Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

आरक्षण की समीक्षा हो, जाटों के आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ने किया रद

आरक्षण सूची की समीक्षा की एक पारदर्शी और निष्पक्ष प्रणाली विकसित करना समय की मांग है। जिन जातियों की स्थिति बेहतर है उन्हें हटाने और जो जाति पिछड़े हैं उन्हें जोड़े जाएं।

आरक्षण की समीक्षा हो, जाटों के आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ने किया रद
केंद्र की नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में जाटों के आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ने रद कर दिया जिससे हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली और राजस्थान में राजनीतिक ही नहीं, सामाजिक स्तर पर भी भारी हलचल है। आदेश आने के तुरंत बाद इसे चुनौती देने की मांग उठने लगी है। कुछ जाट संगठनों ने आन्दोलन की चेतावनी भी दी है। पिछले वर्ष जब मनमोहन सरकार ने जाटों को आरक्षण देने का निर्णय किया था तब भाजपा ने भी इसका सर्मथन किया था। अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने शासनकाल में राजस्थान के जाटों (भरतपुर और धौलपुर जिलों को छोड़कर) को केंद में आरक्षण दे दिया था। इस निर्णय से राज्य में कांग्रेस का परम्परागत जाट वोट बैंक टूटकर भाजपा के साथ जुड़ गया था।
आरक्षण सूची की समीक्षा की एक पारदर्शी और निष्पक्ष प्रणाली विकसित करना समय की मांग है। जिन जातियों की स्थिति बेहतर है उन्हें हटाने और जो जाति पिछड़े हैं उन्हें जोड़े जाएं। हमारे संविधान में सामजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को ही आरक्षण का आधार माना है। वर्ष 1989 में मंडल आयोग लागू होने के बाद देश में जातीय चेतना का विस्तार तेजी से हुआ। मंडल आयोग ने देश में 3743 पिछड़ी जातियों की निशानदेही की थी, जिनकी संख्या हिन्दू धर्म के अनुयायियों का लगभग पचास फीसदी है। इनमें से जिन जातियों को आरक्षण का लाभ मिल गया वे आगे बढ़ गईं और जो बाहर रह गईं, वे पिछड़ गईं। आरक्षण लागू करते समय यह कहा गया था कि कुछ-कुछ समय के अंतराल पर इसकी समीक्षा की जाएगी और जिन जातियों की स्थिति बेहतर पाई जाएगी उन्हें सूची से निकाल दिया जाएगा और जिन्हें पिछड़ा पाया जाएगा उन्हें जोड़ लिया जाएगा। दुर्भाग्य से ऐसा कभी नहीं हो पाया है। एक बार जो सूची में आ गया आरक्षण उसका हक बन गया। राजनीतिक दलों ने भी आरक्षण को हथियार बनाकर इसका जमकर दुरुपयोग किया। आरक्षण की रेवड़ी मनर्मजी से बांटी गई।
अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि देश में सामाजिक अन्याय का ऐतिहासिक कारण निश्चय ही जाति है लेकिन केवल जाति को पिछड़ेपन का आधार नहीं माना जा सकता। पिछड़े वर्ग की निशानदेही के लिए नए मापदंड और पैमाने बनाना जरुरी है और यह प्रक्रिया निरंतर चलनी चाहिए। उदाहरण देकर बताया कि समाज में किन्नर एक ऐसा वर्ग है जो जाति के मापदंड से किसी र्शेणी में नहीं आता, फिर भी सामजिक और शैक्षिक दृष्टि से आरक्षण का लाभ उठा रही कई जातियों के मुकाबले वह कहीं पीछे है। उन्हें आरक्षण की जद में लिया जाना चाहिए। हमारे देश में जाति के आधार पर पहली व अंतिम बार जनगणना ब्रिटिश शासनकाल में 1931 में हुई थी। 2011 में मनमोहन सिरकार ने फिर जातिगत जनगणना का आदेश दिया जिसका परिणाम आना बाकी है। राजनीतिक दल अस्सी साल से ज्यादा पुराने आंकड़ों के आधार पर हर राज्य और इलाके में विभिन्न जातियों का अंदाज़ा लगाते हैं। वोट बैंक की निशानदेही करते हैं। आरक्षण का लाभ देते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की राय में सरकार ने जाटों को आरक्षण देते समय राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग की सिफारिश को अनदेखा कर मनर्मजी से आदेश ज़ारी कर दिया था। सरकार का तर्क था कि देश के नौ राज्यों में जाटों को आरक्षण मिला हुआ है। ऐसे में उन्हें केंद्रीय सेवाओं में आरक्षण देना न्यायसंगत है। वैसे भी जाट समुदाय यादव और गुर्जरों की भांति गावों में रहने वाला तथा मुख्यतया खेती पर निर्भर है। पिछले तीन दशक में परिवार वृद्धि से जमीन का निरंतर बंटवारा हुआ, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति काफी कमजोर हो चुकी है। इस दौर में आरक्षण का लाभ उठा रही उनके साथ की कई जातियां सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक दृष्टि से काफी आगे बढ़ चुकी हैं।
गौर करें तो पता चलता है कि 25 बरस के भीतर भारतीय राजनीति के जातीय समीकरण उलट गए हैं। कुछ लोगों का कहना है कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के साथ-साथ आर्थिक कमजोरी को भी आरक्षण का आधार बनाया जाना चाहिए। आरक्षण सूची की समीक्षा की एक पारदर्शी और निष्पक्ष प्रणाली विकसित करना समय की मांग है। इसके बाद जिन जातियों की स्थिति बेहतर है उन्हें सूची से निकालने और जो पिछड़े हैं उन्हें जोड़ने का काम होना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक यह विवाद चलता रहेगा।
मंडल लागू होने के बाद पिछड़े वर्ग ने सरकारी सत्ता का स्वाद चखा तो उसे अपनी ताकत का अहसास हुआ। आजादी के बाद तीन दशक तक देश की राजनीति पर चुनिन्दा उच्च जातियों का एकाधिकार था। लोकसभा और विधानसभाओं में सवर्ण वर्ग का आधिपत्य था। प्रधानमन्त्नी और ज्यादातर राज्यों के मुख्यमंत्नी पद उच्च वर्ग के लिए मानो आरक्षित थे। मन्त्निमण्डल में भी इन्हीं जातियों का बहुमत था। न्यायपालिका, नौकरशाही, पुलिस और शिक्षा के क्षेत्न में शीर्ष पदों पर भी उच्च जातियों का कब्जा था। लेकिन पिछले ढाई दशक में स्थिति में भारी बदलाव आया है। आरक्षण के कारण पिछड़ी जातियों, दलित और आदिवासी वर्ग की स्थिति मजबूत हुई है। कल तक के अनजान चेहरे आज देश की राजनीति के चमकते सितारे बन गए हैं। सरकारी नौकरियों में भी बड़ी संख्या में पिछड़े वर्ग के युवा प्रवेश कर चुके हैं।
प्रबल आन्दोलन के बल पर सबसे पहले तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में पिछड़ों ने अपनी जगह बनाई थी। अब उत्तर और मध्य भारत में भी उनका पलड़ा भारी है। इस बदलाव का असर देश की दोनों सबसे बड़ी राजनैतिक पाटिर्यों पर भी अनुभव किया जा सकता है। आजादी से पहले भी कांग्रेस पार्टी पर उच्च जातियों का दबदबा था। तब कांग्रेस अधिवेशनों में भाग लेने वाले प्रतिनिधियों में 50 फीसदी तक ब्राrाण होते थे। स्टेट असेम्बलियों में भी उनकी संख्या अपनी आबादी की तुलना में कहीं अधिक थी। सन् 1920-37 के बीच बाम्बे असेम्बली में ब्राrाणों की संख्या 19 से 37 फीसदी के बीच थी। कांग्रेस जमींदारों के सर्मथन पर टिकी थी जो अधिकाँश उच्च जातियों से थे। अंग्रेजी हुकूमत से नजदीकी, पैसे और प्रभाव के चलते उच्च जातियों में शिक्षा का प्रसार काफी पहले हो चुका था। 1860 से 1920 के बीच ब्रिटिश हुकूमत ने सारे ऊंचे सरकारी पद उच्च जातियों के लिए आरक्षित कर रखे थे। ऐसे में सत्ता और शासन के गलियारों में पिछड़े और दलित वर्ग के लिए स्थान बनाना लगभग असंभव था। सन् 1920 में सरकारी नौकरियों पर उच्च जातियों के एकाधिकार के खिलाफ एक आन्दोलन छिड़ा परिणामस्वरूप तीसरी और चौथी र्शेणी की सरकारी नौकरियों में पिछड़ी जातियों की भर्ती खोल दी गई। सन् 1932 में गोलमेज कांफ्रेंस के बाद ब्रिटिश प्रधानमन्त्नी रेमसे मेक्डोनाल्ड ने कम्युनल अवार्ड देकर स्टेट असेम्बलियों में कुछ स्थान दलित व अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित करने का एलान किया। इस निर्णय के विरोध में कांग्रेस ने आन्दोलन छेड़ा और अंतत: गांधीजी और अम्बेडकर के बीच पूना समझौता हुआ। उसके बाद दलितों के लिए कुछ सीट आरक्षित हो गई। वतर्मान लोकसभा में भी दलितों के लिए 79 और आदिवासियों के लिए 41 सीट आरक्षित हैं। शेष बची 403 सीटों पर अन्य जातियों और धर्म के लोग चुनाव लड़ सकते हैं। नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण पाने के बाद अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) के नेता संसद और विधानसभाओं में भी आरक्षण की मांग उठा रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्न में निजी क्षेत्न की नौकरियों में भी आरक्षण लागू करने का शगूफा छोड़ दिया था। इस सच से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि आज किसी समाज की तरक्की में आरक्षण का भी महत्वपूर्ण स्थान है। इसी सच को पहचान ब्राrाण और राजपूत जैसी अगड़ी जातियां भी आरक्षण की मांग करने लगी हैं। आरक्षण का आधार बदलने की मांग भी लम्बे समय से उठ रही है।
खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि, हमें फॉलो करें ट्विटर और पिंटरेस्‍ट पर-
Next Story
Top