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आर्थिक असमानता की चौड़ी होती खाई

एक फीसदी लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का करीब आधा हिस्सा ।

आर्थिक असमानता की चौड़ी होती खाई
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इस कटु सच्चाई से शायद ही कोई इंकार कर सकता है कि विकास के मौजूदा तौर-तरीके दुनियाभर में लोगों के बीच आर्थिक गैरबराबरी को जन्म दे रहे हैं। जानीमानी संस्था क्रेडिट सूइस द्वारा जारी ग्लोबल वेल्थ डाटाबुक-2014 के अनुसार भारत में शीर्ष के दस फीसदी लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का 74 फीसदी हिस्सा है। वहीं बॉटम के दस फीसदी लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का सिर्फ 0.2 फीसदी हिस्सा है। इतना ही नहीं शीर्ष एक फीसदी लोगों के पास तो देश की कुल संपत्ति का करीब आधा हिस्सा है। साल 2000 से अब तक इन धनकुबेरों की संपत्ति में दस फीसदी का इजाफा हुआ है।

जबकि आईने का एक दूसरा पहलू भी हैजिसके अनुसार देश की करीब अस्सी फीसदी आबादी रोजाना बीस रुपये पर गुजारा करने को अभिशप्त है। यह जानकर हैरानी होती है कि दुनिया की आधी आबादी के पास जितनी संपत्ति है उतनी संपत्ति दुनियाभर के केवल 85 धनी व्यक्तियों के पास है। इन तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि देश में एक ओर अरबपतियों की संख्या और उनकी दौलत में दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ोतरी हो रही है, वहीं दूसरी ओर गरीबों की हालत बाद से बदतर होती जा रही है। सत्तर और अस्सी के दशक के शुरुआती कुछ वर्षों तक देश में गरीबी और अमीरी के बीच इतना गहरा फर्क नहीं दिखाई देता था, जितना आज दिखने लगा है। गैरबराबरी का यह दृश्य आज हम खुली आंखों से देश में हर स्तर पर देख सकते हैं। इस गैरबराबरी की एक बड़ी वजह 1991 से शुरू की नई आर्थिक नीतियां हैं।

इन सुधारों का पारंपरिक अमीरों और नए पंूजीपति वर्ग ने जमकर फायदा उठाया है। नेताओं, नौकरशाहों और बिजनेसमैन के गठजोड़ से क्रोनी कैपिटलिज्म का नया दौर शुरू हुआ। सार्वजनिक संसाधनों का कुछ लोगों द्वारा अपने हित में जमकर दुरुपयोग किया गया। इसमें कोई शक नहीं है कि उदारीकरण के कारण देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में तेजी आई है। वह दो से तीन फीसदी के हिंदू वृद्धि दर के दौर से बाहर निकलकर सात से नौ फीसदी रफ्तार वाले हाई-वे पर पहुंच गई है। इस तेज वृद्धि दर के साथ देश में बड़े पैमाने पर सम्पदा और समृद्धि भी पैदा हुई है, लेकिन इसके साथ ही यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि यह समृद्धि कुछ ही हाथों में सिमटकर रह गई है। इसका समान और न्यायपूर्ण बंटवारा नहीं हुआ है। इसका नतीजा यह हुआ है कि इस दौर में जहां अमीरों और उच्च मध्यवर्ग की संपत्ति और समृद्धि में तेजी से इजाफा हुआ है, वहीं गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों की स्थिति और खराब हुई है।

देश में तीव्र असमानता के लिए लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकारें भी काफी हद तक जिम्मेदारी रही हैं। वे संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण पर ध्यान देने की बजाय वोट बैंक की राजनीति करती रहीं। भले ही गरीबों को लेकर हमारे यहां लंबी-चौड़ी बातें होती हों, लेकिन आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए कोई तार्किक पहल नहीं की गई। देश में अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ रही आर्थिक असमानता से समाज में कई विकृतियां भी पैदा हुई हैं। अब केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ पहली बार सत्ता में आई भाजपा की सरकार ने इस दिशा में कुछ उम्मीद जगाई है। दरअसल, सत्ता में आने के कुछ ही दिन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांसद के सभागार में कहा था कि उनकी सरकार देश के गरीबों और वंचितों के लिए काम करेगी।

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