश अंबानी कोरोना काल में बहुत अमीर हुए और उन्होंने अपनी कंपनी के कर्ज को लगभग खत्म ही कर दिया। इसमें मुकेश अंबानी के कारोबारी कौशल और चातुर्य का भी हाथ है। उन्हीं के छोटे भाई अनिल अंबानी तमाम कानूनी पचड़ों से जूझते दिख रहे हैं। अमेजॉन कंपनी से जुड़े टाप प्रबंधन के भी अमीर होने के समाचार हैं। कोई अपने कौशल और चातुर्य से अमीर हो जाए पर उसकी अमीरी राजनीतिक मुद्दा बन ही जाती है।

धन का केंद्रीकरण महत्वपूर्ण आर्थिक-राजनीतिक मुद्दा रहा है। यह किसी न किसी स्वरुप में आर्थिक-राजनीतिक घोषणाओं में मौजूद रहता है। किसी एक व्यक्ति, परिवार या समूह के पास धन का केंद्रीकरण एक तरह से लोकतंत्र में शक्ति संतुलन पर भी असर डालता है। धन अपने आप में एक शक्ति का माध्यम है, इसके केंद्रीकरण के कई आशय हैं और किसी व्यक्ति, परिवार या समूह का धन से वंचित होना भी अनेक ऐसे परिणामों को जन्म देता है, जिनका किसी देश की राजनीति, अर्थव्यवस्था पर गहरा असर होता है।

हाल के समय में धन के केंद्रीकरण पर विश्व व्यापी बहस छिड़ी है। इसके पीछे तमाम अध्ययन-रिपोर्टों के अलावा फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थामस पिकेटी की 2013 की वह पुस्तक कैपिटल इन ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी भी है, जिसमें उन्होंने विश्व में कई देशों में व्याप्त आय और संपत्ति में असमानता को रेखांकित किया है। भारत में 2015-16 का आर्थिक सर्वेक्षण प्रस्तुत करते समय तत्कालीन मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रहण्यम ने स्पष्ट किया था कि 2012 में भारत में जितनी भी कमाई हुई थी, उसका 12.9 प्रतिशत अमीरतम एक प्रतिशत लोगों के पास गया था। 1998 में अमीरतम लोगों ने हुई कुल कमाई का 9 प्रतिशत कमाया था।

अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थान क्रेडिट सुईज की 2018 ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट के अनुसार भारत के अमीरतम दस प्रतिशत भारतीयों के पास देश की संपदा का करीब 77.4 प्रतिशत हिस्सा है। अर्थव्यवस्था के निचले पायदान पऱ खड़े भारतीय जनसंख्या के करीब 60 प्रतिशत हिस्से के पास सिर्फ 4.7 प्रतिशत संपदा है।

कुल मिलाकर स्थितियों से साफ होता है कि असमानता के स्तर गहरे हैं। इसके व्यापक राजनीतिक, आर्थिक कारण हैं। विरासत में मिली संपदा, शिक्षा-प्रशिक्षण, रोजगार के स्तर, कराधान व्यवस्था-ये कुछ कारण हैं धन के मामले में असमानता के। मोटे तौर पर भारत में किसी की आर्थिक नियति इस तथ्य पर निर्भर करती है कि वह किस परिवार में जन्म लेता है। उद्योगपति परिवार के बच्चे उद्योगपति परिवार की संपदा पर स्वाभाविक हक रखेंगे। विरासत में उन्हें वह सब मिलेगा, जो उनके पूर्वज कमा कर गए हैं। विरासत की संपदा पर कर लगाने का मसला उलझा हुआ है। हालांकि इस पर चर्चा बराबर होती रही है। उलझा हुआ इसलिए है कि किसी व्यक्ति के पास पचास करोड़ की हवेली हो सकती है, जो उसे विरासत में मिली हो। पर संभव है कि उसकी आय कुछ भी न हो। आय यानी नियमित धन-प्रवाह, संपदा यानी संपत्ति, कोई व्यक्ति परम संपत्तिवान होकर भी आय के स्तर शून्य हो सकता है। ऐसी संपदा पर कर लगाना कहां तक न्यायोचित है, यह सवाल खड़ा हो जाता है। इसलिए आय पर कर लगाने व्यावहारिक लगता है। आय पर एक सीमा के ऊपर कर लगाने का मतलब होता है कि आय के लिए ज्यादा से ज्यादा प्रयासों के लिए प्रेरणा पर अधिक आयकर का असर पड़ सकता है। अगर आय ज्यादा कमाकर उसका ज्यादा अंश सरकार को ही देना है तो मैं ज्यादा कमाने के लिए प्रयास ही क्यों करूं, इस तरह की भावना भी लोगों में आ सकती है। इसलिए आयकर को सीमा के ऊपर बढ़ाने का सवाल बहस में आ जाता है।

शिक्षा-प्रशिक्षण का भी आय पर असमानता पर गहरा असर होता है। बेहतर शिक्षा पाए हुए, बेहतर प्रशिक्षण पाए हुए व्यक्ति ज्यादा बेहतर आय का अर्जन कर सकते हैं। हर एक को बेहतर शिक्षा-प्रशिक्षण का मौका नहीं मिलता, इसलिए सबको बेहतर और उच्च स्तरीय आय-अर्जन का मौका नहीं मिलता।

शिक्षा-प्रशिक्षण समाज के हर तबके तक पहुंचे, विपन्नतम तबकों तक पहुंचे, इसके लिए नीतिगत प्रयास लगातार होते रहते हैं। पर कुल मिलाकर जो आंकड़े सामने आते हैं उनसे साफ होता है कि कुछ लोगों, कुछ परिवारों, कुछ समूहों की आय और संपदा अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा है, दूसरे लोगों, दूसरे परिवारों और दूसरे समूहों के मुकाबले। इस तरह की स्थितियों में गैर-जिम्मेदार राजनीति को बढ़ावा मिलता है। कुछ लोगों को यह कहकर भड़काया जा सकता है कि देखो तुम्हारे हक का हिस्सा भी उन लोगों ने ले लिया। इस तरह के विचारों से असंतोष को जन्म मिलता है। धन का केंद्रीकरण इस तरह से राजनीतिक विस्फोट को जन्म देने में अपना योगदान देता है।

असमानता से असंतुष्ट विपन्न तबकों से तुरंत राजनीतिक लाभांश अर्जित करने के लिए तमाम राजनीतिक दल इस तरह की योजनाएं और वादे चुनावों में पेश करते हैं, जिनसे विपन्न तबकों का तात्कालिक हित तो सध जाता है, पर उनकी दीर्घकालीन बेहतरी का मार्ग उनसे सुनिश्चित नहीं होता। जैसे चुनावों से पहले रंगीन टीवी देने के वादे, मोबाइल फोन देने के वादे- इनका किसी भी राज्य की राजकोषीय स्थिति पर गहरा असर पड़ता है। कई राज्यों में इस तरह के वादों को पूरा करने के बाद राजकोष पर ऐसा असर पड़ा कि वे विकास के लिए आवश्यक राशि का इंतजाम करने में भी दिक्कतें महसूस करते हैं। रंगीन टीवी और मोबाइल फोन के वादे पूरा करने के बाद अगर सरकार अध्यापकों के वेतन के नियमित भुगतान में समस्या महसूस कर रही है, तो इसका आशय है कि राजकोषीय असंतुलन पैदा हो गया है।

धन के केंद्रीकरण से जुड़ी दूसरी बहसें भी हाल के समय में अर्थव्यवस्था में सामने आने लगी हैं। एक विचार यह भी उठ खड़ा हुआ है कि आर्थिक असमानताओं की स्थितियों में भी यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि हर नागरिक के लिए न्यूनतम आय की व्यवस्था सरकार करे ताकि हर नागरिक न्यूनतम सम्मान के साथ जीवनयापन कर सके। 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में सर्वांगीण मूलभूत आय यानी यूनिवर्सल बेसिक इनकम का विचार प्रस्तुत किया गया था। यह विचार अभी व्यापक तौर पर स्वीकार्य नहीं हो पाया है, इसमें कई राजनीतिक और राजकोषीय अड़चनें हैं। फिर भी इस विचार ने अब किसी न किसी स्वरुप में राजनीतिक विमर्श में जगह बनाना शुरू किया है। व्यापक व्यावहारिक धरातल पर यह किस तरह से और कब तक उतर पाएगा, यह अभी देखना होगा। पर तमाम राजनीतिक दलों को, नीति निर्धारकों को, विमर्शकारों को इस बात का ध्यान तो रखना ही होगा कि अगर किसी लोकतंत्र में अर्थव्यवस्था के एक चुनिंदा तबके के पास संसाधनों का जखीरा हो जाए और बड़े तबके के पास न्यूनतम व्यवस्थाएं भी न हों तो लोकतंत्र स्वस्थ स्वरुप में सुरक्षित नहीं रह सकता।

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