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डॉ. जयंतीलाल भंडारी का लेख : कृषि में जीडीपी की तेज वृद्धि

देश के कृषि क्षेत्र में लगातार जीडीपी बढ़ने के लिए कृषि क्षेत्र की तीन बड़ी अनुकूलताएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती दिखाई दे रही हैं। एक, बढ़ता खाद्यान्न उत्पादन और बढ़ता कृषि निर्यात। दो, देश के छोटे किसानों को मजबूत बनाने के प्रयास। तीन, दलहन और तिलहन उत्पादन को तेजी से बढ़ाने के नए प्रोत्साहन। नि:संदेह इस समय कृषि क्षेत्र की जीडीपी के लगातार बढ़ने का कारण किसानों के अथक परिश्रम, वैज्ञानिकों की कुशलता और भारत सरकार की कृषि एवं किसान हितैषी नीतियां हैं।हाल ही के वर्षों में जिस तरह छोटे किसानों को हरसंभव तरीके से प्रोत्साहन दिए गए, उससे भी कृषि के क्षेत्र में जीडीपी बढ़ी है।

डॉ. जयंतीलाल भंडारी का लेख : कृषि में जीडीपी की तेज वृद्धि
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डॉ. जयंतीलाल भंडारी 

डॉ. जयंतीलाल भंडारी

हाल ही में 31 अगस्त को सरकार के द्वारा जारी किए गए चालू वित्तीय वर्ष 2021-22 की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 20.1 फीसदी की रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई है। कृषि ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र पाया गया है, जिसमें तीन वर्षों की पहली तिमाहियों में लगातार विकास दर बढ़ी है। जहां कृषि में चालू वित्त वर्ष 2021-22 की पहली तिमाही में 4.5 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं पिछले वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही में इस क्षेत्र में 3.5 प्रतिशत वृद्धि हुई थी तथा 2019-20 की समान अवधि में 3.3 फीसदी की वृद्धि हुई थी।

इस समय देश के कृषि क्षेत्र में लगातार जीडीपी बढ़ने के लिए कृषि क्षेत्र की तीन बड़ी अनुकूलताएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती दिखाई दे रही हैं। एक, बढ़ता खाद्यान्न उत्पादन और बढ़ता कृषि निर्यात। दो, देश के छोटे किसानों को मजबूत बनाने के प्रयास। तीन, दलहन और तिलहन उत्पादन को तेजी से बढ़ाने के नए प्रोत्साहन। नि:संदेह इस समय कृषि क्षेत्र की जीडीपी के लगातार बढ़ने का कारण किसानों के अथक परिश्रम, वैज्ञानिकों की कुशलता और भारत सरकार की कृषि एवं किसान हितैषी नीतियां हैं। इन्हीं के कारण देश में रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन एवं खाद्यान्न निर्यात के नए अध्याय लिखे जा रहे हैं। वर्ष 2020-21 में खाद्यान्न उत्पादन करीब 30.86 करोड़ टन की रिकॉर्ड ऊंचाई पर दिखाई दे रहा है। जो पिछले वर्ष की तुलना में 1.11 करोड़ टन अधिक है। भारत विश्व स्तर पर कई कृषि और संबंधित उत्पादों का प्रमुख उत्पादक देश है। देश में दलहन और तिलहन उत्पादन के लिए विभिन्न प्रोत्साहनों से छोटे किसानों ने इसकी उपज को भी बढ़ाया है। वर्ष 2020-21 के दौरान देश में कुल तिलहन उत्पादन रिकॉर्ड 36.10 मिलियन टन अनुमानित है, जो वर्ष 2019-20 के उत्पादन की तुलना में 2.88 मिलियन टन अधिक है। इसी तरह वर्ष 2020-21 में दालों का उत्पादन 2 करोड़ 57 लाख टन रह सकता है। यह पिछले साल के मुकाबले करीब 36 लाख टन ज्यादा है।

हाल ही के वर्षों में जिस तरह छोटे किसानों को हरसंभव तरीके से प्रोत्साहन दिए गए, उससे भी कृषि के क्षेत्र में जीडीपी बढ़ी है। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के मुताबिक फसल बीमा योजना में सुधार, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को डेढ़ गुना करने, किसान क्रेडिट कार्ड से सस्ते दर से बैंक से कर्ज मिलने की व्यवस्था, एक लाख करोड़ रुपये का एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड, सोलर पावर से जुड़ी योजनाएं खेत तक पहुंचाने, 10 हजार नए किसान उत्पादन संगठन, देश के 70 से ज्यादा रेल रूटों पर किसान रेल के माध्यम से छोटे किसानों के कृषि उत्पाद कम ट्रांसपोर्टेशन के खर्चे पर देश के दूरदराज के इलाकों तक पहुंचना तथा छोटे किसानों को अच्छा बाजार मिलने से उनकी उपज का अच्छा मूल्य मिलने से जीडीपी में वृद्धि हुई है। इस समय अनेक कृषि उत्पाद दुनिया के विभिन्न देशों में भेजे जा रहे हैं। यह कोई छोटी बात नहीं है कि मोदी सरकार से पहले सालाना कृषि बजट लगभग 22 हजार करोड़ रुपये का होता था, वहीं वर्ष 2021-22 में इसे लगभग 5.5 गुना बढ़ाकर 1.23 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है। ऐसे कदमों से छोटे किसानों की ताकत बढ़ रही है।

यद्यपि चालू वित्त वर्ष 2021-22 की पहली तिमाही में कृषि क्षेत्र में जीडीपी वृद्धि दर बेहतर रही है, लेकिन अन्य तिमाहियों में कृषि विकास दर के समक्ष दिखाई दे रही चुनौतियों को ध्यान में रखकर उनके निराकरण के कदम उठाने होंगे। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खरीफ की फसल के अंतिम उत्पादन को लेकर चिंता रही है। इस साल जुलाई और अगस्त में बारिश सामान्य से 20-25 प्रतिशत कम थी। बढ़ी संख्या में इन सभी जलाशयों में जल स्तर दक्षिण भारत को छोड़कर हर इलाके में कम है। इसका आगामी रबी की बुआई पर असर पड़ सकता है। इससे सिंचाई और बिजली उत्पादन की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए इसका असर कृषि फसल पर पड़ सकता है। ऐसे में खरीफ की उपयुक्त फसल पाने के लिए मॉनसून तथा बुआई के तरीके पर नजर रखे जाने की जरूरत है। यद्यपि देश गेहूं, चावल और चीनी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर है, लेकिन अब देश में दलहन और तिलहन उत्पादन तेजी से बढ़ाने की जरूरत है। इस दलहन और तिलहन उत्पादन के लिए और अधिक प्रोत्साहन जरूरी हैं। खाद्य तेल के आयात को कम करने और खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता हेतु घोषित किए गए राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन को सफल बनाना जरूरी है। ज्ञात हो कि विगत 18 अगस्त को सरकार ने पाम के तेल के लिए 11,040 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय के साथ राष्ट्रीय खाद्य तेल–पाम ऑयल मिशन (एनएमईओ-ओपी) की मंजूरी दी है। इसका उद्देश्य देश में ही खाद्य तेलों के उत्पादन में तेजी लाना और इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना है।

चूंकि खाद्य तेलों का घरेलू उत्पादन जरूरत की पूर्ति के लिए केवल 30 फीसदी है, इसलिए यह अपर्याप्त तिलहन उत्पादन बाजार में खाद्य तेल के मूल्य को नियंत्रित नहीं कर पाता। परिणामस्वरूप खाद्य तेल का अंतरराष्ट्रीय बाजार देश में खाद्य तेल के दाम को प्रभावित करता है। खाद्य तेल के अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में बदलाव का असर खाद्य तेल की घरेलू कीमत पर तेजी से पड़ता है। इस वर्ष 2021 में खाद्य तेल के घरेलू बाजार पर वैश्विक खाद्य तेल बाजार की बढ़ी हुई कीमतों का काफी अधिक असर गिरते हुए दिखाई दे रहा है। स्थिति यह है कि कृषि प्रधान देश होने के बावजूद भारत को सालाना करीब 65,000 से 70,000 करोड़ रुपये का खाद्य तेल आयात करना पड़ रहा है। भारत खाद्य तेलों का आयात करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश बन गया है। इसी सिलसिले में केंद्र सरकार का बीज मिनी किट कार्यक्रम दलहन व तिलहन की नई किस्मों के अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों की आपूर्ति करके बीज प्रतिस्थापन अनुपात को बढ़ाने के लिए एक प्रमुख कार्यक्रम है।

हम उम्मीद करें कि देश में चालू वित्त वर्ष 2021-22 की आगामी तीन तिमाहियों में कृषि विकास दर और अधिक बढ़ाने के लिए सरकार के द्वारा छोटे किसान, कृषि विकास और खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने की जो योजनाएं लागू की है उनके पूर्ण और कारगर क्रियान्वयन पर अधिकतम प्राथमिकता से ध्यान दिया जाएगा। इससे खाद्यान्न उत्पादन और निर्यात अधिक ऊंचाई पर पहुंचेगा। इससे किसानों की आमदनी व ग्रामीण रोजगार में वृद्धि होने से ग्रामीण क्षेत्र की समृद्धि में भी वृद्धि होगी। परिणामस्वरूप कृषि क्षेत्र की जीडीपी चमकीली होते हुए दिखाई दे सकेगी।

( ये लेखक के अपने विचार हैं। )

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