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प्रमोद भार्गव का लेख : गठबंधन का अलगाववादी चेहरा

फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती न जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 व धारा 35-ए बहाली की मांग उठाकर कश्मीर आधारित क्षेत्रीय दलों के क्षत्रपों का गठबंधन भी बना लिया है। फारूक अब्दुल्ला चीन की मदद से अनुच्छेद-370 की वापसी के सब्जबाग अलगाववादियों को दिखा रहे हैं। राज्य का झंडा और संविधान वापसी की मांग उठाकर यह गठबंधन पाक और चीन की शह से घाटी में खत्म हो चुकी आतंक की फसल के बीज फिर से बोने की तैयारी में है। यह वही लद्दाख है, जिसे चीन हथियाना चाहता है, इसी चीन से फारूक कश्मीर की पुरानी स्थिति को बहाल करने की गुहार लगा रहे हैं। ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रघाती नहीं तो क्या राष्ट्र का हितैषी कहा जाए।

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प्रमोद भार्गव

फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती ने नजरबंदी से बाहर आते ही देश-विरोधी बयान देकर अलगाववाद को फिर से सींचना शुरू कर दिया है। यही नहीं इन दोनों नेताओं ने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 व धारा 35-ए बहाली की मांग उठाकर कश्मीर आधारित क्षेत्रीय दलों व सियासी गुटों के क्षत्रपों का गठबंधन भी बना लिया है। महबूबा जहां राष्ट्रीय तिरंगे झंडे को नाकार रही हैं, वहीं फारूक अब्दुल्ला चीन की मदद से अनुच्छेद-370 की वापसी के सब्जबाग अलगाववादियों को दिखा रहे हैं। राज्य का झंडा और संविधान वापसी की मांग उठाकर यह गठबंधन पाकिस्तान और चीन की शह से घाटी में खत्म हो चुकी आतंक की फसल के बीज फिर से बोने की तैयारी में है। दरअसल भारत की स्वतंत्रता के बाद से ही नेशनल कांफ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने कश्मीर ने भारत सरकार से मिलने वाले धन को न केवल लूटा है, बल्कि लद्दाख और जम्मू क्षेत्र के विकास की भी कभी परवाह नहीं की। इस लूट को पाने के लिए महबूबा और अब्दुल्ला ने परस्पर विरोधी क्षेत्रीय दलों से जो गठबंधन किया है, वैसी मंशा इन नेताओं ने 30 साल से विस्थापित कश्मीरी पंडितों के प्रति कभी नहीं जताई। अब वे इस लड़ाई को धारा-370 की वापसी का संघर्ष बताते हुए सांप्रदायिक रंग देने में भी लग गए हैं। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो टूक कह दिया है कि 'अनुच्छेद की वापसी किसी भी सूरत में नहीं होगी।'

धारा-370 और 35-ए के खत्म होने का प्रस्ताव संसद से पारित होने के बाद से ही जम्मू-कश्मीर का विभाजन हो चुका है। अब यहां अलग-अलग राज्यपालों की निगरानी में शासन-प्रशासन लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कामयाबी के साथ बहाल कर रहा है। अलग निशान और विधान का शासन खत्म हो गया है। नतीजतन अब सही मायनों में कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत को भारतीय संविधान के कानूनी धागे में पिरो दिया है। साथ ही इस राज्य को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त होने के कारण जो 164 कानून यहां के लोगों को विशेष लाभ देते थे, वे रद हो गए हैं। इस राज्य के पुराने कानूनों में से 166 कानून ही नए केंद्र शासित प्रदेशों में लागू होंगे। जो अधिकार देश की दूसरी ग्राम पंचायतों को प्राप्त थे, वे यहां अब लागू हो गए। यहां सबसे बड़ा बदलाव यह हुआ है कि यहां की आधिकारिक भाषा उर्दू की जगह हिंदी ने ले ली है। जम्मू-कश्मीर देश का एकमात्र ऐसा राज्य था, जहां आधिकारिक भाषा उर्दू थी। साफ है, इस पूरे क्षेत्र में जो भी देश की अखंडता के एवं भारतीय संविधान के मुताबिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के पक्षधर लोग हैं, उन्हें बरगलाना मुश्किल है, क्योंकि कश्मीरी अवाम जान गई है कि इन दोनों परिवारों ने कश्मीर को अपने निजी हितों के लिए न केवल लूटा, बल्कि आतंक की आग में झोंक दिया। दरअसल फारूक और महबूबा उसी सोच को आगे बढ़ा रहे हैं, जो विभाजन के समय सामंतों की थी।

सरदार वल्लभ भाई पटेल ने आजादी के बाद 562 भारतीय रियासतों का स्वतंत्र भारत में विलय कराया था। इन देशी रियासतों का स्वतंत्र भारत में विलय करना कठिन इसलिए हो रहा था, क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने इन्हें यह छूट दी थी कि वे भारत या पाकिस्तान किसी के भी साथ अपनी इच्छा से जा सकते हैं या फिर स्वतंत्र रियासत के रूप में भी बने रह सकते हैं। भारत को खंडित बनाए रखने की यह अंग्रेजों की कुटिल चाल थी। देश के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल ने इन दुर्भावनाओं को भांप लिया और उस समय के वरिष्ठ नौकरशाह वीपी मेनन के साथ मिलकर सामंतों व नवाबों से बातचीत शुरू की। इन्हें विलय के बाद प्रिवीपर्सेंज के माध्यम से आर्थिक मदद देने का भी लालच दिया। तीन रियासत हैदराबाद, जूनागढ़ एवं जम्मू-कश्मीर को छोड़ अन्य रियासतों ने आसानी से विलय कर लिया। जम्मू-कश्मीर के विलय की जिम्मेदारी जवाहरलाल नेहरू ने ले रखी थी, वे इस क्षेत्र को भारत में विलय करा पाते इससे पहले ही पाकिस्तानी सेना के साथ कबाईलियों ने श्रीनगर पर हमला बोल दिया। बाद में भारतीय सेना भेजकर बमुश्किल इन कबाईलियों को खदेड़ा गया। शेख अब्दुल्ला के साथ हुए एक दिल्ली समझौते के तहत नेहरू ने इस राज्य को विशेष दर्जा दिया, इसी के तहत यहां दो निशान और दो विधान का शासन कायम हो गया, जो 5-6 अगस्त 2019 तक देश के गले में फांस बना रहा।

पुनर्गठन विधेयक-2019 के लागू होने के बाद इस राज्य की भूमि का ही नहीं राजनीति का भी भूगोल बदल गया। विधानसभा सीटों का परिसीमन के जरिये राजनीतिक भूगोल बदला जाएगा। नए सिरे से परिसीमन व आबादी के अनुपात में जम्मू-कश्मीर की नई विधानसभा का जो आकार सामने आएगा, उसमें सीटें घट अथवा बढ़ सकती हैं। बंटवारे के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित राज्य हो गए हैं। लद्दाख में विधानसभा नहीं होगी। परिसीमन के लिए आयोग बनेगा। यह आयोग राजनीतिक भूगोल का अध्ययन कर रिपोर्ट देगा। आयोग राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में मौजूदा आबादी और उसका विधान व लोकसभा एवं विधानसभा क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व का आकलन करेगा।

जम्मू-कश्मीर का करीब 60 प्रतिशत क्षेत्र लद्दाख में है। इसी क्षेत्र में लेह आता है, जो अब लद्दाख की राजधानी। यह क्षेत्र पाकिस्तान और चीन की सीमाएं साझा करता हैं। बीते सत्तर साल से लद्दाख कश्मीर के शासकों की बदनीयति का शिकार होता रहा है। अब तक यहां विधानसभा की मात्र चार सीटें थी, इसलिए राज्य सरकार इस क्षेत्र के विकास को कोई तरजीह नहीं देती थी। लिहाजा आजादी के बाद से ही इस क्षेत्र के लोगों में केंद्र शासित प्रदेश बनाने की चिंगारी सुलग रही थी। 70 साल बाद इस मांग की पूर्ति हो गई है। इस मांग के लिए 1989 में लद्दाख बुद्धिस्ट एसोशिएशन का गठन हुआ और तभी से यह संस्था कश्मीर से अलग होने का आंदोलन छेड़े हुए थी। 2002 में लद्दाख यूनियन टेरेटरी फ्रंट के अस्तित्व में आने के बाद इस मांग ने राजनीतिक रूप ले लिया था। 2005 में इस फ्रंट ने लेह हिल डेवलपमेंट काउंसिल की 26 में से 24 सीटें जीत ली थीं। इस सफलता के बाद इसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसी मुद्दे के आधार पर 2004 में थुप्स्तन छिवांग सांसद बने। 2014 में छिवांग भाजपा उम्मीदवार के रूप में लद्दाख से फिर सांसद बने। 2019 में भाजपा ने लद्दाख से जमयांग सेरिंग नामग्याल को उम्मीदवार बनाया और वे जीत भी गए। लेह-लद्दाख क्षेत्र अपनी विषम हिमालयी भौगोलिक परिस्थितियों के कारण साल में छह माह लगभग बंद रहता है। सड़क मार्गों व पुलों का विकास नहीं होने के कारण यहां के लोग अपने ही क्षेत्र में सिमटकर रह जाते हैं। यह वही लद्दाख है, जिसे चीन हथियाना चाहता है, इसी चीन से फारूक अब्दुल्ला कश्मीर की पुरानी स्थिति को बहाल करने की गुहार लगा रहे हैं। ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रघाती नहीं तो क्या राष्ट्र का हितैषी कहा जाए। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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