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आलोक पुराणिक का लेख: संकट से ही निकला समाधान

बुजुर्ग लोग बताते हैं कि एक वक्त अमेरिका से आने वाले गेहूं से भारतीयों की भूख मिटती थी। विकट संकट था, हरित क्रांति हुई। अब तो खेती के उत्पादों का निर्यात हो रहा है। 1991 में विदेशी मुद्रा का संकट, देश का सोना गिरवी रखने की नौबत, विदेशी मुद्रा कहां से आए। उदारीकरण संकट से निपटने की रणनीति के तौर पर लाया गया। अब विदेशी मुद्रा का भंडार है। और देश अब विदेशी मुद्रा के मामले में मजबूत स्थिति में है। इतनी मजबूत स्थिति में है कि कोरोना-काल में संकट के बावजूद जिन दो क्षेत्रों में भारतीय मजबूती बहुत साफ तौर पर रेखांकित की जा सकती है, वो हैं-खेती और विदेशी मुद्रा कोष।

आलोक पुराणिक का लेख: संकट से ही निकला समाधान

आलोक पुराणिक

बात थोड़ी अजीबोगरीब है, पर एक हद तक सही है कि संकटों ने कई समाधानों को जन्म दिया है। बुजुर्ग लोग बताते हैं कि एक वक्त अमेरिका से आने वाले गेहूं से भारतीयों की भूख मिटती थी। विकट संकट था, हरित क्रांति हुई। अब तो खेती के उत्पादों का निर्यात हो रहा है। 1991 में विदेशी मुद्रा का संकट, देश का सोना गिरवी रखने की नौबत, विदेशी मुद्रा कहां से आए। विदेशी मुद्रा या तो निर्यात करके आएगी या फिर विदेशी निवेश से आएगी। दोनों ही सूरतों में अर्थव्यवस्था को खोलना पड़ेगा, अर्थव्यवस्था को उदार बनाना पड़ेगा। उदारीकरण किसी सुचिंतित रणनीति का परिणाम न था, यह संकट से निपटने की रणनीति के तौर पर लाया गया। और देश अब विदेशी मुद्रा के मामले में मजबूत स्थिति में है। इतनी मजबूत स्थिति में है कि कोरोना-काल में संकट के बावजूद जिन दो क्षेत्रों में भारतीय मजबूती बहुत साफ तौर पर रेखांकित की जा सकती है, वो हैं-खेती और विदेशी मुद्रा कोष।

कोरोना के संकट में किसानों के लिए कुछ बेहतर करने के इंतजामों का रास्ता निकला है। एक केंद्रीय कानून बनाया जाएगा जिसमें स्थानीय मंडियों का एकाधिकार ध्वस्त होगा और किसानों को छूट मिलेगी कि वो अपना उत्पाद जहां चाहें, वहां बेच सकते हैं। यह अनायास नहीं है कि सब्जी मंडी के आढ़तियों की संपन्नता और किसानों की संपन्नता में साम्य नहीं है। किसान फसल उगाकर जितना नहीं कमा पाता, आढ़ती फसल बेचकर ज्यादा कमा लेते हैं। यानी किसानों की फसल के ज्यादा खरीदार होंगे तो उनकी हालत सुधरेगी। मंडियों का एकाधिकार खत्म हो और किसान अपनी फसल बड़ी कंपनियों, बड़े संगठनों को बेचने की लिए आजाद हों तो उनकी आय के स्तर में बढ़ोत्तरी तय है। राज्यों में स्थानीय कृषि मंडियों को तमाम कारणों से निष्प्रभावी बनाना संभव नहीं हो पा रहा था, अब एक केंद्रीय अधिनियम के तहत यह संभव होगा। हालांकि राह लंबी है, पर चलने की शुरुआत हो गई है। एक महत्वपूर्ण घोषणा यह है कि आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 की हद से अनाज, खाद्य तेल, तिलहन, दालों , प्याज और आलू को निकाला जाएगा। इनके स्टाक संबंधी नियमों को बहुत ही अपवादस्वरुप आपदा की स्थितियों में लागू किया जाएगा, जैसे सूखा, या कीमतों में बहुत तेजी होने की स्थिति में। मोटे तौर पर इस कदम का आशय यह है कि अगर प्याज या आलू के भाव बढ़ते हैं और उनका स्टाक करके कोई रखता है, तो सरकार उस पर कार्रवाई नहीं करेगी यानी आलू और प्याज जमाकर के कोई मुनाफा कमा रहा है, तो उसे कमाने का हक होगा। अपवादस्वरुप स्थितियों में सरकार दखल करेगी पर मुनाफा कमाने का हक सभी का है, किसान का भी है, और प्याज आलू के कारोबारी का भी है।

किसान अपने माल को कहीं भी बेच सकेंगे, उसके भावों पर लगभग कोई अंकुश नहीं होगा सामान्य परिस्थितियों में और बड़ी कंपनियों, बड़े संगठनों से बिक्री के समझौते कर सकेंगे-इन कदमों से किसानों की आर्थिक स्थिति में बहुत सुधार आने के आसार हैं। साधारण सी बात यह है कि किसी बाजार में अगर सीमित मात्रा में खरीदार हों, जैसे कि कृषि मंडियों में होते हैं तो कीमतों के बढ़ने की सीमा होती है। अगर खरीदारों की तादाद ज्यादा हो जाए तो निश्चय ही बेहतर कीमत मिलेगी। किसानों का मूल मसला बेहतर और उचित कीमत मिलने का है। अगर किसान को सही कीमत मिले तो फिर किसान कर्ज माफी जैसे मसले भी खड़े ही न हों। हाल के आर्थिक पैकेज में जिन कदमों की घोषणा की सरकार ने की है, उन कदमों की वांछनीयता पर लंबे अरसे से विमर्श हो रहा था, पर कोरोना ने सरकार के फैसलों की गति बढ़ा दी है।

खेती की बेहतरी सिर्फ खेती की बेहतरी नहीं है। यूं तो खेती इस देश की सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में करीब 15 प्रतिशत का योगदान देती है पर खेती में इस देश की श्रमशक्ति का करीब 45 प्रतिशत हिस्सा लगा हुआ है। खेती की हालत सुधरेगी तो तमाम आइटमों की मांग और बिक्री में तेजी आएगी और अर्थव्यवस्था में एक सकारात्मक सुचक्र चलेगा।

रेहड़ी पटरीवालों के लिए 5000 करोड़ रुपये का फंड तैयार होगा, जिसमें से उन्हे 10 हजार रुपये तक का कर्ज मिल सकेगा। ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, मनरेगा में मई में पिछले साल मई की तुलना में चालीस से पचास फीसदी रजिस्ट्रेशन ज्यादा है। मनरेगा में काम मांगने वालों की तादाद आने वाले समय में और बढ़ेगी। वजह साफ है कि शहरों से अपने गांवों को गए कामगारों के लिए मनरेगा सहारे का काम कर रही है। अस्तित्व रक्षा के लिए ग्रामीण क्षेत्र में इस योजना का गहरा महत्व है।

पैकेज में यह भी घोषणा है कि दो लाख करोड़ की सुविधा किसानों के लिए होगी। इसमें ढाई करोड़ किसानों को रियायती दरों पर ऋण उपलब्ध कराया जाएगा। आदिवासी इलाकों के लोगों के लिए नौकरी पैदा करने के लिए 6000 करोड़ का फंड बनाया जाएगा। नाबार्ड के जरिए किसानों के लिए 30,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त इमरजेंसी वर्किंग कैपिटल की फंडिंग की जाएगी। इस राशि को तत्काल जारी किया जाएगा। इससे करीब तीन करोड़ किसानों को फायदा पहुंचने की उम्मीद है। यह योजना सीधे तौर पर ग्रामीण भारत एवं किसानों के फायदे के लिए है। एक बहुत बड़ा फैसला सूक्ष्म, लघु और मध्यम की परिभाषा को लेकर लिया गया है। एक करोड़ रुपये तक निवेश करके 5 करोड़ तक का व्यापार करने वाले उद्यम अब सूक्ष्म कहलाएंगे। 10 करोड़ तक का निवेश और 50 करोड़ तक व्यापार करने वाले उद्यमों को लघु उद्यम माना जायेगा और 20 करोड़ तक का निवेश और 100 करोड़ रुपये तक का व्यापार करने वाले उद्यम मध्यम मंझोले माने जाएंगे। यानी निवेश सीमाओं में बढ़ोत्तरी की गई है। देखा गया है कि लघु और सूक्ष्म उद्यम अपने को बढ़ाने में संकोच करते थे कि कहीं बड़े हो गए तो लघु उद्यमों वाली सुविधाएं खत्म न हो जाएं। अब नई परिभाषा के तहत यह सुनिश्चित किया जाएगा कि लघु उद्यम विकास में घबराएं नहीं और एक सीमा तक निसंकोच अपना विकास करते रहें। यानी कारोबारी अब विकास करते रह सकते हैं और सूक्ष्म, लघु और मंझोले उद्यमों को मिलनेवाली छूट भी लेते रह सकते हैं। यह बहुत बड़ी नीतिगत घोषणा है। इसका असर आने वाले कई सालों तक दिखाई देगा।

कुल मिलाकर छोटे किसानों, छोटे उद्यमों और अर्थव्यवस्था के हाशिये पर रह रहे वर्गों को ध्यान मे रखकर ये पैकेज पेश हुए हैं, इनका दूरगामी महत्व है। कोरोना खत्म हो जाएगा पर पैकेज के असर जारी रहेंगे।

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