Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

मूर्ति तोड़ रोजगार योजना: विफल या सफल..?

हाल ही में मूर्ति विषय पर आयोजित निबंध प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार जिस निबंध को मिला है, वह इस प्रकार है। मूर्तियों का बहुत भारी महत्व है हमारे समाज में। कानून व्यवस्था वाले भी मूर्तियों का सहारा लेने लगे हैं।

मूर्ति तोड़ रोजगार योजना: विफल या सफल..?
X

हाल ही में मूर्ति विषय पर आयोजित निबंध प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार जिस निबंध को मिला है, वह इस प्रकार है। मूर्तियों का बहुत भारी महत्व है हमारे समाज में। कानून व्यवस्था वाले भी मूर्तियों का सहारा लेने लगे हैं। इधर मूर्तियों की सुरक्षा के लिए इतनी पुलिस तैनात होने लगी है कि रास्तों पर पुलिस दिखती ही नहीं है। जेबकतरों और रहजनों का रोजगार बहुत फल फूल गया है।

इसे मूर्ति रोजगार योजना भी कहा जा सकता है। पुलिस को निकम्मेपन की एक और वजह हासिल हो गई है। उनसे अगर पूछा जाए कि वहां वह वारदात हो गई, पुलिस क्यों नहीं पहुंची। पुलिस का जवाब हो सकता है। पुलिस तो वहां-वहां उन-उन मूर्तियों की हिफाजत में व्यस्त थी। मूर्तियों की हिफाजत भी पुलिस का काम है। पब्लिक की हिफाजत भी पुलिस का काम है।

मूर्तियों की हिफाजत अलबत्ता आसान काम है। मूर्ति अगर साइज में बड़ी हो तो जुआरियों और नशेड़ियों काे छाया मिल जाती है। यह योगदान भी कम नहीं है मूर्तियों का। मूर्ति टूटती है फिर बनती है इससे मूर्ति बनावकों को सतत रोजगार मिलता है, इसीलिए रोजगार हित में यही है कि मूर्तियों को बनाने में उन गुणवत्ता मानकों का पालन किया जाए, जिन मानकों से सड़कें बनाई जाती हैं। जो एकाध महीने में टूटकर फिर निर्मित होने के लिए प्रस्तुत हो जाती हैं। इस तरह टूटती-फूटती सड़कें और मूर्तियां लगातार रोजगार देती रहती हैं।

वो मूर्तियां जो सालों साल खड़ी हैं, रोजगार के लिए ठीक नहीं होतीं। मूर्ति हर हफ्ते टूटें तो मीडिया को भी रोजगार मिल जाता है। अभी टीवी चैनलों को हर हफ्ते बगदादी को मारना पड़ता है खबरों के लिए। टीवी चैनलों की बस्ती में बगदादी की एक मूर्ति लगा दी जाए रोज उस मूर्ति को तोड़ दिया जाए तो रोज खबर बनेगी। बगदादी की मूर्ति तोड़ दी गई।

हिंदी भाषी इलाकों में साहित्यकारों की मूर्तियों की बहुत दुर्गति होती है, क्योंकि उन्हें कोई अपना नहीं मानता। झांसी में रानी लक्ष्मीबाई के किले के सामने साहित्यकार वृन्दावन लाल वर्मा की मूर्ति लगी है। वह साहित्यकार थे पर उनकी मूर्ति के साथ सलूक अघोरी वाला होता है। बरसों से उनकी मूर्ति नहाई हुई नहीं लगती। उनके परिचय का पट्ट भी कुछ इन तरह से उखड़ा हुआ है कि समझना मुश्किल होता है कि यह हैं कौन।

कोई होशियार परिचय पट्ट पूरा उखाड़कर दावा कर सकता है कि यह मूर्ति उनके पिताजी चंदूलाल घी वाले की है। जो महान लोकोपकारी थे, हालांकि पब्लिक उन्हें मिलावटी और दो नंबरी मानती है। मूर्ति लगने भर से चंदूलाल महानता हासिल कर सकते हैं। बाकी पब्लिक का क्या है उसने तो कई महानों को महान नहीं माना। सुकरात को भी उनके वक्त की पब्लिक ने महान कहां माना था।

यानी किसी मूर्ति को किसी और का बताकर महानता अर्जित की जा सकती है। इस तरह हम देख सकते हैं कि मूर्तियां महानता का स्त्रोत भी बो सकती हैं। मूर्तियां आय का साधन भी बन सकती हैं। खास ठिकानों पर मूर्ति निर्माण का काम नीलामी के जरिये होने लगे तो बहुत आय आ सकती है। जैसे इस बात की बोली लगवाई जाए कि शहर के सबसे बड़े पार्क में किसकी मूर्ति लगेगी।

मान लो कोई गुड्डू नामक जेबकट है उसकी इच्छा है उसे लोग महान मानें। वह करोड़ो रुपये देकर नीलामी में मूर्ति अधिकार हासिल करे और अपनी मूर्ति वहां लगवा दे। आय कमाने के इस सहज तरीके पर कुछ नासमझ सवाल खड़े करेंगे कि जेबकट की मूर्ति लगाकर हम समाज को क्या संदेश देंगे। ऐसों के लिए जवाब यह है कि क्या गांधी जी की मूर्तियां लगाकर वह संदेश दिया जा चुका है, जो दिया जाना था। नहीं न जब गांधी की मूर्ति गांधी का संदेश नहीं पहुंचा सकी तो गुडु जेबकट की मूर्ति कौन सा संदेश देगी। हां इससे कुछ आय सरकार को हो जाएगी नीलामी में।

और पढ़े: Haryana News | Chhattisgarh News | MP News | Aaj Ka Rashifal | Jokes | Haryana Video News | Haryana News App

Next Story
Top