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नक्सलियों की कायरता: 272 नक्सली वारदात, 168 से अधिक जवान शहीद-रूस-चीन में भी खत्म साम्यवाद

नक्सलियों ने छिपकर सुरक्षा बलों पर एक और हमले कर फिर से कायरता का परिचय दिया है। 272 नक्सली वारदात में करीब सात साल में 168 से अधिक जवान शहीद हुए और इस दौरान 58 नक्सली भी मारे गए हैं।

नक्सलियों की कायरता: 272 नक्सली वारदात, 168 से अधिक जवान शहीद-रूस-चीन में भी खत्म साम्यवाद

नक्सलियों ने छिपकर सुरक्षा बलों पर एक और हमले कर फिर से कायरता का परिचय दिया है। नक्सली अक्सर घात लगाकर हमले करते हैं। जिसमें हमने अनेक जवान खोए हैं। करीब सात साल में 168 से अधिक जवान शहीद हुए हैं। हालांकि इस दौरान 58 नक्सली भी मारे गए हैं। पिछले साल 272 नक्सली वारदात हुईं। नक्सल हिंसा के अध्ययन के बाद केंद्र और राज्य सरकारों ने माना है कि नक्सलवाद कानूनी समस्या नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक समस्या है।

इसके बाद सरकारों ने इस नजरिये से नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्र के विकास पर ध्यान दिया और वहां की आर्थिक-सामाजिक दिक्कतों को दूर करने के प्रयासों पर बल दिया। इसका परिणाम ही है कि आज नक्सली काफी सिमट गए हैं। अनेक भटके युवा नक्सलवाद की राह छोड़कर मुख्यधारा में लौट आए हैं। एक समय था जब देश के नौ राज्यों में 150 जिले नक्सल प्रभावित थे। आंध्र प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक लाल गलियारा बना हुआ था।

पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गांव नक्सलबाड़ी से 1967 में नक्सल आंदोलन शुरू हुआ था। नक्सलवाद कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के उस आंदोलन का अनौपचारिक नाम है जो भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ। उस वक्त भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन शुरू किया था।

मजूमदार चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग के बहुत बड़े प्रशंसकों में से थे और उनका मानना था कि भारतीय मज़दूरों और किसानों की दुर्दशा के लिए सरकारी नीतियां जिम्मेदार हैं जिसकी वजह से उच्च वर्गों का शासन तंत्र और फलस्वरूप कृषितंत्र पर वर्चस्व स्थापित हो गया है। इस न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है।

चारू और सान्याल के नेतृत्व में नक्सल विद्रोहियों ने अपने को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर लिया और एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई। इस समिति ने सरकार के खिलाफ़ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी। 1971 के आंतरिक विद्रोह और मजूमदार की मृत्यु के बाद यह आंदोलन अनेक शाखाओं में विभक्त होकर लक्ष्य और विचारधारा से भटक गया।

अस्सी और नब्बे के दशक में सभी नक्सली गुट विचारधारा को तिलांजलि देकर लूटखसोट और हिंसा में लिप्त हो गए। 21वीं सदी के करीब दो दशक में नक्सली केवल छद्म लड़ाई में लगे हुए हैं। नक्सलवाद की सबसे बड़ी मार आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओड़िशा, झारखंड और बिहार को झेलनी पड़ी है। हालांकि अब बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, यूपी, एमपी और महाराष्ट्र में नक्सलियों का प्रभाव क्षीण हो गया है।

आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ के जंगलों में ही नक्सलियों का प्रभाव बचा है। इन जंगलों में उन गुमराह नक्सली गुटों का बसेरा है, जो हिंसा की राह पर हैं। वे ही सुरक्षा बलों पर हमला करते हैं। गृह मंत्रालय के आंकड़े के मुताबिक देश में करीब छह हजार ही सक्रिय नक्सली बचे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार लगातार नक्सल हिंसा के खिलाफ कदम उठाती रही है। सुरक्षा बल नक्सल क्षेत्र में जान-माल की सुरक्षा में डटे रहते हैं। छग सरकार ने सलवा जुडूम अभियान भी चलाया था।

इससे नक्सलवाद पर अंकुश लगाने में मदद मिली थी। छग और आंध्र सरकार नक्सलवाद की राह भटके युवाओं को मुख्यधारा में लाने की कोशिश भी करती रही हैं। सरकारों को चाहिए भी कि वे गुमराह नौजवानों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास करता रहे। इसके बावजूद जो कट्टर नक्सली हथियार नहीं डाल रहे हैं उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई किए जाने की भी जरूरत है।

नक्सलियों को छोटी सी बात समझ में नहीं आ रही है कि एक तो साम्यवाद रूस-चीन में भी खत्म हो गया है, दूसरी बुद्ध, महावीर जैन, गुरु नानक व महात्मा गांधी की कर्मस्थली भारत में हिंसा से कुछ हासिल नहीं किया जा सकता है। अब दुनिया में पूंजीवाद और साम्यवाद की क्लासिकल धाराएं भी नहीं रहीं। विश्व में सामाजिक आैर आर्थिक हालात बदल चुके हैं, जिसमें हिंसा के लिए कोई जगह नहीं बची है।

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