Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

व्यंग्य : बस, चित्रगुप्त बस

चित्रगुप्त ने अपना चश्मा ठीक करते कहा। पर जहां तक मेरी नॉलिज है, उसे मैंने दो के ही वारंट थमाए थे। तो ये दो साथ में एक्स्ट्रा कहां से?

व्यंग्य : बस, चित्रगुप्त बस
अशोक गौतम-
चित्रगुप्त! जी, जहांपनाह! सामने कुछ दिख रहा है तुम्हें? हां हुजूर! यमदूत चार आत्माएं लेकर आ रहा है। चित्रगुप्त ने अपना चश्मा ठीक करते कहा। पर जहां तक मेरी नॉलिज है, उसे मैंने दो के ही वारंट थमाए थे। तो ये दो साथ में एक्स्ट्रा कहां से? अपने यजमानों के देश में अभी भी टू बाई गेट टू फ्री की सेल तो नहीं लगी है। और ये अपना यमदूत साथ में दो के बदले दो फ्री में ले आया हो?
साहब! सेल तो अब अपने देश के यजमानों के बाजारों में बारहों महीने ही लगी रहती है। पर जहां तक मेरी बेस्ट नॉलिज है, वहां अभी आत्मा माल नहीं हुई है। तो ये सब क्या? पता करो जिस लोक से जीव मरने का समय पूरा होने के बाद भी आने को राजी नहीं होता वहां दो के बदले चार का आना आशंकाओं को जन्म दे रहा है।
कहीं कुछ गड़बड़ तो जरूर है। सर! मैंने अपने पीआरओ से पता किया था कि असल में वहां आजकल व्यापमं नामक भर्ती संस्थान में गड़बड़झाले के चलते..। ये व्यापमं क्या है? पहली बार इसका नाम सुन रहा हूं। सर! वे कह रहे हैं कि ये व्यापमं नहीं, सर्वव्यापमं है। बेरोजगार पढ़े लिखे जीवों को रोजगार देने वाला कोई ग्रुप है। तो क्या वह उन्हें समय से पहले मरने का रोजगार देता है या पेट भरने का? जब तक सीबीआई जांच पूरी नहीं हो जाती तब तक कुछ ही समझ लीजिए हुजूर!
हुजूर, मालूम हुआ है कि वहीं के इस रोजगार देने वाले ग्रुप द्वारा रोजगार देने पर हो रही जांच की आंच के चलते आरोपी, गवाह समय से पहले मौत को गले लगा रहे हैं, यही कारण की हम वांरट अपने यमदूत के पास देते तो दो के हैं पर उनके साथ चार आ जाते हैं। अब मरने के बाद भी अगर मरे को भी मृत्युलोक में छोड़ दिया तो वहां महामारी फैलने का खतरा और भी बढ़ सकता है। वहां पहले ही पर्यावरण कितना दूषित हो चुका है, ये तो पिछली दफा जब आप विशेष अतिथि हो दिल्ली गए थे तो जान गए थे न हुजूर!
बस, चित्रगुप्त बस! उस यात्रा की याद न दिलाओ तो ही बेहतर,कह उन्होने अपनी नाक बंद कर ली। बस हुजूर, यही वजह है कि जब बंदा मर ही जाए तो उसे मरने के बाद चाहकर भी मृत्युलोक में छोड़ा नहीं जा सकता। ओह! कह यमराज ने अपने सिर को अपने दोनों हाथों से परेशान हो पकड़ लिया, तो अब? अब क्या हुजूर, आउट ऑफ वे ही सही।
अब इनका कुछ तो करना ही होगा। यार, कहीं ये उसी ग्रुप के मारे तो नहीं जिनके बारे में पिछले दिनों एक जन सेवक इनके मरने पर धांसू स्टेटमेंट दिए थे कि मरना तो एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। बंदा कहीं भी मरने का हकदार है, चाहे जेल हो या रेल। हां हुजूर! उसी ग्रुप के बंदों के मारे बंदे हैं ये।
पर यार, ये तो बहुत बुरी बात है। रोजगार के नाम पर बंदों से धोखा? यहां भी कबूतरबाजी? पैसे लिए नौकरी देने के और भिजवा दिए यमलोक? हुजूर, अपने यजमानों के देश में अब तो ये सब बात आम है। वहां जनता से पैसे लिए जाते हैं इलाज के और उन्हें थमा दी जाती है मौत!
अपने देश के यजमानों से पैसे वसूले जाते हैं अमृत के और उन्हें पिला दिया जाता है विष। अपने देश में यजमानों से पैसे वसूले जाते हैं दोस्ती के और उनके हाथ में थमा दी जाती है दुश्मनी। जनता से पैसे लिए जाते हैं जवानी देने वाली औषधि के और हाथ आता है बुढ़ापा। बस, चित्रगुप्त बस। और मत कहो, सुनते-सुनते कहीं हमारे कान ही न फट जाएं, कह वे अगले केस सुनने में व्यस्त हो गए।

खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि, हमें फॉलो करें ट्विटर और पिंटरेस्‍ट पर-

Next Story
Top