Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

रहीस सिंह का लेख: चीन को बेपर्दा करने की कोशिश

रिपोर्टर्स विदाउट बाॅर्डर्स नामक संस्था प्रेस की स्वतंत्रता संबंधी इंडेक्स तैयार करते समय यह पूछ रही है कि क्या दुनिया चीन की गलती की सजा भुगत रही है?

रहीस सिंह का लेख: चीन को बेपर्दा करने की कोशिश

किसी देश की गलती पूरी दुनिया भुगते यह उस देश का अपराध है। इस विषय पर पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बाॅडर्स ने एक तरह से जनमत जुटाने की कोशिश की। उसका यह कदम सही है, लेकिन तब जब दुनिया भी इस विषय पर गंभीरता से विचार करे और प्रत्युत्तर में कार्यवाही करने के निर्णय के स्तर तक पहुंचे, लेकिन यदि वह इसके विपरीत उस देश को मसीहा की तरह से देखने या अपनाने के लिए विवश दिखे तो इसे क्या नाम दिया जाए, पाप, अन्याय अथवा भय?

यदि कोई अंतरराष्ट्रीय संस्था ऐसे देश को अपराध की सीमा से परे जाकर रणनीतिक विजेता का खिताब प्रदान कर दे तो उसके लिए फिर कौन सा विशेषण प्रयुक्त होना चाहिए? हम तो यह प्रश्न कर ही सकते हैं कि क्या यह उच्च स्तरीय डिप्लोमैसी है या फिर षड्यंत्ा? एक प्रश्न यह भी है कि जवाब कौन देगा? वह जिस पर आरोप लगाया जा रहा है अथवा वह जो खामियाजा भुगत रहे हैं? शायद एक भी नहीं बल्कि इसे विपरीत दोनों ही सवाल पूछने वाले की गर्दन में फंदा डालने के लिए एक अवधारणा विकसित करेंगे और फिर उसे दोषी बताकर या तो खत्म कर देंगे अथवा महत्वहीन करार दे देंगे। अभी तो यह बात चीन के विषय में कही जा रही है, लेकिन इसकी परिधियों इससे कहीं बहुत ज्यादा विस्तृत हैं। क्या वैश्विक शक्ति के संचालकों और अअंतरराष्ट्रीय गेम प्लेयरों की सेहत पर भी इसका कोई असर पड़ेगा ?

रिपोर्टर्स विदाउट बाॅर्डर्स नामक संस्था प्रेस की स्वतंत्रता संबंधी इंडेक्स तैयार करते समय यह पूछ रही है कि क्या दुनिया चीन की गलती की सजा भुगत रही है? क्या कोरोना वायरस पर चीन ने सूचनाएं छिपाई हैं? क्या उसने प्रेस को रोका है? और इसी वजह से आज पूरी दुनिया इस आपदा का शिकार हुई है? हालांकि इस संस्था ने तो एक दृष्टि से अपना फैसला सुना दिया है। क्योंकि उसने प्रेस की स्वतंत्रता के हालात पर दुनिया का जो मानचित्र जारी किया है और प्रेस की प्रास्थिति के हिसाब से देशों और क्षेत्रों को अलग-अलग रंगों से दर्शाया गया है। ये रंग हैं, सफेद, पीला, गाढ़ा पीला, लाल और काला। अगर नार्डिक देशों को छोड़ दें तो कोई भी देश सफेद रंग का प्रदर्शन नहीं करता। इसलिए हम यह मानकर चल सकते हैं कि प्रेस स्वतंत्र हैसियत के मामले में एक्सीलेंट इन देशों के अतिरिक्त और कहीं नहीं है। अधिकांश क्षेत्र लाल रंग से दर्शाया गया है जिसका मतलब है कि ये देश की प्रेस की स्वतंत्रता की दृष्टि खराब स्थिति वाले हैं। लेकिन चीन को काले रंग से दिखाया गया है, जिसका मतलब है कि चीन में हालात बेहद खराब हैं। मुझे लगता है कि चीन में प्रेस की हैसियत के बारे में जो भी इस संस्था का अध्ययन है, उस पर किसी को कोई संशय नहीं है लेकिन उसकी वैश्विक औसत हैसियत भी कोई अच्छी नहीं है यह चिंता का विषय अवश्य होना चाहिए। रही बात चीन की तो वह वही जानकारी प्रेस के जरिए देता है जो वह देना चाहता है। उदाहरण के तौर पर 11 मार्च 2020 को जब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोविड-19 को महामारी घोषित किया तो उस दिन चीन ने वीचैट जैसे अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और समाचार देने वाले एप्स पर इस वायरस से जुड़े बहुत सारे की वर्ड को सेंसर कर दिया ताकि लोग इस बारे में ऑनलाइन बात न कर सकें। यही नहीं दिसंबर 2019 में वुहान में जब कुछ डाॅक्टर्स ने इस वायरस के बारे में बताना चाहा तो प्रशासन ने न सिर्फ उन्हें रोका बल्कि उन्हें अफवाहें फैलाने के आरोप में प्रताड़ित भी किया। बाद में इन्हीं में से एक डॉ. ली वेनलियांग की इसी कोराना वायरस से मौत हो गई। चीन के सरकारी अखबारों, जैसे- पीपुल्स डेली, चाइना डेली अथवा ग्लोबल टाइम्स आदि वुहान में मरते हुए लोगों की तकलीकों और स्थितियों की जानकारी देने की बजाए कम्युनिस्ट पार्टी के प्रोपोगैंडा के प्रचार में लगे रहे। उन्होंने राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मसीहाई तस्वीरें तो दिखाई, लेकिन तड़पते हुए लोगों के बारे में कुछ भी नहीं बताया। कुछ समय बाद ही हांगकांग से छियान ने अपने एक लेख में लिखा कि पिछले दो महीने से चीन एक बड़े स्वास्थ्य संकट से गुजर रहा है और बहस हो रही है कि क्या शुरुआती चरण में जानकारी को छिपाया जाना इसकी एक वजह है। वहीं पीपुल्स डेली को देखकर लगता है कि उसे कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा है।



इसका मतलब तो यही हुआ कि चीन ने जानबूझ कर, न कि अनजाने या लापरवाही में, पूरी दुनिया को खतरे में डालने का काम किया। फिर तो यह उसका अक्षम्य अपराध हुआ? अगर कुछ अध्ययनों पर ध्यान दें तो यह बात निकलकर आती है कि चीन की कम्युनिष्ट पार्टी और शासक चूंकि इस हैसियत में है कि जानकारी देने वाले स्रोतों को रोक सकते हैं और यह तय कर सकते हैं कि कौन सी तथा कितनी जानकारी बाहर जानी चाहिए या कौन सी नहीं। इसके बाद उनकी कोशिश होती है कि वे प्रत्येक स्थिति में यह सुनिश्चित करें कि अफ्रीका में टीवी पर क्या दिखाया जाएगा, क्या नहीं। लोग क्या शेयर करें और क्या नहीं। ऐसा नहीं कि यह काम अकेले चीन ने किया है यह काम तो अमेरिका और पश्चिमी दुनिया के कई देश करते रहे हैं। अमेरिकी मिलिट्री इंडस्ट्रियल काॅम्प्लेक्स और पेंटागन तो स्वयं यह तय करते रहे हैं कि कौन सी खबर निर्मित की जाए, कैसे उसे प्रोजेक्ट किया और फिर कैसे उसका प्रसार पूरी दुनिया में किया जाए। यही कारण है कि यदि अमेरिका ने वाॅर आॅफ इराकी फ्रीडम कहा तो दुनिया ने इसे इसी रूप में देखा, अमेरिका ने इसे अफगान वार कहा तो दुनिया ने इसी रूप में उसे पेश किया और स्वीकार किया।

दुनिया ने यह नहीं पूछा कि अफगानिस्तान कब अमेरिका से युद्ध लड़ने गया और इराक कितना स्वतंत्र हो गया। ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिन्हें इस फ्रेम के अंदर लाकर देखिए तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि मीडिया के लिए फ्रीडम शब्द कितने खांचों में बंटा हुआ है, कितना विचित्र सा है। यह काम यदि चीन कर रहा है कि कैसे मीडिया चैनलों को नियंत्रित किया जाए, कैसे फेक न्यूज फैलाई जाए, कैसे दुनिया भर के न्यूज मीडिया में हिस्सेदारी खरीदी जाए और कैसे पत्रकारों पर विभिन्न प्रकार से अंकुश लगाया जाए तो फिर यह कार्य अमेरिका और रूस सहित यूरोप के देशों ने भी किया है या कर रहे हैं और तमाम एशियाई देश भी। यह याद रखना होगा कि सच सिर्फ सच होता है सच की परिभाषाएं और चरित्र भूगोल, व्यवस्था और राजनीति नेतृत्व के आधार पर बदलती नहीं हैं। लेकिन आज के विश्व में ऐसा होते देखा जा रहा है।

बहरहाल रिपोर्टर्स विदाउट बाॅर्डर्स ने पूरी दुनिया से जो सवाल पूछा है, उस पर पूरी दुनिया को मंथन करना चाहिए और चीन को कठघरे में खड़ा करना चाहिए। लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ तो? यदि चीन पहले अधिक ताकतवर बनकर उभरा तो? फिर सब कुछ छोड़कर यह विचार करने की होगी कि क्या बाजार और धनी बनने की लालसा लोगों के मूल्यों को खत्म कर रही है? अगर ऐसा नहीं है तो फिर असल वजह है क्या?

Next Story
Top