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डाॅ. अश्विनी महाजन का लेख : वायरस का उदगम ढूंढना जरूरी

समझना होगा कि कोरोना वायरस के उद्भव के स्रोत को जाने बिना इस समस्या के समाधान का कोई रास्ता नहीं निकलेगा। हालांकि डब्ल्यूएचओ ने प्रयोगशाला से वायरस निकलने की बात को स्वीकार नहीं किया और मार्च 2021 में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में कहा कि यह चीन के पशु बाजार से निकला हुआ वायरस है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह वायरस चमगादड़ में से निकलकर किसी और जीव से होता हुआ मानवों में प्रवेश कर गया। हालांकि रिपोर्ट में यह भी नहीं कहा गया कि यह वुहान की प्रयोगशाला से नहीं निकला। चूंकि डब्ल्यूएचओ चीन के दबाव में है, इसलिए वह प्रयोगशाला को स्पष्ट रूप से वायरस का उद्भव नहीं बता पाया।

डाॅ. अश्विनी महाजन का लेख : वायरस का उदगम ढूंढना जरूरी
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डाॅ. अश्विनी महाजन

डाॅ. अश्विनी महाजन

पिछले लगभग सवा साल से जिस महामारी से विश्व और मानवता गुजर रही है, उसके प्रारंभ की जानकारी लेने का अधिकार सबको है। हालांकि यह बात कि कोरोना वायरस वुहान (चीन) की एक प्रयोगशाला में तैयार किया गया, वह जानबूझकर या दुर्घटनावश प्रयोगशाला के बाहर आ गया था, लगभग महामारी की शुरुआत से ही चर्चा में है। न्यू इंडिया एक्सप्रेस में मार्च 2020 को प्रकाशित एक लेख 'मैनीलेसंस फ्रॉम चाइनीस वायरस' में इस वायरस को चीनी वायरस करार दिया था। लगभग उसी समय अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी बार-बार 'चाइनीज वायरस' शब्द दोहरा रहे थे। कुछ लोगों का यह कहना है कि शायद डोनाल्ड ट्रंप के चीन के साथ तल्ख रिश्तों के कारण उनकी बातों को मीडिया ने हल्के में लिया और इस महामारी के पीछे कोई षड्यंत्र भी हो सकता है, इस बात की ठीक से तहकीकात नहीं की,

लेकिन हाल ही में कई शोधपरक खुलासे सामने आ रहे हैं, जिससे आभास होता है कि यह वायरस वास्तव में वुहान इंस्टीट्यूट की प्रयोगशाला से ही निकला है। समझना होगा कि चाहे दिखावे के लिए ही सही विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कोरोना वायरस के प्रारंभ के बारे में अध्ययन कर रहा है। स्वाभविक रूप से उसे इसके लिए चीन से ही सुराग मिल सकता था।

समझना होगा कि कोरोना वायरस के उद्भव के स्रोत को जाने बिना इस समस्या के समाधान का कोई रास्ता नहीं निकलेगा। हालांकि डब्ल्यूएचओ ने प्रयोगशाला से वायरस निकलने की बात को स्वीकार नहीं किया और मार्च 2021 में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में कहा कि यह चीन के पशु बाजार से निकला हुआ वायरस है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह वायरस चमगादड़ में से निकलकर किसी और जीव से होता हुआ मानवों में प्रवेश कर गया। हालांकि रिपोर्ट में यह भी नहीं कहा गया कि यह वुहान की प्रयोगशाला से नहीं निकला। चूंकि डब्ल्यूएचओ चीन के भारी दबाव में है, इसलिए वह वुहान प्रयोगशाला को स्पष्ट रूप से वायरस का उद्भव नहीं बता पाया, लेकिन इस आशंका को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता, इसलिए रिपोर्ट को 'अनिर्णीत' बताकर अमेरिका को भी संतुष्ट करने का प्रयास संगठन ने किया है। साथ ही रिपोर्ट में शामिल हर विषय पर कहा गया है कि उसके लिए और अध्ययन की जरूरत है, लेकिन विशेषज्ञों की एक बड़ी जमात ने इस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया है और वे लोग लगातार इसमें आगे और तहकीकात कर रहे हैं। आज बीसियों अध्ययन एवं शोध पत्र प्रकाशित हो रहे हैं जो साफ तौर पर वुहान प्रयोगशाला से जानबूझकर या दुर्घटना बस वायरस के लीक होने की ओर इंगित कर रहे हैं। दुनियाभर के अधिकांश विशेषज्ञ डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट को सिरे से नकार रहे हैं। उनका कहना है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन को जिन विषयों के बारे में तहकीकात करनी थी वह की ही नहीं।

इस महामारी के शुरुआती दौर से ही डब्ल्यूएचओ और उसके प्रमुख टेडरोज संदेह के घेरे में है। ह्यूमन राइट्स वॉच के डायरेक्टर केन राथ का कहना है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन 'संस्थागत मिलीभगत' का दोषी है। यह उन्होंने डब्ल्यूएचओ के उस संदर्भ में कहा है जब उसने चीन की इस बात को आंख मूंदकर मान लिया था कि यह संक्रमण मानव से मानव में नहीं फैलता है, जबकि चीन में संक्रमण प्रारंभ हो ही चुका था, इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के कहे पर विश्वास नहीं किया जा सकता।

यह बात किसी से छुपी नहीं है कि डब्ल्यूएचओ की कुल फंडिंग का 86 मिलियन चीन से, 532 मिलियन गेट्स फाउंडेशन से और 371 मिलियन गेट्स फाउंडेशन की ही सहयोगी संस्था गावि एलायंस से आता है। यानी संगठन पूरी तरह से चीन और गेट्स फाउंडेशन के प्रभाव में है। गौरतलब है कि जब-जब यह आवाज दुनिया में उठी कि इस वायरस का उद्भव चीन से हुआ और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चीन की भूमिका को उजागर नहीं किया। बिल गेट्स ने भी चीन का बचाव करने की कोशिश की और कहा कि वास्तव में चीन ने महामारी के शुरू से ही बहुत अच्छा काम किया है और विश्व स्वास्थ संगठन असाधारण एजेंसी है। यानी यदि तारों को जोड़ा जाए तो चीन डब्ल्यूएचओ और बिल गेट्स और उनकी गेट्स फाउंडेशन के बीच नापाक रिश्तों की साफ झलक मिलती है। उनकी यह बात भी दुनिया में छुपी हुई नहीं है कि डब्ल्यूएचओ के प्रमुख टेडरोज की चीन में भी प्रमुख भूमिका रही है। यह नापाक रिश्ते किस प्रकार से दुनिया में तबाही का सबब बन रहे हैं यह दुनिया के सामने स्पष्ट रूप से आ रहा है। यह वायरस जिसे कोरोना वायरस कहें, वुहॉन वायरस या चीनी वायरस, सबसे पहले चीन की वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी से (जिसे कहा गया कि दुर्घटनावश) निकला। चीन को उसकी जानकारी तुरंत नवंबर 2019 को हो गई थी, लेकिन भारत को इस बाबत जानकारी जनवरी के अंत तक ही दी गई थी। यही नहीं कि जानकारी देने में देरी की गई, वास्तव में इस देरी में भी षड्यंत्र झलक रहा है। गौरतलब है कि 14 जनवरी 2020 को विश्व स्वास्थ संगठन ने एक ट्वीट के माध्यम से इस महामारी के मानव से मानव को होने वाले संक्रमण को नकारा गया था। ट्वीट में कहा गया "चीनी अधिकारियों द्वारा दी गई प्रारंभिक जांच में वुहान चीन में पहचाने गए नए कोरोना वायरस (2019) के मानव से मानव संक्रमण का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला है।" विश्व स्वास्थ्य संगठन के इस रुख के चलते इतने भयानक वायरस का मानव से मानव संक्रमण को रोकने का रत्ती भर भी प्रयास नहीं हुआ। चीन से दुनियाभर के मुल्कों को जाने वाली हवाई उड़ानें बदस्तूर चलती रही और चीन से यह वायरस पूरी दुनिया में फैल गया। डब्ल्यूएचओ ने इस गलती की जिम्मेवारी भी स्वीकार नहीं की गई।

शोधपरक अध्ययनों से अब अमेरिका की संस्थाओं और व्यक्तियों के चीन के साथ संबंध भी जो तथ्य सामने आ रहे हैं उनके अनुसार वुहान इंस्टिट्यूट ऑफवायरोलोजी के शोधकर्ता 'गेन ऑफ फंक्शन' प्रयोग कर रहे थे, जिसका उद्देश्य यह था कि कोरोना वायरस को कैसे मानव की कोशिकाओं में संक्रमित किया जाए। यह तथ्य ब्रिटेन के अत्यंत प्रतिष्ठित विज्ञान लेखक निकोलस वेड द्वारा सामने लाए गए हैं। निकोलस वेड का कहना है कि चूंकि वायरस को पहले से ही मानव कोशिकाओं में विकसित कर लिया गया था, उसके मानव में संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है, क्योंकि दुनिया में वायरस के फैलाव का केंद्र वुहान ही है, इसलिए इसकी संभावना और बढ़ जाती है।

अंत में यदि अमेरिका के शीर्ष स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. फौशी का जिक्र ने आए तो बात अधूरी रह जाएगी। डॉक्टर फौशी की भूमिका अत्यधिक घेरे में आ चुकी है। अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार वाशिंगटन पोस्ट में छपे लेखों में यह बात खुलकर सामने आ गई है कि डॉक्टर फौशी ने वुहान इंस्टीट्यूट आफ वायरोलॉजी के लिए, इस शोध, जिसका खामियाजा पूरी दुनिया भुगत रही है, फंडिंग का इंतजाम किया था।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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