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राम तुम कहां हो? कहां नहीं हो!

राम हमारी दार्शनिक यात्रा के मील के पत्थर हैं। उनके साथ चलकर भारतीय इतिहास अपनी जांच करता है। राम के पास सच का हथियार था। वही एक आधारभूत स्थापना के लिए काफी था। देश के सबसे बड़े, पहले और अकेले लोकतंत्रीय शिखर शासक पुरुष राम ने भारत को राजनीतिक भाषा का ककहरा पढ़ाने के विश्वविद्यालय की स्थापना की।

राम तुम कहां हो? कहां नहीं हो!
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राम हमारी दार्शनिक यात्रा के मील के पत्थर हैं। उनके साथ चलकर भारतीय इतिहास अपनी जांच करता है। राम के पास सच का हथियार था। वही एक आधारभूत स्थापना के लिए काफी था। देश के सबसे बड़े, पहले और अकेले लोकतंत्रीय शिखर शासक पुरुष राम ने भारत को राजनीतिक भाषा का ककहरा पढ़ाने के विश्वविद्यालय की स्थापना की।

वे वास्तविक, वैधानिक प्रजातंत्र के मर्यादित नेता थे। राम ने उस अंतिम व्यक्ति का सम्मान कर निर्णय किए जिसे रस्किन ने गांधी की चिन्ता के खाते में डाला था। वे दुनिया में लोकतंत्र का थर्मामीटर और मर्यादा का बैरामीटर हैं। वे जनतंत्रीय व्यवस्था के चिन्तन के उपेक्षित प्रश्नों के अनाथालय हैं। वे कुतुबनुमा हैं। जिधर राम होते हैं, उधर ही उत्तर होते हैं।

राम को कई रूपों, घटनाओं, व्यवहार, शक्लों और फितरतों में हिंदुस्तान का अवाम ढूंढ़ता है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में राम का सबसे ज्यादा लोकव्यापीकरण किया। लाखों घरों की सांसों में रामचरितमानस ने पैठ जमा ली। राम के चेहरे पर करुणा के कंटूर हैं। राम सांस्कृतिक मुहावरा हैं। हिदुस्तान के जीवन की एक शब्द में पहचान हैं।

राम को आदिवासियों, दलितों, पिछड़े वर्गों, मुफलिसों, महिलाओं और यहां तक कि पशु पक्षियों तक की सेवा करने के अवसर मिले। बिना कुब्जा, अहिल्या, शबरी, हनुमान, सुग्रीव, जटायु के वंशजों से विमर्श किए बिना आदि के राम मन्दिर कैसे बनेगा। राम केवल अयोध्या नगर निगम के मतदाता नहीं हैं।

मन्दिर बन भी गया तो क्या राम उसमें बैठे रहेंगे जब तक लोकतंत्र के सत्ताधीश जब तक राम की आत्मा का आह्वान नहीं करेंगे। राम का लोकतंत्रीय आचरण पाठ्यक्रम से हटा दिया जाता है। शबरी, जटायु, त्रिजटा, सुग्रीव जैसे चरित्र सांस्कृतिक हाशिये पर धकेले जाते हैं। रावण, कुम्भकर्ण, मेघनाद वगैरह तख्ते ताऊस पर कब्जा करते रहते हैं। काल दहाड़ें मारकर रोता रहता है। सदियां बेवा की तरह चीखती रहती हैं। परम्पराएं मवाद से भर जाती हैं। इत्तिहाद, अदमतशद्दुद, मजहब, ज़मीर, सुकून जैसे शब्दों का हिन्दी में अनुवाद उपलब्ध नहीं हो रहा है।

भारत, भारतीयता, वंदेमातरम्, राष्ट्रवाद जैसे शब्दों का पेटेंट हो गया है। धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद का भी। विचारों की लड़ाई में जीतना है तो राम के चरित्र की कथा घर घर बताने वाली पार्टी ही केन्द्रीय हो सकती है। असाधारण प्रेमी, पत्नीपरस्त, राजसत्ता से निरपेक्ष विचारक व्यक्ति के रूप में अपनी जगह सुरक्षित रखने के बदले राम ने नियमों और मर्यादाओं के नाम पर दाम्पत्य जीवन, पुत्र मोह, परिवार सुख और सत्ता सापेक्षता की बलि चढ़ा दी। खुद को अत्याचारी के रूप में कलंकित कर लिया लेकिन मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं किया।

शिकायत करने का सार्वजनिक अधिकार राम की वजह से जिन्दा है। हर मुसीबतजदा, अन्यायग्रस्त, व्यवस्थापीड़ित व्यक्ति के दिल में जो साहस प्रज्जवलित हो रहा है, उसमें राम की बाती है। राम परिवारवादी नहीं थे। लक्ष्मण और सीता को छोड़ लंका विजय तक कोई रिश्तेदार उनके साथ नहीं था। उन्होंने दलितों का साथ लिया। आदिवासियों को लोकतंत्र के युद्ध का साहसिक पुर्जा बनाया। आज राजनेता अपने परिवारजनों के कारण मारे जा रहे हैं। आज के सत्ताधीश खुद के खर्च से प्रायोजित मौसमी संस्थाओं की नकली उपाधियों से विभूषित अपनी रामलीला में रमे हैं।

अभियुक्त न्याय सिंहासन पर काबिज हैं। विद्वानों का स्थान नवरत्नों की शक्लों में सेवानिवृत्त, त्यागपत्रित और बर्खास्त नौकरशाही धीरे धीरे ले रही है। वे रामराज्य के धोबी की लोकभाषा नहीं बल्कि शासन का अहंकार बनते हैं। राम लेकिन फिर सांसत में हैं। राम का जीवन एकांतिक है। राम को भीड़ के नारों की लहरों पर बिठाया जाता है। तीन आदि देव विष्णु, ब्रह्मा और शिव के मुकाबले राम जीवन यात्रा के अंतिम पड़ाव पर मृतक का साथ सबसे ज़्यादा देते हैं।

‘जयश्रीराम‘ के उत्तेजक नारे से छिटका हुआ हर साधारण आदमी हिन्दू विश्वास में बहता रहता है कि जब आखिरी यात्रा पर चलेगा उसके पीछे ‘राम नाम सत्य है‘ अवश्य गूंजेगा। राम सदियों से इस देश के बहुत काम आ रहे हैं। यह देश उनके काम कब आएगा? लोग आपस में मिलते ही ‘राम राम‘ कहते हैं। वीभत्स दृश्य या दुखभरी खबर मिले तो भी मुंह से ‘राम राम‘ निकल पड़ता है। मेघालय की एक यात्रा के दौरान पान का बीड़ा बेचने वाली एक स्नातक छात्रा ने एक स्मरणीय टिप्पणी की थी।

इस देश के लोग ‘जयराम‘ कहने के बदले ‘जयसीताराम‘ क्यों नहीं कहते। राम भारत की आत्मा हैं। गांधी की उत्तराधिकारी कांग्रेस ने राम को फकत हिन्दुओं का सरगना समझ लिया। आज इतिहास दंड दे रहा है। संघ परिवार के राम में उच्च वर्गों की जय है। धनपतियों का श्री है। फिर पीछे राम हैं। ये लोग मिथकों को मुहावरों में तब्दील करने के विशेषज्ञ हैं। संघ परिवार ने गांधी के ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम‘ को बापू की झोली से निकालकर ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं।‘ के रंग में रंग दिया।

राम को वैसे भी संघ परिवार के लोग उस कांग्रेस पार्टी से उठा ले गए हैं जिसके सबसे बड़े मसीहा ने छाती पर गोली खाने के बाद ‘हे राम‘ कहा था। कांग्रेस के किसी सम्मेलन में महात्मा गांधी की आश्रम भजनावली का कोई उच्चारण नहीं होता। प्रभात फेरी, खादी, मद्य निषेध, अहिंसा सब गायब हैं। राम भी क्या करें। पूरी राजनीति तो महाभारत वालों के जिम्मे है। धार्मिक और राजनीतिक माहौल में राम को लेकर इतना हंगामा बरपा किया जाता है। वह खुद राम को नागवार गुजरे। वर्षों हो गए अयोध्या में राम का मन्दिर नहीं बन रहा है।

देश ने सामूहिक चुनौती ली होती कि ऐसा राममन्दिर बनाएगा जिसके मुकाबले धरती पर कोई दूसरा धर्मगृह नहीं होगा। तो इस प्रकल्प में राम खुद मदद करते। बहरहाल राममन्दिर-बाबरी मस्जिद का मुकदमा आखिरी चरण में है और समझौतों की भी अनन्त गुंजाइशें हैं। सब मिल कर राममन्दिर और बाबरी मस्जिद को लेकर एक जैसा क्यों नहीं सोचते?

राम को ठीक से समझने के लिए गर्वनमेंट आॅफ इंडिया एक्ट को सुधारकर बनाए गए संविधान को पढ़ने की अनिर्वायता नहीं है। करोड़ों ग्रामीण राम की शिक्षाओं के अनुकूल संवैधानिक आचरण कर रहे हैं। ‘जयश्रीराम‘ की आड़ में संकीर्ण हिंसा और कारपोरेटी धनलिप्सा की जीभों को हिलाने खुला आसमान भी मिल गया है। अपने सच्चे पारमार्थिक अर्थ में धर्म हिंदुस्तान की जनता का अस्तित्व है। धर्म की हेठी औसत भारतीय को कुबूल नहीं है।

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