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निरंकार सिंह का लेख : साइबर स्पेस जंग का नया मैदान

इस बार दी गई चेतावनी नहीं बल्कि साइबर वार की औपचारिक रूप से की गई घोषणा है। चीन भविष्य में साइबर युद्ध होने पर खुद को लाभ की स्थिति में रखना चाहता है। यही कारण है कि उसने साइबर स्पेस में अपनी गतिविधियां बढ़ा दी है। चीन अपनी साइबर क्षमता को कई तरह से लैस कर रहा है। वेबसाइट्स को ब्लाक करने, साइबर कैफों में गश्त लगाने और मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर निगरानी रखने के लिए बड़ी संख्या में साइबर पुलिस (हैकर्स) तैनात कर रखी है। दुनिया चीन की साइबर मोर्चेबंदी से परेशान है।

भारत पर चीन कर सकता है बड़ा साइबर अटैक, खुफिया फर्म ने दी जानकारी
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भारत पर चीन कर सकता है बड़ा साइबर अटैक, खुफिया फर्म ने दी जानकारी

निरंकार सिंह

साइबर स्पेस अब जंग का नया मैदान बन गया है। अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और भारत सहित दुनिया के कई देश चीनी साइबर वार से त्रस्त हैं। साइबर स्पेस में लड़ी जाने वाली जंग को साइबर वार कहते हैं। पहले लड़ाई उन हथियारों की मदद से होती थी जो जंग के मैदान तक लाए जाते थे, लेकिन 1990 के बाद से जंग के कई नए पहलू सामने आए। इनमें साइबर जासूसी जंग का सबसे नया पहलू है। नई तकनीक और एप्स भी उसके खास हथियार बन गए हैं। पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया पर हुआ साइबर हमला भी चीन की शातिर चाल थी। यह हमला प्रायोगिक तौर पर किया गया था ताकि चीन को अपनी क्षमताओं का पता चल सके, इसलिए सरकार को विदेशी तकनीक पर अपनी निर्भरता कम करनी चाहिए। खासतौर से चीन जैसे धूर्त देश की तकनीक से तो हमें सदैव सतर्क रहना चाहिए।

दुनिया के साइबर स्पेस में भी चीन का कब्जा बढ़ता जा रहा है। पश्चिमी देशों और चीन के माहिर हैकर्स के बीच साइबर वार शुरू हो चुकी है। पिछले दशकों में अमेरिका और भारत के कई सैन्य संस्थानों पर साइबर हमले हुए थे। ये हमले खुफिया सूचना जुटाने के मकसद से किए गए थे, लेकिन इस बार निशाने पर खुफिया सूचनाएं थीं। लिहाजा नाटो और यूरोपीय संघ ने सभी सदस्य देशों को अलर्ट जारी कर दिया। इस बार दी गई चेतावनी नहीं बल्कि साइबर वार की औपचारिक रूप से की गई घोषणा है। चीन भविष्य में साइबर युद्ध होने पर खुद को लाभ की स्थिति में रखना चाहता है। यही कारण है कि उसने साइबर स्पेस में अपनी गतिविधियां बढ़ा दी है। चीन अपनी साइबर क्षमता को कई तरह से लैस कर रहा है। वेबसाइट्स को ब्लाक करने, साइबर कैफों में गश्त लगाने और मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर निगरानी रखने के लिए बड़ी संख्या में साइबर पुलिस (हैकर्स) तैनात कर रखी है। दुनिया चीन की साइबर मोर्चेबंदी से परेशान है।

चीनी सेना की सबसे सीक्रेट यूनिट 61398 साइबर जासूसी के लिए जानी जाती है। सीक्रेट यूनिट ने भारत के खिलाफ अपनी गतिविधियों को तेज कर दिया है। सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले कुछ महीनों में ऐसे कई मामले देखने को मिले हैं जिसमें देश की संवेदनशील जानकारियों को साइबर जासूसी के जरिये चीन जुटाने में लगा हुआ है। केंद्रीय सुरक्षा में तैनात एक अधिकारी के अनुसार पीएलए की यूनिट 6139 जिसका मुख्यालय चीन के शंघाई के पुडोंग जिले में है, उसकी गतिविधियों में तेजी देखी जा रही है। यूनिट 61398 के जरिये चीन दुनियाभर की साइबर, स्पेस और जियोलोकेशन इंटेलीजेंस जैसी जानकारी जुटाने में लगा हुआ है। भारत के खिलाफ भी ये यूनिट काफी सक्रिय देखी जा रही है।

लंदन में पिछले वर्ष साइबर सुरक्षा के लिए कैबिनेट आफिस बनाया गया था। इस आफिस का कहना है कि साइबर हमले दो प्रकार के होते हैं। एक जो कम्प्यूटर सिस्टम को खराब करते हैं और दूसरे हमले फिशिंग ट्रिप्स कहलाते हैं। इस प्रकार के साइबर हमले संवदेनशील सूचनाएं हासिल करने के मकसद से किए जाते हैं। अमेरिका के सुरक्षा संस्थानों सहित सभी सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों पर होने वाले साइबर हमलों में से 90 फीसदी और जर्मनी पर होने वाले साइबर हमलों मेें से 60 फीसदी चीन की तरफ से किए जाते हैं। ब्रिटेन भी बड़े पैमाने पर चीनी साइबर आक्रमण का शिकार बन रहा है। 2007 में फाइनेंशियल टाइम्स ने खबर छापी थी कि चीन ने अमेरिका के रक्षा मंत्रालय पेंटागन के कम्प्यूटर नेटवर्क को हैक कर लिया है। यह अमेरिका के सुरक्षा प्रतिष्ठान पर सफल चीनी साइबर हमला था जिसने यह बता दिया कि बहुत संवेदनशील मौकों पर चीन अमेरिका के सिस्टम को ध्वस्त करने की क्षमता रखता है। दरअसल चीन ने 2003 से अपने मिलिट्री हैकरों के जरिए अमेरिका के कम्प्यूटर नेटवर्को में सेंध लगानी शुरू की। बाद में वह गूगल तक को हैक करने लगा। चीनी सरकार जब भी हैकिग की खबरें आती हैं तो खंडन करती है।

साइबर दुनिया के जानकारों का कहना है कि चीन हैकरों का स्वर्ग है। रूस और पूर्वी यूरोप के देशों की तरह हैकिंग वहां का भारी मुनाफा देने वाला राष्ट्रीय खेल बन चुका है। जहां हैकर्स सम्मेलन होते हैं। हैकर्स ट्रेनिंग अकादमियां और हैकर्स डिफेंस और हैकर्स एक्स फाइल जैसी मैगजीनें हैं जो कम्प्यूटर को भेदने और ट्रोजन हार्स और ट्रेपडोअर जैसी हैकिंग तकनीकों की विस्तृत जानकारी देती है। इसके अलावा हैकर्स पेनीट्रेेशन मैनुअल जैसी पुस्तकें भी उपलब्ध हैं। इस इंटरनेट और कम्प्यूटर संजाल से जुड़ी नई दुनिया में अगला निर्णायक युद्ध साइबर युद्ध होगा। चीन की इस नापाक साजिश में उसका साथ चीनी कंपनी दे रही थी। इस कंपनी का दावा है कि वह चीन की खुफिया एजेंसी, सेना और सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर काम करती है। यह चीनी कंपनी डिजिटल दुनिया में अपने टारगेट के हरेक कदम की बारीकी से नजर रखती है। इसके जरिए वह एक सूचना लाइब्रेरी तैयारी करती है जिसमें कंटेंट को केवल न्यूज सोर्स, फोरम के रूप में नहीं रखा जाता है बल्कि दस्तावेज, पेटेंट, भर्ती के पदों की भी सूचना रखी जाती है। चीनी कंपनी सोशल मीडिया पर अपने लक्ष्य के किसी पोस्ट पर उसके फॉलोवर्स के क्या कॉमेंट आ रहे हैं और कितने लाइक आ रहे हैं, इसका विश्लेषण करती है।

चीन के पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने वर्ष 1999 के शुरू में हाइब्रिड वॉरफेयर के लिए असीमित युद्धकौशल नाम से रणनीति बनाई जिसके तहत हिंसा को सेना से ले जाकर नेताओं, अर्थव्यवस्था और तकनीक की दुनिया में शुरू करना था। इस नए युद्ध के मास्टरमाइंड चीन के कर्नल कीआओ लिआंग और कर्नल वांग शिआंगसूई थे। हाइब्रिड वॉरफेयर के तहत चीन अपने दुश्मन देश में सामाजिक विद्वेष को बढ़ा रहा है, आर्थिक गतिविधियों में बाधा डाल रहा है। चीन की तुलना में किसी ने इसका व्यापक इस्तेमाल नहीं किया है। चीन ने इसका व्यापक इस्तेमाल हॉन्गकॉन्ग में किया। इस कंपनी के निशाने पर भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के 24 लाख अतिमहत्वपूर्ण लोग हैं। इन 24 लाख लोगों में 10 हजार लोग और संगठन भारत और करीब 35 हजार लोग ऑस्ट्रेलिया के थे। कंपनी के डेटाबेस में अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के बारे में जानकारियां हैं। चीन इसे हाइब्रिड वारफेयर का नाम देता है। इसके जरिए वह अपने विरोधियों पर बढ़त बना कर उसे नुकसान पहुंचाता है। अमेरिका में दंगा इसी हाइब्रिड वारफेयर का नतीजा बताया जाता है। चीन की साइबर जंग भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती है।

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