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चिंतन: काबुल पर हमले में छिपे संदेश को समझना होगा

अफगानिस्तान एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है, जहां निराशा के बादल घिरते हुए नजर आ रहे हैं।

चिंतन: काबुल पर हमले में छिपे संदेश को समझना होगा
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काबुल में फिर आत्मघाती हमला हुआ, जिसमें 29 लोगों के मारे जाने और अनेक के घायल होने की प्रारंभिक सूचनाएं मिली हैं। तालिबान ने इसकी जिम्मेदारी ली है। उसका ऐलान है कि गर्मियों की छुट्टियों में वह इस तरह के और हमले करेगा। यह हमला अप्रत्याशित नहीं है। दो सप्ताह पहले इसकी धमकी दे दी गई थी। इसके बावजूद यदि अफगानिस्तान की सुरक्षा एजेंसियां इसे रोकने में नाकाम रही तो यह बात एकदम साफ है कि वह इस तरह की वारदातों को नियंत्रित करने में सक्षम ही नहीं है। जिस जगह वारदात हुई है, वहां घर हैं, व्यवसायिक संस्थान हैं। सेना और सुरक्षा के जुड़े प्रतिष्ठान हैं।

यहां से अमेरिका का दूतावास भी बहुत दूर नहीं है। यानी आत्मघाती हमले को अंजाम देने के लिए सोच-विचारकर ऐसे इलाके को चुना गया, जिससे वहां के सुरक्षा बलों से लेकर आम अवाम तक यह संदेश दिया जा सके कि तालिबान जब चाहे, जहां चाहे हमला करने में सक्षम है। वो अपनी ताकत और सरकार में बैठे लोगों की कमजोरी साबित करना चाहते हैं और लगातार यह कर रहे हैं। कंधार हो या काबुल, वहां लगातार हमले और आत्मघाटी वारदातें हो रही हैं।

कई बार लगता है, जैसे अफगानिस्तान के नागरिक तालिबान और दूसरी आतंकी जमातों के रहमोकरम पर हैं। अफगानिस्तान एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है, जहां निराशा के बादल घिरते हुए नजर आ रहे हैं। हालांकि हमले तब भी होते थे जब अमेरिका के नेतृत्व में नाटो की सेनाएं वहां थी परन्तु धीरे-धीरे उनकी वापसी के साथ ही तालिबान ने फिर से जड़ें जमानी शुरू कर दी हैं। सब जानते हैं कि अफगानिस्तान में सक्रिय तालिबान को खाद-पानी कहां से मिलता रहा है। अफगान राष्ट्रपति अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अनेक बार इसका खुलासा कर चुके हैं।
पाकिस्तानी सेना और आईएसआई की कारगुजारियां किसी से छिपी हुई नहीं हैं। वो अफगानिस्तान में अस्थिरता का माहौल बनाए रखना चाहती हैं। जिस तरह जम्मू-कश्मीर में हिंसा, तोड़फोड़, आतंकी वारदातें उनके प्रमुख एजेंडे में हैं, उसी प्रकार अफगानिस्तान को चैन से नहीं बैठने देने और उसे अस्थिर करना उनके टारगेट पर है। दुनिया को दिखाने के लिए वहां पाकिस्तान के सेना प्रमुख से लेकर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक अफगानिस्तान की यात्राओं के दौरान शांति, सौहार्द, विकास और सहयोग की बात करते हैं परन्तु वास्तविकता यही है कि वहां के बिगड़ते हालातों के पीछे पाकिस्तान का पुख्ता हाथ है। जिन हालातों में नाटो सेनाओं ने अफगानिस्तान छोड़ने का फैसला किया है, वह और भी दुर्भाग्यपूर्ण रहा है।
पूरी दुनिया ने तब कहा था कि अमेरिका और नाटो सेनाओं का अफगानिस्तान छोड़ने का यह सही समय नहीं है। तालिबान फिर से सिर उठा सकते हैं। वही हुआ। अफगानिस्तान में जो कुछ घटता है, उसका कहीं न कहीं असर भारत पर भी पड़ता है। सभी जानते हैं कि अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारत अहम भूमिका अदा कर रहा है। न तालिबान को भारत का सहयोग रास आ रहा है, न पाकिस्तान को।
यही कारण है कि निशाने पर भारत भी है। कई बार भारतीय दूतावास को टारगेट बनाया जा चुका है। कुछ मामलों में यह बात साबित हो चुकी है कि भारतीय प्रतिष्ठानों पर हमलों के पीछे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का सीधा हाथ रहा है। इसके पुख्ता सबूत भारत ने न केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दुनिया के सामने रखे हैं बल्कि पाकिस्तान को भी आईना दिखाया है।
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