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व्‍यंग्‍य: हिन्‍दी का लेखक, आइफोन-6 और पत्नी की जिद

मुझ जैसा टुटपूंजिया किस्म का लेखक आइफोन-6 लेना तो छोड़ो देखने तक की कल्पना नहीं कर सकता

व्‍यंग्‍य: हिन्‍दी का लेखक, आइफोन-6 और पत्नी की जिद
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मुझे मेरी ‘औकात’ मालूम है, इसीलिए घर-बाहर, न ज्यादा बोलता हूं न टहलता। यों भी, मुझे मेरी औकात में रहकर चीजों-बातों को देखने-पहचानने में ज्यादा ‘सुकून’ मिलता है। मगर पत्नी का क्या करूं, जिसे अपनी तो छोड़िए मेरी औकात का भी अहसास नहीं। एक दफा मुंह से जो बात निकल गई तो निकल गई। बात को पूरा करने की मेरी औकात चाहे हो या न हो, पर जिद करनी है। मैं, सच कहूं, जित्ता अपनी औकात से नहीं घबराता उत्ता पत्नी की जिद से घबराता हूं।

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मंगल ग्रह पर ब्यूटी पार्लर खोलने की जिद से जैसे-तैसे पार पाया हूं कि अब पत्नी ने आइफोन-6 लेने की ठान ली है। पत्नी ने दो-टूक कह दिया है कि इस दफा उसे आइफोन-6 चाहिए ही चाहिए। चाहे कुछ करो। पत्नी को कित्ती ही दफा प्यार-दुलार से समझा चुका हूं कि ‘प्रिय, आइफोन-6 तो क्या साधारण मोबाइल तक लेने की मेरी औकात नहीं और तुम आइफोन-6 लेने की जिद कर रही हो? कुछ पता भी है, आइफोन-6 की कीमत के बारे में! जित्ती आइफोन-6 की कीमत है, इत्ता तो मैं दस जनम लिखकर भी नहीं कमा सकता। मुझ जैसा टुटपूंजिया किस्म का लेखक आइफोन-6 लेना तो छोड़ो देखने तक की कल्पना नहीं कर सकता। और तुमको आइफोन-6 चाहिए। यार, कुछ तो मेरी औकात का ध्यान रखा करो।’

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मगर पत्नी कुछ सुनने-समझने को तैयार नहीं। कहती है, ‘तुम्हारी औकात, बतौर लेखक, मुझे बहुत अच्छे से पता है। दुनिया जहान में बड़े-ऊंचे व्यंग्य-लेखक बने फिरते हो और पत्नी को आइफोन-6 दिलवाने के लिए तुम्हारे कने पैसे नहीं। अपनी किताब अपने खरचे पर छपवाने के लिए तुम्हारे कने पैसे हैं। यहां-वहां से छोटा-बड़ा पुरस्कार-सम्मान लेने के लिए तुम्हारे कने पैसे हैं। पैसा देकर अखबारों-पत्रिकाओं में व्यंग्य छपवाने के लिए तुम्हारे कने पैसे हैं। यारों-दोस्तों के साथ बार में रंगीन महफिलें सजाने के तई तुम्हारे कने पैसे हैं। दहेज में मिली कार में तेल डलवाने के लिए तुम्हारे कने पैसे हैं। बस सिर्फ मेरी छोटी-छोटी ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए तुम्हारे कने पैसे नहीं हैं।’
इत्ता ही नहीं, आगे भी पत्नी का लेक्चर जारी रहा, ‘महज 60 हजार कीमत का आइफोन-6 ही तो मांगा है मैंने, कौन-सी जमीन-जायदाद मांग ली है! तुम्हारी बड़े-बड़े संपादकों-लेखकों-साहित्यकारों से इत्ती जान-पहचान है, ले लो किसी से कुछ उधार। बाद में अपने लेखों के पेमेंट में से कटवाते रहना। या फिर, बैंक से लोन ले लो। अब पांच मिनट से ज्यादा नहीं लगते बैंक से लोन लेने में। जमाना जाने कहां से कहां पहुंच चुका है, मगर तुम हो कि अभी भी टिपिकल हिंदी के लेखक बने हुए हो।’
अब पत्नी क्या जाने हिंदी के लेखक की व्यथा-कथा। मैं चार-पांच अखबारों में छप क्या लेता हूं, वो समझती है कि मैं चेतन भगत जित्ता बड़ा लेखक हो गया हूं। आइफोन-6 लेना मेरे बाएं हाथ का खेल है। जैसे पूरी हिंदी बिरादरी के लेखक-संपादक मुझे ही उधार देने को बैठे हैं। आज जमाना चाहे कित्ता ही क्यों न बदल गया हो पर हिंदी के लेखक का आर्थिक दायरा उत्ता नहीं बदल पाया है प्रिय। कभी-कभी सोचता हूं, हिंदी के लेखक को शादी करनी ही नहीं चाहिए। या फिर उसे हिंदी छोड़कर अंग्रेजी में लिखना चाहिए। अंग्रेजी में पैसा खूब है।
बहरहाल, डरते-डरते पत्नी को बोल दिया है कि ‘मेरी औकात नहीं तुम्हें आइफोन-6 दिलवाने की। चाहो तो सस्ता-सा कोई फोन ले सकती हो, दिलवा दूंगा।’
इत्ता सुन पत्नी ने भी साफ बोल दिया है, ‘ठीक है, कोई नहीं। अब घर में सोने को और मेरे हाथ का बना खाना तुम्हें तब ही मिलेगा जब मुझे आइफोन-6 दिलवा दोगे। तुम्हें क्या पता आइफोन-6 न होने पर बिरादरी में मेरी कित्ती ‘बेइज्जती’ होती है। मेरी फ्रेंड्स मेरे बारे में जाने क्या-क्या कहती हैं। अगर आइफोन-6 दिलवाना हो तो बोलो नहीं तो कट लो।’
क्या कहूं, कुछ कहने की स्थिति में ही नहीं हूं। जित्ता गुस्सा मुझे पत्नी पर नहीं आ रहा, उससे कहीं ज्यादा स्मार्टफोन बनाने वालों पर आ रहा है, मेरी जान के दुश्मन, इत्ता महंगा फोन बनाते ही क्यों है कि मुझ जैसे गरीब पतियों की शादी-शुदा जिंदगी खतरे में पड़ जाए। आइफोन-6 न हुआ, कोहिनूर हो गया!
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