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पाक को तय करना होगा अपना भविष्य

पाक अपने पड़ोसियों की विकास यात्रा को रोकने के लिए वह आतंकवादियों का इस्तेमाल सरकारी नीति के रूप में कर रहा है।

पाक को तय करना होगा अपना भविष्य
अब पाकिस्तान के लिए वह वक्त आ गया है, जब उसे तय करना है कि बर्बादी की तरफ बढ़ते रहना है या आत्मविश्लेषण करके अपनी छवि सुधारने के लिए अपनी नीतियों में आमूल-चूल बदलाव करना है। हाल ही में जो कुछ घटा है, उसने एक राष्ट्र के तौर पर पाकिस्तान की छवि को मटियामेट करके रख दिया है। यह पहला मौका है, जब पाक के भीतर से ही यह आवाज तेजी से उठी है कि वहां के हुक्मरान अपनी विदेश नीति को जल्दी से जल्दी दुरुस्त करें।
कई तरह की अंदरूनी दिक्कतों से घिरे इस मुल्क में गिलगित-बाल्टिस्तान, पीओके, सिंध और बलूचिस्तान में ठीक वैसी ही आवाजें उठनी शुरू हो चुकी हैं, जैसी 1971 से पहले पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में शुरू हुई थी। पंजाबी बहुल्य पाक सेना ने इन आवाजों को बंद करने के लिए जिस तरह का दमनचक्र बांग्लादेशियों पर चलाया था, ठीक वैसा ही मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन बलूचिस्तान, कराची और पीओके में देखने को मिल रहा है।
अब केवल भारत ही नहीं, पूरी दुनिया इस हकीकत को जान चुकी है कि अपने पड़ोसियों को परेशान करने, उनकी विकास यात्रा को रोकने और ब्लैकमेल करने के लिए वह आतंकवादियों का इस्तेमाल सरकारी नीति के रूप में कर रहा है। दुनिया का शायद ही कोई देश ऐसा हो, जहां आतंकियों के पैर पड़े हों उसका लिंक पाकिस्तान से नहीं हो। खुद को आतंकवाद से पीड़ित बताने और भारत व अफगानिस्तान पर झूठे आरोप मढ़कर अपनी कुटिलताओं पर परदा डालने की कोशिश करने वाले पाकिस्तान की दलीलों पर अब कोई सहज रूप से भरोसा तक करने को तैयार नहीं है।
नवाज शरीफ ने बुरहान वानी को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच पर जिस तरह का झूठ बोला, उसने रही-सही कसर पूरी कर दी। प्रधानमंत्री मोदी ने कई अवसरों पर उनकी तरफ खुले दिल से दोस्ती का हाथ बढ़ाया, परन्तु हमेशा की तरह पाकिस्तानी सेना, आईएसआई और उग्रवादी जमातों ने भारत की पीठ में छुरा घोंपने का काम किया। पहले पठानकोठ एयरबेस पर हमला किया गया और 18 सितंबर को उरी में सैन्य प्रतिष्ठान पर अटैक कर 18 सैनिकों की हत्या कर डाली।
भारत के सब्र की भी एक सीमा है। अंतत: मोदी सरकार ने तय कर लिया कि अब वह पाक को पूरी दुनिया में अलग-थलग करके रहेगा। दो मोचरें पर काम किया गया। कूटनीतिक फैसला लेकर भारत ने नवंबर में पाक में होने वाले सार्क सम्मेलन से खुद को अलग कर लिया, जिसके बाद बांग्लादेश, अफगानिस्तान, भूटान, र्शीलंका और नेपाल ने भी उसका बहिष्कार कर दिया। इससे पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय जगत में भारी फजीहत हुई क्योंकि ऐसा कभी नहीं हुआ कि जिसे समिट की मेजबानी करनी है।
उस देश का आधे से ज्यादा सदस्य देश बहिष्कार कर दें। दूसरा काम भारतीय सेना ने यह किया कि पीओके में घुसकर उन आतंकी ठिकानों को ध्वस्त कर दिया, जहां पाक सेना की मदद से वो भारत में घुसपैठ की तैयारी कर रहे थे। पाक हुक्मरान इसे लेकर भी पूरी तरह एक्सपोज हुए। एक तरफ वो भारत की कार्रवाई से इनकार करते रहे। दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र संघ में शिकायत दर्ज करते मिले।
इससे उनकी छवि खुद अपने देश की जमता की निगाहों में दो कौड़ी की रह गई। वहां के लोग भी अपनी सरकार और सेना के इस दावे पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं कि भारतीय सेना ने सजिर्कल स्ट्राइक नहीं की है। इस बीच शक्तिशाली अमेरिका, चीन, रूस से लेकर छोटे देशों नेपाल, र्शीलंका और मालदीव तक ने पाक को नसीहत दे डाली कि वह अपनी जमीन में पनप रहे आतंक को खत्म करे।
अभी उरी हमले के भारतीय प्रतिकार से ही पाकिस्तान नहीं उबर सका है कि बारामूला में फिर सैन्य ठिकाने पर अटैक हो गया। इससे पता चलता है कि वहां की सेना और उग्रवादी संगठन पूरी तरह बेलगाम हो चुके हैं, जो पाक सरकार की पूरी दुनिया में फजीहत करवा रहे हैं। अगर अब भी वहां की सरकार ने छवि सुधाने के गंभीर प्रयास शुरू नहीं किए तो बहुत देर हो चुकी होगी।
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