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डॉ. मोनिका शर्मा का लेख: आसान हों प्रवासी मजदूरों की मुश्किलें

पहले से ही रहने-जीने के तकलीफदेह हालातों को झेल रहे मजदूरों को लिए यह आपदा बेघर और बेरोजगार कर रही है। रोजी-रोटी के जुगाड़ में महानगरों में अस्थायी बसेरों तले जिंदगी गुजार रहे प्रवासी मजदूरों के लिए तो यह संकट जानलेवा बन गया है।

डॉ. मोनिका शर्मा का लेख:  आसान हों प्रवासी मजदूरों की मुश्किलें

डॉ. मोनिका शर्मा

कोरोना की आपदा ने यों तो जीवन के हर पहलू और समाज के हर वर्ग को प्रभावित किया है। लेकिन गरीब और निचले तबके के लोगों की जिंदगी में यह महामारी बड़ी तबाही लेकर आई है। उनके लिए यह संक्रमण सिर्फ स्वास्थ्य सहेजने की चिंताओं तक सीमित नहीं है। पहले से ही रहने-जीने के तकलीफदेह हालातों को झेल रहे मजदूरों को लिए यह आपदा बेघर और बेरोजगार कर रही है। रोजी-रोटी के जुगाड़ में महानगरों में अस्थायी बसेरों तले जिंदगी गुजार रहे प्रवासी मजदूरों के लिए तो यह संकट जानलेवा बन गया है। हाल ही में अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी और सिविल सोसायटी ऑर्गनाइजेशन के सर्वे के मुताबिक देश में रोजगार से जुड़े आंकड़े चिंतनीय हैं। लॉकडाउन के बीच हुए अध्ययन में सामने आया है कि दो-तिहाई से ज्यादा लोगों के पास रोजी-रोटी का जरिया नहीं बचा है। इतना ही नहीं जिन लोगों के हाथ में रोजगार है, उनकी कमाई में भी भारी गिरावट आई है। मौजूदा समय में आधे से ज्यादा घरों में हो रही कुल कमाई सप्ताह भर का जरूरी सामान खरीदने को भी काफी नहीं है। जबकि ये रोज कमाने और रोज खाने वाले लोग हैं। गौरतलब है कि आंध्र प्रदेश, बिहार, दिल्ली, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल के करीब 4000 मजदूरों को लेकर किए गए इस अध्ययन में रोजगार के मोर्चे पर बिगड़ती स्थितियां सामने आई हैं। सर्वे में मजदूरों से आर्थिक स्थिति और लॉकडाउन के दौरान हो रही कमाई के बारे में प्रश्न पूछे गए। साथ ही स्वरोजगार से जुड़े लोगों, दिहाड़ी मजदूरों और सामान्य नौकरीपेशा मजदूरों की रायशुमारी भी की गई। अध्ययन के अनुसार शहरी इलाकों में स्थिति बहुत खराब है। यहां हर 10 में से 8 लोग बेरोजगार हो गए हैं। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी का आंकड़ा लगभग 57 फीसदी है। यानी गांवों में हर 10 में से 6 लोग इस विपदा में रोजगार जाने के संकट से प्रभावित हैं। जिस दिहाड़ी कामगार की लॉकडाउन से पहले हर हफ्ते औसत 940 रुपये आमदनी थी, उसकी कमाई करीब आधी रह गई। यह वाकई चिंतनीय है कि गैर-कृषि क्षेत्र में काम करने वालों की आमदनी 90 फीसदी तक कम हो गई है। जबकि हमारे यहां महानगरों में ही नहीं गांवों में गैर-कृषि क्षेत्र से रोजी-रोटी कमाने वाले लोग बड़ी संख्या में हैं।

ऐसे में 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज के दूसरे हिस्से में प्रवासी मजदूरों की मुश्किलें आसान करने के लिए की घोषणाएं अहम्ा हैं। जो छोटे किसानों, प्रवासी मजूदरों और स्ट्रीट वेंंडर्स और शहरी गरीबों सहित समाज के निचले तबके के लोगों के लिए सहायक साबित होंगीं। इसके तहत 8 करोड़ प्रवासी मजदूरों को अगले दो महीने के लिए मुफ्त अनाज दिए जाने का प्रावधान है। एक व्यक्ति को महीने में 5 किलोग्राम गेहूं या चावल और एक किलोग्राम दाल दी जाएगी। जिनके पास राशन कार्ड नहीं है, उन्हें भी इस योजना से दूर नहीं किया जाएगा। गौरतलब है कि अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी और सिविल सोसायटी ऑर्गनाइजेशन के इस सर्वे में भी लोगों ने सुझाव दिया है कि जरूरतमंदों के लिए आगामी छह महीने तक मुफ्त राशन का इंतजाम किया जाना चाहिए। साथ ही ग्रामीण इलाकों में रोजगार का दायरा बढ़ाया जाए ताकि वहां पहुंचने वाले लोगों को काम मिल सके। सर्वे में लोगों ने इस संकट के समय उन्हें आर्थिक मदद देने की भी बात कही है। ऐसे में कोरोना त्रासदी के बड़े संकट में सरकार की यह पहल मजदूरों की मुश्किलें आसान करने शुरुआत कही जा सकती है।

दरअसल, लॉकडाउन के चलते बड़ी कंपनियों, उद्योगों में कामकाज ठप हो गया है। जो बड़ी आबादी को रोजगार देते हैं। इतना ही नहीं इन हालातों में ऐसे संगठनों के सहारे चल रहे स्वरोजगार के दूसरे रोजगार भी बंद हो गए हैं। यही वजह है कि समूचे भारत में लॉकडाउन की घोषणा के एक-दो दिन बाद ही दिल्ली, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों से प्रवासी मजदूरों का सामूहिक पलायन शुरू हो गया था। तभी से बड़ी संख्या में मजदूर अपने गांव-देहात की ओर लौट रहे हैं। शहरों में रोजगार छूट जाने की स्थितियों में अब उनके रहने का भी ठिकाना नहीं रहा। हालिया दिनों में देखने में आया कि देश के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी संख्या में मजदूर पैदल ही घरों की ओर निकल पड़े हैं। हालांकि अब रेल के जरिये उन्हें अपने गांव-घर पहुंचाने के इंतज़ाम किए जा रहे हैं, पर रोजी-रोटी की चिंता तो गांव जाकर भी बनी ही रहेगी। बरसों पहले अपने गांव-कस्बे से विस्थापित होकर रोजगार पाने के लिए महानगरों में आए मजदूर अब फिर से पलायन करने को मजबूर हैं। इतना ही नहीं विवशता के ऐसे हालातों में कोरोना संक्रमण के भय के चलते गांव पहुंचे मजदूरों-कामगारों से अपने भी दूरी बना रहे हैं। ऐसे में सरकार को इनका जीवन सहज बनाने के लिए कई स्तरों पर प्रयास करने की दरकार है। इस आर्थिक पैकेज में जो प्रवासी मजदूर शहरों से पलायन कर गांव पहुंचे हैं, उनके लिए रोजगार के मोर्चे पर भी सोचा गया है। एक लाख 87 हजार गांवों में अब तक 2 करोड़ 33 लाख लोगों के लिए मनरेगा के तहत रोजगार पाने का प्रबंध किया गया है। कहना गलत नहीं होगा कि इस आपदा के दौर में मजदूरों के जीवन को फिर पटरी पर लाने के लिए सरकार कई पहलुओं पर काम करने है। कोरोना संकट का यह दौर दुनिया के हर देश के लिए मुसीबत बना हुआ है। हमारे यहां भी संक्रमित लोगों की संख्या 80 हजार का आंकड़ा पार कर गई है। देश के लिए यह आपदा और भी चिंतनीय है क्योंकि स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर जीवन की बुनियादी जरूरतों तक, एक बड़ी आबादी पहले से ही तकलीफदेह हालातों में जी रही है। असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों की जिंदगी तो हमेशा से मुश्किलों से ही घिरी है। इस संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का मानना है कि लॉकडाउन से भारत में असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले 40 करोड़ लोगों के प्रभावित होने की आशंका है। श्रम संगठन का कहना है कि भारत उन देशों में से एक है जो स्थिति से निपटने के लिए अपेक्षाकृत कम तैयार हैं। ऐसे में इस वैश्विक माहमारी के दौरान मजदूरों में रोजी-रोटी को लेकर भी असुरक्षा और उपेक्षा का भाव आना वाकई विचारणीय है। जरूरी है कि अब निर्णय लिए जाएं जो मजदूर वर्ग की समस्याओं को और न बढ़ाएं। यह मजदूरों के रूप में देश के एक बड़े तबके को सुरक्षा और बुनियादी सुविधाएं देने का ही नहीं उनके श्रम का सम्मान करने का भी मामला है।

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