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वन बेल्ट वन रोड: ब्रिटेन भी चीन की चाल को समझा

वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) प्रोजेक्ट के पीछे चीन की मंशा केवल आर्थिक ही नहीं सामरिक व कूटनीतिक भी है, इसे सबसे पहले भारत ने पहचाना था।

वन बेल्ट वन रोड: ब्रिटेन भी चीन की चाल को समझा

वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) प्रोजेक्ट के पीछे चीन की मंशा केवल आर्थिक ही नहीं सामरिक व कूटनीतिक भी है, इसे सबसे पहले भारत ने पहचाना था। चीन ने करीब दो साल पहले जब ओबीओआर का जोर-शोर से शुभारंभ किया था, तब उस मौके पर चीन ने करीब सवा सौ देशों को सम्मेलन में आने का न्योता दिया था। भारत ने चीन की कुटिल मंशा भांपकर उस सम्मेलन में नहीं जाने का फैसला किया था। इसको लेकर चीन ने भारत के खिलाफ वितंडा खड़ा किया था।

चीन ने अलग-अलग तरीके से भारत के प्रति विरोध जताया और परेशान किया। अरुणाचल, उत्तराखंड और भूटान सीमा पर डोकलाम विवाद भी चीन की भारत को सताने की सोची-समझी रणनीति थी। डोकलाम विवाद पर वैश्विक स्तर पर चीन को ही शर्मिन्दगी झेलनी पड़ी। दुनिया में चीन की दूसरे देशों को परेशान करने वाले देश की छवि बनी। चीन के ओबीओआर सम्मेलन में अमेरिका व ब्रिटेन ने हिस्सा जरूर लिया था, लेकिन दोनों देशों के राष्ट्रप्रमुखों ने शिरकत नहीं की थी।

कुछ दिन पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने चीन के ओबीओआर प्रोजेक्ट के पीछे की मंशा पर सवाल उठाया था और अब ब्रिटेन की ओर से ओबीओआर को लेकर चीन पर शक जताया जाना दर्शाता है कि धीरे-धीरे दुनिया को समझ आ रहा है कि चीन रोड प्रोजेक्ट के बहाने अपने सामरिक उद्येश्य को विस्तार दे रहा है और भारत का विरोध बेमकसद नहीं था।

ब्रिटेन ने कहा है कि ओबीओआर से संबंधित मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) पर दस्तखत नहीं करेगा। बताया जा रहा है कि इस प्रोजेक्ट के ग्लोबल स्टैंडर्ड और चीन के राजनीतिक मकसद को लेकर ब्रिटेन को गंभीर शक है। दुनियाभर के तमाम विशेषज्ञ इस प्रोजेक्ट को चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के तौर पर देखते हैं। 900 अरब डालर के इस प्राजेक्ट का ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने कभी भी औपचारिक समर्थन नहीं किया है।

ब्रिटिश पीएम को ओबीओआर की वजह से साइबर सिक्युरिटी की भी चिंता है। समझने वाली बात यह भी है कि थेरेसा मे प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने पहले चीन दौरे पर गई थीं। इस दौरान उन्होंने चीन को अपना स्वाभाविक सहयोगी बताया था, लेकिन ओबीओआर का समर्थन नहीं किया था। ओबीओआर के जरिये चीन पड़ोसी देशों के अलावा यूरोप को सड़क से जोड़ना चाहता है। ओबीओआर चीन को दुनिया के कई बंदरगाहों से भी जोड़ देगा।

चीन न्यू सिल्क रोड के नाम से जानी जाने वाली ओबीओआर परियोजना के तहत छह आर्थिक गलियारे बना रहा है। ये छह हैं-चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा, न्यू यूराशियन लैंड ब्रिज, चीन-मध्य एशिया-पश्चिम एशिया आर्थिक गलियारा, चीन-मंगोलिया-रूस आर्थिक गलियारा, बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार आर्थिक गलियारा और चीन-इंडोचाइना-प्रायद्वीप आर्थिक गलियारा। चीन का लक्ष्य इन आर्थिक गलियारों के जरिए जमीनी और समुद्री परिवहन का जाल बिछाना है।

चीन ने एशिया, यूरोप और अफ्रीका को सड़क मार्ग, रेलमार्ग, गैस पाइप लाइन और बंदरगाह से जोड़ने के लिए 'वन बेल्ट, वन रोड' के तहत सिल्क रोड इकोनॉमिक बेल्ट और मैरीटाइम सिल्क रोड परियोजना शुरू की है। ओबीओआर के जरिए चीन से आना-जाना, व्यापार करना काफी आसान हो जाएगा। दरअसल चीन ओबीओआर के सहारे आर्थिक मंदी से उबरना चाहता है और बेरोजगारी से निपटना चाहता है।

इस प्रोजेक्ट में करीब 60 देशों को शामिल कर उनके संसाधनों व पैसों का इस्तेमाल चीन अपने हित में करना चाहता है। भारत को चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे पर गहरी आपत्ति है। यह गलियारा गिलगिट और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) के बालटिस्तान से होकर गुजरता है। भारत पीओके सहित समूचे जम्मू-कश्मीर राज्य को अपना अखंड हिस्सा मानता है। चीन ने बिना भारत की अनुमति गलियारे का निर्माण शुरू किया है।

बीसीआईएम गलियारे पर भी भारत सहमत नहीं है। अब जिस तरह से भारत को ओबीओआर के विरोध में वैश्विक समर्थन मिल रहा है, उससे चीन की सिल्क रूट की राह आसान नहीं रहने वाली है। विश्व में चीन की सामरिक महत्वाकांक्षा पर लगाम लगाया जाना भी जरूरी है।

दुनिया में शक्ति संतुलन बना रहेगा, तभी विश्व के सभी देश विकास कर सकेंगे। एक प्रोजेक्ट से चीन 50 से अधिक देशों को कर्ज के दुश्चक्र में नहीं धकेल सकता है। यह चीन को हक नहीं है। ओबीओआर से करीब 59 देशों की संप्रभुता खतरे में पड़ सकती है। विश्व को यह बात समझनी होगी।

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