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व्‍यंग्‍य: आई एम वैरी सॉरी यार! गलत दरवाजे पर दस्तक दे दी थी

हद है यार! आखिर तुम हो क्या? घर में न चाय, न दूध, न चीनी, आखिर तुम्हारे घर में है क्या?

व्‍यंग्‍य: आई एम वैरी सॉरी यार! गलत दरवाजे पर दस्तक दे दी थी
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लगा, बंदा जैसे आज दरवाजा तोड़ कर ही चैन लेगा पर मैं भी क्या कर सकता हूं? इस दरवाजे की किस्मत ही ऐसी है। जबसे लगा है बेचारा बजता ही रहा है पर साहब, देखी इसकी जनता-सी हिम्मत जो टूटने का नाम तक नहीं ले रही। तुम धन्य हो, उनको कुर्सी तक पहुंचाने वाले दरवाजे।

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आ रहा हूं मेरे बाप! कब्ज चल रही है। सुबह-सुबह बाबा का बताया स्वदेशी पानी ले रहा हूं। मैंने फटाफट पानी गले में यों उल्टाया जैसे पड़ोसी शौचालय में नाक पकड़े पानी उड़ेलता है। दरवाजा खोला तो वह अपरिचित बिना राम सलाम के भीतर। मान न मान, मैं तेरा अंग्रेजी मेहमान! कौन हो मेरे भाई? मैंने बंदे की हिम्मत को सलाम करते पूछा।
मित्र! देश भ्रमण पर निकला हूं। तुम्हारे मुहल्ले में आया था सो सोचा तुम्हारे यहां नाश्ता-पानी कर सरकार के जागने से पहले आगे होऊं ! सच कहूं! चाय की बहुत लग रही है, कह उसने मेरे किचिन की ओर ताकना शुरू किया। शुक्र है अविवाहित हूं, वरना मेरी बीवी की ओर ही ताकने लग जाता। आजकल के मेहमानों से राम बचाए।
पर हे अपरिचित! आखिर तुम हो कौन? देश भ्रमण पर क्या उद्देश्य लेकर निकले हो? मेरी उसमें एकाएक जिज्ञासा जागी तो बढ़ती ही चली गई। जनता को मारने निकला हूं! माई नेम इज स्वाइन फ्लू, अपने चेहरे पर हाथ फेरने के बाद मेरा चेहरा देखने लगा। स्वाइन फ्लू? मैंने बिना किसी डर के पूछा तो वह चौंका, हां! मैं स्वाइन फ्लू हूं मेरे दोस्त! आजकल देश भ्रमण पर निकला हूं। देश में पद यात्रा करते करते बहुत थक गया हूं। देखो तो, पांव में छाले पड़ गए हैं। पर क्या करूं, चलना ही जिंदगी है सो..। चाय-वाय पिला दो तो फ्रेश होकर आगे निकलूं। बदन चलते-चलते टूटा जा रहा है, कह वह खुद ही अपनी टांगें दबाने लगा।
पर भाई साहब! एक बात तो बताओ?
बताता हूं। एक नहीं, हजार बताऊंगा पर पहले चाय! राम कसम! चाय पीने को बहुत मन कर रहा है, कह वह फिर किचिन की ओर झांकने लगा। तो मैंने उसकी जिज्ञासा को शांत करते कहा, भीतर कुछ नहीं मित्र! अविवाहित हूं। चाय का इतना ही मन कर रहा है तो उनसे मिल लो। चाय भी हो जाएगी और देश के विकास पर चर्चा भी। पर तुम सब बीमारियां आखिर जनता के द्वार ही क्यों दस्तक देती हो? वहां सिक्ेयोरिटी नहीं होती न! कइयों के दरवाजों पर तो सांकल तक नहीं। घुसना मजे से हो जाता है। पर चाय के लिए पानी रख दो। कहीं सरकार जाग न जाए! चाय तो बन जाएगी पर..। अच्छा ऐसा करो! तुम गैस का सिलेंडर उल्टा-पुल्टा करते रहो, मैं तब तक पड़ोसी से.., मैं कटोरी ले उठने को हुआ तो वह बोला, यार! जरा जल्दी करो!
इससे पहले कि सरकार जागे मैं..। चुनाव होने के बाद अगले चुनाव तक अपने यहां सरकार नहीं जागती। जनता ही दिन रात जागती रहती है। मैं चीनी ले आता हूं। मैंने उठने का अभिनय किया तो वह बोला, बिन चीनी के भी चाय चलेगी। शूगर हो गई है मुझे। तो मैं फिर गिलास उठाने को हुआ तो उसने हैरान हो पूछा, अब क्या? दूध लाने पड़ोसी के यहां जा रहा हूं, और क्या! घर में मैंने कौन सी भैंस बांध रखी है? बिन दूध के ही चाय पिला दे मेरे बाप, वैसे भी मैं ब्लैक टी ही पसंद करता हूं। उसने मेरा गला पकड़ते कहा तो मैंने उससे अपना गला छुड़ाते कहा, अच्छा रुको! पड़ोस से चाय पत्ती ही ले आता हूं।
हद है यार! आखिर तुम हो क्या? घर में न चाय, न दूध, न चीनी, आखिर तुम्हारे घर में है क्या? पानी तो होगा? कि वह भी नहीं? उसने खीझते हुए पूछा तो मैंने अपने से पूछते हुए गुनगुनाया, मैं और मेरी तन्हाई अकसर ये सोचते हैं कि सरकार जागती तो ये होता, सरकार जागती तो वो होता..।
तो कहीं तुम राइटर तो नहीं जो मरने के बाद भी नहीं मरते? सॉरी यार! गलत दरवाजे पर दस्तक दे दी थी। माफ करना, उसने दोनों हाथ जोड़े कांपते हुए कहा तो मैं कुछ कहने के बदले केवल मंद-मंद हंसा। मेरे हंसते ही वह अपना सिर धुनते हुए ऐसे गायब हुआ जैसे गधे कि सिर से सींग।
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