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प्रतापराव कदम की तीन कविताएं

धर्म कहां, सोमालिया, ब्राण्ड अम्बैसडर च्यवनप्राश की ही बघारता है

प्रतापराव कदम की तीन कविताएं

1. धर्म कहां

वह बकरा जिसे सदाशयता दिखाते
काटा नहीं, बलि नहीं चढाई जिसकी
छोड़ दिया मंदिर के अहाते में
पंडित-पुजारी ने लगाते लंबा टीका.
वह दासी जिसकी शादी आदमी से नहीं
देव के साथ हुई, पत्थर के
देव से बांधा उसे तमाम पत्थरों ने
देवदासी देवदासी पुकारते उसे
बकरा और दासी के बीच धर्म कहां?
मैं ढूंढ रहा हूं
पुजारी के लगाए तिलक में
उस मंत्रोच्चार में
उन मंत्रों में जो
दासी को पत्थर से बांधते हुए
उच्चारे गए, उस धोती में
उस जनेऊ में, चोटी में
ढूंढ रहा हूं मैं
धर्म कहां !
2. सोमालिया
सोमालिया-सोमालिया
कहते-कहते दाने
बिखर जाते हैं
बेसब्री से खेत में
डाल लेते हैं
अपने ही हाथों से
अपने उपर थोड़ी मिट्टी
सोमालिया को याद करते हुए
समय से पहले
अंकुराते हैं दाने
सोमालिया जाने के लिए
झटपट
पकती हैं फसलें
खलिहान से दाने
सोमालिया नहीं
मण्डी जाते हैं
रात के सन्नाटे में
गोदाम से आवाज आती है
सोमालिया-सोमालिया.
3. ब्राण्ड अम्बैसडर च्यवनप्राश की ही बघारता
है
ज़रूरी है साठ के आसपास इसका सेवन
बाज़ार में बहुत से ब्राण्ड हैं पर
खुद बनाओ तो बात दूसरी है
मिसरी मिलाओ शक्कर की जगह फिर देखो
पेन्शन में लगी लाइन में एक ने दूसरे से कहा
महँगाई तो सबको बराबर मारती है
वह फर्क थोड़े करती है
सेवानिवृत और नौकरीशुदा में
महँगाई भत्ता सबको बराबर मिलना चाहिये
नहीं तो चुनाव में यही मुद्दा डुबायेगा इन्हें
दूसरे का जवाब था
आँवला इधर खूब आ रहा
प्राणतत्व च्यवनप्राश का
टेलीफोन में डायल-टोन जिस तरह
रजवाड़ी च्यवनप्राश की बात ही कुछ और है
च्यवनप्राश प्रेमी ने अपना तज़ुर्बा बताया
फोन से उसने मुझे कहा
बस नाम ही है उसका वृद्ध आश्रम
माहौल सुविधा घर जैसी है
कोई तकलीफ नहीं होगी
हम आते रहेंगे माह-दो माह
च्यवनप्राश का बखान कर रहा था जो
यकबयक चुप हो गया
आँखे डबडबा आयी उसकी
जब बैंक क्लर्क ने कहा
जीवित होने का प्रमाण-पत्र लाओ
तब मिलेगी पेन्शन
नहीं कुछ नहीं कहता
च्यवनप्राश का ब्राण्ड अम्बैसडर
पेंशन और वृद्ध आश्रम के बारे में
बस च्यवनप्राश की ही बघारता है
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