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मनोज कुमार झा की कविताएं - ईश्वर की मर्ज़ी से और सांझ एक नदी है

ईश्वर की मर्ज़ी से और सांझ एक नदी है

मनोज कुमार झा की कविताएं - ईश्वर की मर्ज़ी से और सांझ एक नदी है
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1-ईश्वर की मर्ज़ी से
ईश्वर की मर्ज़ी से
होती है छेड़खानी
ईश्वर की मर्ज़ी से ही
होते हैं बलात्कार
ईश्वर की मर्ज़ी से
जिंदा जला दी जाती हैं
औरतें
ये जो इतना ख़ून बहता है
दंगों में
ईश्वर की मर्ज़ी से
जनता से वोट लेकर
चुनाव जीतने वाला नेता
देता है ईश्वर को धन्यवाद
ईश्वर के नाम पर
राज करना चाहते हैं शासक
इस 21वीं सदी में
ईश्वर के नाम पर
हज़ारों मठों-मंदिरों में
पड़ी है अकूत दौलत
भोग लगाता है
पंडा-पुजारी-शंकराचार्य
बाहर कतार में खड़े रहते हैं
भिखमंगे
जूठी पत्तलें चाटने को
युद्ध भी ईश्वर ही करवाता है
खेतों की फ़सल नष्ट कर देता है
क्या ईश्वर ही
कर्ज़ की मार न झेल पाने वाला
किसान
चढ़ जाता है
फांसी पर
तो ये भी ईश्वर की मर्जी
लुटेरों का बहुत बड़ा संऱक्षक
बन गया ईश्वर
तो तोड़ डालो
सारे मठ मंदिर
सदियां गुजर गईं
याद करो
वॉल्तेयर ने क्या कहा था -
'भ्रष्ट गिरजे को नष्ट कर दो।'
2-सांझ एक नदी है
सांझ एक नदी है
थिर जल में
परछाइयां हैं
अनुभवों का रूपाकार
उद्घटित होता है
कई रंगों के मेल से
बने बिंब प्रतिबिंबित होते हैं
तुम्हारा प्रेम
घुल गया है
निर्विकार
वहां बहुतेरे सन्नाटे
सिसकियों की
अनुगूंजें
विस्मृतियों से निकल
चोटिल करती लहराती हैं
डूबता हूं
इस सांझ में
तो तैरता शव
नग्न स्त्री का...
इस सांझ को
यहां देखो
इस किनारे पेड़ पर
लटक रही है लाश
नग्न बालिका की
बलत्कृत
नदी किनारे
फूंक दी जाती है
होता है ब्रह्मभोज
बलत्कृत आत्मा की
मुक्ति के लिए
इस नदी के पार
पहाड़-सी रात है।

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