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हर्षवर्धन पांडे का लेख : भाजपा के संकटमोचक थे जेटली

जेटली को भाजपा के सबसे शालीन और मिलनसार नेताओं में से एक माना जाता था। उनके संबंध दूसरे दलों में भी मधुर रहे। जेटली के बारे में पार्टी में जुमला चलता था जिस राज्य का चुनावी प्रभारी उनको बनाया जाता है समझ लें उस राज्य में कमल खिलने से कोई नहीं रोक सकता। दक्षिण में कर्नाटक के दुर्ग को फतह करने में उनकी भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। बिहार में नीतीश के साथ गठबंधन बनाने में भी वह हमेशा आगे रहे।

हर्षवर्धन पांडे का लेख : भाजपा के संकटमोचक थे जेटली
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भाजपा नेता अरुण जेटली की जिंदगी से जुड़ा हर पहलू और राजनीतिक करियर बेहतरीन था। यूं ही उन्हें भाजपा का संकटमोचक नहीं कहा जाता था। जेटली का जन्‍म 28 दिसंबर 1952 को नई दिल्‍ली के नारायणा विहार इलाके के मशहूर वकील महाराज किशन जेटली के घर हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा नई दिल्‍ली के सेंट जेवियर स्‍कूल में हुई। 1973 में जेटली ने दिल्ली के प्रतिष्ठित श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से कॉमर्स में स्‍नातक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने यहीं से लॉ की पढ़ाई भी की। छात्र जीवन में ही जेटली राजनीतिक पटल पर छाने लगे। 1974 में वह दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के छात्र संघ अध्‍यक्ष चुने गए। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और सीढ़ी दर सीढ़ी आगे बढ़ते गए। 1973 में उन्होंने जयप्रकाश नारायण और राजनारायण द्वारा चलाए जा रहे भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई, वहीं 1974 में वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ गए। 1975 में आपातकाल का विरोध करने के बाद उन्‍हें 19 महीनों तक नजरबंद रखा। इसी दौर में जेटली की मुलाक़ात जेल में कई नेताओं से हुई। जयप्रकाश नारायण उन्हें काफी पसंद करते थे।

आपातकाल की घोषणा के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया। 1990 में अरुण जेटली ने सुप्रीम कोर्ट में वरिष्‍ठ वकील में रूप में अपनी नौकरी शुरू की। अरुण जेटली मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में दूसरे नंबर के सबसे अहम शख्सियत माने जाते थे, वहीं उन्होंने अटल बिहार वाजपेयी की सरकार में भी अहम भूमिका निभाई। अटल सरकार सरकार में उन्हें 13 अक्टूबर 1999 को सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) नियुक्त किया गया। उन्हें विनिवेश राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) भी नियुक्त किया गया। विश्व व्यापार संगठन के शासन के तहत विनिवेश की नीति को प्रभावी करने के लिए पहली बार एक नया मंत्रालय बनाया गया। उन्होंने 23 जुलाई 2000 को कानून, न्याय और कंपनी मामलों के केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के रूप में राम जेठमलानी के इस्तीफे के बाद कानून, न्याय और कंपनी मामलों के मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी संभाला। नवम्बर 2000 में एक कैबिनेट मंत्री के रूप में पदोन्नत किया गया और एक साथ कानून, न्याय और कंपनी मामलों और जहाजरानी मंत्री बनाया गया। भूतल परिवहन मंत्रालय के विभाजन के बाद नौवहन मंत्री भी रहे। उन्होंने 1 जुलाई 2001 से केंद्रीय मंत्री, न्याय और कंपनी मामलों के मंत्री के रूप में 1 जुलाई 2002 को नौवहन के कार्यालय को भाजपा और उसके राष्ट्रीय प्रवक्ता के रूप में शामिल किया। 29 जनवरी 2003 को केंद्रीय मंत्रिमंडल को वाणिज्य और उद्योग और कानून और न्याय मंत्री के रूप में फिर से नियुक्त किया। 13 मई 2004 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की हार के साथ, जेटली महासचिव के रूप में भाजपा की सेवा करने के लिए अपने कानूनी करियर में वापस आ गए।

2004-2014 तक उन्हें राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में चुना गया। 16 जून 2009 को उन्होंने अपनी पार्टी के वन मैन वन पोस्ट सिद्धांत के अनुसार भाजपा के महासचिव के पद से इस्तीफा दे दिया। वह पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति के सदस्य भी थे । राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में उन्होंने राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक की बातचीत के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और जन लोकपाल विधेयक के लिए अण्णा हजारे का समर्थन किया।

जेटली ने 2002 में 2026 तक संसदीय सीटों को मुक्त करने के लिए संविधान में संशोधन सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया और 2004 में भारत के संविधान में नब्बेवें संशोधन ने दोषों को दंडित किया हालांकि, 1980 से पार्टी में होने के कारण उन्होंने 2014 तक कभी कोई सीधा चुनाव नहीं लड़ा लेकिन पीएम मोदी के आग्रह पर 2014 के आम चुनाव में वह लोकसभा सीट पर अमृतसर सीट के लिए भाजपा के उम्मीदवार नवजोत सिंह सिद्धू की जगह बने जिसमें कांग्रेस के अमरिंदर सिंह से हार गए। वह लगातार 18 वर्ष तक गुजरात से राज्यसभा सदस्य थे। उन्हें मार्च 2018 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए फिर से चुना गया। 26 मई 2014 को, जेटली को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वित्त मंत्री के रूप में चुना गया जिसमें उनके मंत्रिमंडल में कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय और रक्षा मंत्री शामिल रहे। भारत के वित्त मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान, सरकार ने 9 नवंबर, 2016 से भ्रष्टाचार, काले धन, नकली मुद्रा और आतंकवाद पर अंकुश लगाने के इरादे से 500 और 1000 के नोटों का विमुद्रीकरण किया। 20 जून, 2017 को उन्होंने पुष्टि की, जीएसटी रोलआउट सही मायने में ट्रैक पर है। जीएसटी लागू कराने का श्रेय अरुण जेटली को जाता है। लोकसभा चुनावों के दौरान जब राफेल का मुद्दा गरमाया तो सरकार के लिए ट्रबलशूटर बनकर उभरे।

1990 में अरुण जेटली ने सुप्रीम कोर्ट में वरिष्‍ठ वकील में रूप में नौकरी शुरू की वहीं वीपी सिंह सरकार में उन्‍हें 1989 में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किया गया। उन्‍होंने बोफोर्स घोटाले की जांच में पेपरवर्क भी किया। जेटली की गिनती देश के टॉप वकीलों में यूं ही नहीं होती थी। 90 के दशक में जैसे-जैसे टीवी की महत्ता बढ़ती गई, वैसे-वैसे जेटली का ग्राफ भी चढ़ता गया। पार्टी के प्रवक्ता होते हुए स्टूडियो में इतने लोकप्रिय मेहमान बन गए थे कि जब पत्रकार वीर सांघवी ने उनके मंत्री बनने के तुरंत बाद उनका स्टार टीवी पर इंटरव्यू किया तो उन्होंने मजाक किया कि इस कार्यक्रम में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि मेरा मेहमान मुझसे ज्यादा बार टीवी पर आ चुका हो। प्रखर प्रवक्ता और हिंदी और अंग्रेजी-भाषाओं में उनके ज्ञान के चलते 1999 के आम चुनाव में बीजेपी ने उन्हें प्रवक्‍ता बनाया। अटल सरकार में उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का स्‍वतंत्र प्रभार सौंपा गया। 2004 से 2014 के बीच यूपीए सरकार के वक्त वे सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस, तुलसी प्रजापति एनकाउंटर केस, इशरत जहां एनकाउंटर केस में मोदी और शाह का बचाव करने वालों में सबसे आगे रहे। 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले मोदी को भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया तो यह जेटली की ही बिसात थी जिसने पूरी पार्टी में मोदी के नाम पर सहमति बनाई।

जेटली को भाजपा के सबसे शालीन और मिलनसार नेताओं में से एक माना जाता था। उनके संबंध दूसरे दलों में भी मधुर रहे। जेटली के बारे में पार्टी में जुमला चलता था जिस राज्य का चुनावी प्रभारी उनको बनाया जाता है समझ लें उस राज्य में कमल खिलने से कोई नहीं रोक सकता। दक्षिण में कर्नाटक के दुर्ग को फतह करने में उनकी भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। बिहार में नीतीश के साथ गठबंधन बनाने में भी वह हमेशा आगे रहे। जेटली एक बेहतर इंसान भी थे। राजनीति के साथ ही जेटली खाने पीने के शौकीन रहे। इसके चलते पुरानी दिल्ली के तमाम दुकानदारों को वह व्यक्तिगत रूप से जानते थे। जेटली क्रिकेट के भी शौकीन थे। दिल्ली में फिरोजशाह कोटला का जीर्णोद्धार न केवल उनके दौर मे हुआ बल्कि छोटे इलाकों से आने वाले लड़कों ने टीम इंडिया में भी अपनी जगह बनाई । प्रमोद महाजन के जाने के बाद भाजपा को संवारने में जेटली की परदे के पीछे सबसे बड़ी भूमिका थी। जेटली लुटियंस के पत्रकारों के करीब भी थे। जेटली के औद्योगिक घरानों से मीडिया तक में अच्छे दोस्त थे जिसका उपयोग उन्होंने पार्टी के लिए किया और अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। ऐसे संकटमोचक नेता की कमी भाजपा को हमेशा खलेगी।

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