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ओमकार चौधरी का लेख : अमन विकास और लोकतंत्र की चाहत

जम्मू-कश्मीर ने कुछ और अहम संकेत दिए हैं। भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है। उसे पहली बार जम्मू क्षेत्र के बाहर यानी घाटी में भी तीन सीटें मिली हैं। कमल के निशान पर वहां से तीन मुसलमान उम्मीदवार जीते हैं। वो भी ऐसे क्षेत्रों से जहां आतंकवादी वारदातें होती रही हैं। बहुत बड़ी संख्या में लोगों ने निर्दलीयों को जिताकर भेजा है। इससे यह संदेश और संकेत मिला है कि वंशवादी दलों का ज़माना अब बस लदने ही वाला है। त्रिस्तरीय चुनाव संपन्न होने का इससे भी बड़ा संकेत यह है कि जम्मू-कश्मीर की आम जनता ने 370 और 35 ए हटाने का फ़ैसला पूरी तरह स्वीकार कर लिया है। अब इसमें किसी को कोई शक नहीं रहना चाहिए।

ओमकार चौधरी का लेख :  अमन विकास और लोकतंत्र की चाहत
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ओमकार चौधरी

ओमकार चौधरी

जम्मू कश्मीर क्या चाहता है। डीडीसी के शांतिपूर्ण चुनाव और नतीजों ने जवाब दे दिया है। सत्तर साल से साज़िशों का शिकार रहा यह सरहदी सूबा अमन, विकास और लोकतंत्र चाहता है। इस सूबे के लोगों ने यह संदेश भी दे दिया है कि वो भारत विरोधी नहीं हैं, जैसी कि विदेशी मीडिया और पाक परस्त तत्व प्रॉपगैंडा चलाते आए हैं। इस अहम चुनाव में 280 सीटों के लिए चार हज़ार से अधिक उम्मीदवार मैदान में उतरे। कुछ छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें तो पूरी चुनावी प्रक्रिया शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुई। किसी ने भी धांधली की शिकायत दर्ज नहीं कराई। वस्तुस्थिति यह है कि लगभग सभी राजनीतिक दल खुश हैं। पाकिस्तानी साजिशों के बावजूद विगत एक वर्ष के भीतर जमीनी स्तर के तीन स्तरीय चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न होना उन सभी ताक़तों की बड़ी शिकस्त है, जिन्होंने अगस्त 2019 में जम्मू कश्मीर में बदलाव करते समय धमकियां दी थीं कि वहां खून की नदियां बह जाएंगी और कोई तिरंगा उठाने वाला भी नसीब नहीं होगा। वहां की जनता ने ऐसी बहकी बहकी बातें करने वालों को ही उनकी जगह दिखा दी है। ऐसी ताक़तें अब अलग-थलग होती दिखने लगी हैं।

जम्मू-कश्मीर ने कुछ और अहम संकेत दिए हैं। भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है। उसे पहली बार जम्मू क्षेत्र के बाहर यानी घाटी में भी तीन सीटें मिली हैं। कमल के निशान पर वहां से तीन मुसलमान उम्मीदवार जीते हैं। वो भी ऐसे क्षेत्रों से जहां आतंकवादी वारदातें होती रही हैं। बहुत बड़ी संख्या में लोगों ने निर्दलीयों को जिताकर भेजा है। इससे यह संदेश और संकेत मिला है कि वंशवादी दलों का जमाना अब बस लदने ही वाला है। त्रिस्तरीय चुनाव संपन्न होने का इससे भी बड़ा संकेत यह है कि जम्मू-कश्मीर की आम जनता ने 370 और 35 ए हटाने का फैसला पूरी तरह स्वीकार कर लिया है। अब इसमें किसी को कोई शक सुबहा नहीं रहना चाहिए। अगर सब ठीक ठाक रहता है तो 2021 में विधानसभा चुनाव के रास्ते खुल सकते हैं। तब तक परिसीमन का काम पूरा हो चुका होगा। अब से पहले साजिशन वहां घाटी से ज़्यादा सीटें और प्रतिनिधि चुनकर भेजने की व्यवस्था चली आ रही थी परंतु उम्मीद की जानी चाहिए कि परिसीमन के उपरांत जम्मू क्षेत्र में सीटें बढ़ेंगी और इस क्षेत्र के नेता के भी मुख्यमंत्री बनने की संभावना और रास्ता खुल जाएगा। इतनी बड़ी संख्या में चुनाव प्रक्रिया में लोगों और सभी राजनीतिक दलों की भागीदारी यह बताती है कि वो लोकतंत्र के सबसे अहम उत्सव में खुशी-खुशी शामिल होने को तैयार हैं।

शुरू में नेशनल काॅन्फ्रेंस, पीडीपी और कुछ दूसरे स्थानीय दलों ने इनके बहिष्कार के संकेत दिए थे परंतु बाद में उन्हें लगा कि यह उनकी बहुत भारी भूल साबित होगी क्योंकि चाहे पंचायत हों, नगर निकाय हों या डीडीसी हों, केन्द्र से इनको विकास कार्यों के लिए सीधे पैसा पहुंचेगा। यदि ये इस प्रक्रिया से अलग रहे और भाजपा की अगुवाई में त्रिस्तरीय लोकल सरकार व्यवस्था में नया नेतृत्व और विकल्प उभरकर आ गया। उसने यदि जन अपेक्षाएं पूरी करनी शुरू कर दी तो क्षेत्रीय पार्टियों की राजनीति खत्म हो जाएगी। उन्हें किनारे लगा दिया जाएगा और जब भी विधानसभा चुनाव होंगे, इन सभी क्षेत्रों में उनकी पार्टी के झंडे उठाने और वोट मांगने वाला मुश्किल से मिलेगा। उन्हें इसका भी अंदाज़ा था कि पिछले एक डेढ़ साल में केन्द्र सरकार ने ज़मीन पर काफ़ी विकास कार्य कराए हैं। अपने समर्थकों की फ़ौज खड़ी कर ली है। लोग भी भागीदारी निभाने को आगे आ रहे हैं। लिहाज़ा उसकी राजनीतिक ज़मीन तैयार हो रही है। यदि उन्होंने ख़ुद को अलग रखने की गलती की तो भाजपा हर स्तर पर काबिज हो जाएगी। यही सोचकर इन छह-सात दलों ने गुपकार फ्रंट का गठन किया। इन सबको मिलाकर एक सौ बारह सीटें मिलीं जबकि भाजपा को अकेले ही सत्तर से अधिक सीटें मिल गईं।

जम्मू कश्मीर ने हिंसा का भयानक दौर देखा है। ऐसे काले दिन भी देखे हैं, जब करीब-करीब रोज़ाना बम धमाके होते थे। आत्मघाती हमलों और वारदातों में मासूमों की जान ली जा रही थी। नौजवानों के हाथों में पत्थर थमा दिए गए थे। सुरक्षाबलों पर कायरतापूर्ण हमले तो अब तक हो रहे हैं। विदेशी साज़िशों को यहां बैठे कुछ देशद्रोहियों की मदद हासिल थी। अलगाववादियों और चुनी हुई सरकारों का नेतृत्व करने वालों के सुरों में कई बार कोई अंतर दिखाई नहीं देता था। वो शपथ भले ही भारतीय संविधान के अनुसार लेते थे, परंतु गीत पाकिस्तान के गाते हुए नज़र आते थे। पिछले करीब डेढ़ साल में जम्मू-कश्मीर में जो भी बदलाव हुए हैं, उन्होंने वहां की आबोहवा और सोचने-समझने का तरीक़ा ही बदलकर रख दिया है। मताधिकार के लिए लगी लंबी-लंबी क़तारें और पचास प्रतिशत से अधिक मतदान यह बताने के लिए काफी है कि भीषण हिंसा के बावजूद आम जनमानस, राज्य और लोकतंत्र जीवित बचकर निकल आने में कामयाब रहा है, लेकिन चुनौतियां अभी ख़त्म नहीं हुई हैं।

पिछले एक सवा साल में हमने देखा है कि वहां चुने हुए पंचों, सरपंचों और जनप्रतिनिधियों को निशाना बनाया गया है। विशेषकर जो भाजपा समर्थक हैं अथवा कमल के निशान पर चुनकर आए हैं, उनकी हत्याएं तक कर दी गई हैं। इन चुनावों में तो घाटी से तीन मुस्लिम चुनकर आए हैं। केन्द्र और राज्य प्रशासन की सबसे बड़ी फ़ौरी चुनौती इन लोगों की सुरक्षा होगी। यदि उन पर हमले हुए तो ऐसे लोगों का हौसला डिग सकता है, जो लोकतांत्रिक प्रणाली में शामिल होने के प्रति उत्साहित हैं। यह कोई छोटी घटना नहीं है कि डल झील में कमल खिलता हुआ दिखाई दे रहा है। अतीत में सालों तक जहां की भावनाओं को भड़काया गया हो। अमन, विकास और अवसरों के मामले में पूरी तरह हताश और निराश किया गया हो। जिन लोगों में आक्रोश भरा हुआ हो, वहां यदि नए युग और बदलाव के संकेत मिल रहे हों तो इससे सुखद संकेत कोई और हो ही नहीं सकते हैं।

इसी श्रीनगर में, बारामूला में, कुपवाड़ा और पुलवामा से लेकर दक्षिण कश्मीर के कई इलाकों में नौजवानों के हाथों में पत्थर देखे जाते रहे हैं। वहां अगर अमन, विकास, मुख्यधारा और लोकतंत्र की ललक देखने को मिल रही है तो यह उनकी करारी हार भी है, जिन्होंने घाटी को दशकों तक भारत के खिलाफ खड़ा रखने की साजिशें रची हैं। इनमें पाकिस्तान भी है। वहां की सेना भी है। उस पार बैठी आंतकी जमाते भी हैं। यहां बैठे उनके पैरोकार भी हैं और पश्चिम के देशों में बैठी भारत विरोधी लाबी भी है। जम्मू कश्मीर में नया सवेरा होता हुआ दिखाई दे रहा है। इसकी हिफ़ाज़त बहुत ज़रूरी है। वहां लोकतंत्र परवान चढ़े। नया नेतृत्व उभरे और राज्य देश के दूसरे प्रदेशों की तरह हर क्षेत्र में नई मिसाल क़ायम करे, यह भी अब सुनिश्चित करना होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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