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अवधेश कुमार का लेख : नेपाल में सत्ता परिवर्तन सुखद

देउबा जैसे संयमित और संतुलित व्यक्तित्व वाले से यही उम्मीद है कि नेपाल ने लोकतंत्र को कुचलने के ओली के आचरण की जो पीड़ा भुगती है उसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी और नेपाल सुख, शांति व समृद्धि के मार्ग पर नए सिरे से अग्रसर होगा। नेपाल में संसदीय लोकतंत्र के लिए यह परीक्षा का समय है। जहां तक भारत की बात है तो देउबा को इसके साथ संबंधों का व्यापक अनुभव है। वे जानते हैं कि कोई दूसरा देश भारत जैसा उनका हित चाहने वाला नहीं हो सकता। संभावना इसी बात की है कि ओली ने भारत से संबंधों की गला घोटने का जो रवैया अपनाया उसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी, लेकिन यह निर्भर करेगा कि सरकार शेष बचा कार्यकाल पूरा करे।

अवधेश कुमार का लेख : नेपाल में सत्ता परिवर्तन सुखद
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अवधेश कुमार

अवधेश कुमार

नेपाल में शेर बहादुर देउबा का प्रधानमंत्री पद पर आसीन होना निस्संदेह सुखद घटना है। भारत के अंदर भी लोगों ने दिल खोलकर इसका स्वागत किया है। वस्तुतः पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली अपने कार्यकाल में जिस ढंग से वहां लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ-साथ लोकतंत्र की भावनाओं को दरकिनार कर अपनी सत्ता बनाए रखने का तिकड़म करते रहे उससे नेपाल के राजनीतिक भविष्य पर प्रश्न चिह्न खड़ा हो गया था। उच्चतम न्यायालय ने अपने आदेश से तत्काल लोकतंत्र को बचा लिया है। प्रधान न्यायाधीश चोलेन्द्र शमशेर राणा की अगुवाई वाली पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने अपने आदेश में कहा कि देउबा को संविधान के अनुच्छेद 76(5) के तहत प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाना चाहिए। न्यायालय ने 167 पृष्ठों के फैसले में विद्या भंडारी को आदेश दिया कि जहां गलतियां हुई हैं वहां से सुधार कर संसद को बहाल करें और प्रधानमंत्री नियुक्त करें। संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में किसी उच्चतम न्यायालय का यह असाधारण आदेश था। राष्ट्रपति को आदेश देने का उदाहरण शायद ही किसी देश में मिलेगा।

वास्तव में राष्ट्रपति भंडारी ने अपना संवैधानिक दायित्व ईमानदारी से निभाया होता तो मामला उच्चतम न्यायालय तक जाता ही नहीं और नेपाल का लोकतंत्र इस ढंग से विरूपित नहीं होता। ट्रेजडी देखिए कि जिस राष्ट्रपति पर लोकतंत्र और संविधान की रक्षा का दायित्व था उन्होंने ओली के किसी भी असंवैधानिक और फासीवादी कदम को खारिज नहीं किया। 10 मई, 2021 को ओली संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा में विश्वास मत नहीं प्राप्त कर सके। विपक्षी दलों के गठजोड़ को राष्ट्रपति ने बहुमत दिखाने के लिए 21 मई की तिथि निर्धारित की, लेकिन अचानक संविधान के अनुच्छेद 76(3) को आधार बनाकर 13 मई को ही ओली को फिर से प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया। कहा गया कि ओली के पास ही सर्वाधिक सांसदों 153 का समर्थन है। यह सफेद झूठ था। देउबा के समर्थन में उनकी पार्टी नेपाली कांग्रेस के अलावा नेकपा माओवादी केंद्र, नेकपा एमाले का माधव कुमार नेपाल गुट, जनता समाजवादी पार्टी का उपेंद्र यादव धरा और राष्ट्रीय जन मोर्चा सामने खड़ी थी। इन्होंने 149 सांसदों के हस्ताक्षर वाला समर्थन पत्र भी राष्ट्रपति को सौंप दिया। इसके बावजूद राष्ट्रपति ने इनका दावा स्वीकार नहीं किया। हालांकि राष्ट्रपति और ओली के विरुद्ध नेपाल में जगह-जगह प्रदर्शन हुए। राष्ट्रपति ने ओली के साथ मिलकर शर्मनाक खेल खेला। 22 मई की देर रात्रि संसद भंग कर संविधान के अनुच्छेद 76(7) के अंतर्गत मिले अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए 12 और 19 नवंबर को दो चरणों में चुनाव कराने का आदेश दे दिया। राष्ट्रपति द्वारा संविधान और लोकतंत्र का किस ढंग से खिलवाड़ किया गया इसे समझने के लिए यह भी जानना जरूरी है कि ओली की कैबिनेट इसके लिए देर रात 12 बजे के बाद बैठी और उसने संसद भंग करने के साथ आम चुनाव कराने की सिफारिश कर दी। शेर बहादुर देउबा अपनी समर्थक पार्टियों के साथ उच्चतम न्यायालय गए और फैसला हमारे सामने है।

राष्ट्रपति ने पहली बार संविधान के विरुद्ध काम नहीं किया। ओली ने पिछले वर्ष भी बहुमत खोया था, लेकिन इस्तीफा न देकर उन्होंने 30 दिसंबर, 2020 को प्रतिनिधि सभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश कर दी और राष्ट्रपति भंडारी ने 30 अप्रैल व 10 मई को चुनाव कराने का आदेश भी दे दिया। उस समय भी उच्चतम न्यायालय ने 24 फरबरी को प्रतिनिधि सभा को बहाल कर संविधान की रक्षा की। शेर बहादुर देउबा को संविधान के प्रावधान के तहत एक महीने के अंदर बहुमत साबित करना है। अंकगणित देखें तो 275 सदस्यों वाली प्रतिनिधि सभा में 271 सदस्य हैं। नेपाली कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के दो-दो सांसद निलंबित हैं। बहुमत के लिए 136 का समर्थन चाहिए। 149 का समर्थन पहले से घोषित था, लेकिन माधव नेपाल ने इस गठबंधन से अलग होने की बात कही है तो सत्ता में हिस्सेदारी का मोलभाव होगा। न्यायालय ने सांसदों को यह अधिकार भी दिया है कि विश्वासमत पर फैसला करने के लिए वह स्वतंत्र हैं। देउबा को इसका लाभ भी मिल सकता है। देउबा अपने जीवन काल में पांचवी बार प्रधानमंत्री का पद संभाल रहे हैं। कई पार्टियों की मिली जुली सरकार के अस्थिर होने का खतरा हमेशा रहता है। ओली चुपचाप बैठे होंगे ऐसा मानना बेमानी है, किंतु उनके हाथ अब सत्ता नहीं है जिसका लाभ उन्हें मिले। गठबंधन के नेताओं ने ओली के विरुद्ध तथा लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए जिस तरह संघर्ष किया उसे निष्फल न होने देने की जिम्मेदारी इन्हीं की है। इसमें ज्यादातर नेता अनुभवी हैं। स्वयं शेर बहादुर देउबा सामंजस्य और समन्वय से काम करने वाले नेता है। उनसे यही आशा बंधती है कि थोड़े बहुत मतभेदों को वह मिल जुलकर दूर करते रहेंगे।

इसे नेपाल का दुर्भाग्य कहेंगे कि जब कठोर परिश्रम कर देश को समृद्धि की ओर ले जाने वाली सरकार चाहिए थी और उसे बहुमत भी प्राप्त था तो ओली ने संविधान के शासन की ही धज्जियां उड़ा दी। 2017 में लोगों ने दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों को मिलाकर बहुमत दिया था। दोनों ने अपना विलय कर एनसीपी भी बनाई, लेकिन ओली ने सीपीएन माओवादी के नेता प्रचंड को समझौते के तहत ढाई साल बाद प्रधानमंत्री पद देने की स्थिति को ही खत्म करने की कोशिश की। अगर लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता जताते हुए ढाई साल बाद प्रचंड को सत्ता सौंपने के वादे का मन बनाकर काम करते तो नेपाल में सुख, शांति और समृद्धि की ओर अग्रसर होने की ठोस नींव पड़ सकती थी। पिछले दो वर्ष से अधिक का समय तो बहुमत के जुगाड़ के लिए हर पार्टी में सेंध लगाने तथा प्रचंड को कमजोर करने के लिए सत्ता के दुरुपयोग में चला गया। इसी के तहत उन्होंने अतिवादी नीति अपनाई तथा चीन को देश में खुला खेलने की छूट दे दी। चीन भी उनकी सत्ता कायम रहने के लिए वहां की राजनीति में हस्तक्षेप करता रहा। इन सबके विरुद्ध आसंतोष और विद्रोह होना ही था और हुआ भी। शेर बहादुर देउबा जैसे संयमित और संतुलित व्यक्तित्व वाले से यही उम्मीद है कि नेपाल ने लोकतंत्र को कुचलने के ओली के आचरण की जो पीड़ा भुगती है उसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी और नेपाल सुख, शांति व समृद्धि के मार्ग पर नए सिरे से अग्रसर होगा।

नेपाल में संसदीय लोकतंत्र के लिए यह परीक्षा का समय है। जहां तक भारत की बात है तो देउबा को इसके साथ संबंधों का व्यापक अनुभव है। वे जानते हैं कि कोई दूसरा देश भारत जैसा उनका हित चाहने वाला नहीं हो सकता। संभावना इसी बात की है कि ओली ने भारत के साथ स्थापित संबंधों की गला घोटने का जो खतरनाक रवैया अपनाया उसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी, लेकिन सब कुछ इसी पर निर्भर करेगा कि सरकार स्थिर होकर शेष बचा कार्यकाल पूरा करे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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