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विकास पथ पर भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम

अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत चोटी के दो चार देशों की कतार में खड़ा हो गया है

विकास पथ पर भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम

नई दिल्‍ली. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो अंतरिक्ष के क्षेत्र में सफलता के नए मानक स्थापित कर रहा है। यह देश को तकनीकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान दिलाने के साथ-साथ राजनीतिक और आर्थिक रूप से भी सशक्त बना रहा है। इसने सोमवार को र्शीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से फ्रांस, र्जमनी, कनाडा और सिंगापुर के पांच उपग्रहों को प्रक्षेपण यान पीएसएलवी (ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान) के जरिए सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दिखा दिया कि अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत चोटी के दो चार देशों की कतार में खड़ा हो गया है जिसको नजरअंदाज करना संभव नहीं है।

पीएसएलवी की यह लगातार 27वीं सफल उड़ान थी। पीएसएलवी ने अब तक करीब 67 उपग्रहों को प्रक्षेपित किया है, जिसमें आधे से ज्यादा विदेशी उपग्रह हैं। इससे यह भी साफ हो जाता हैकि भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को पूरी दुनिया ने स्वीकार ली है। पहले उपग्रह आर्यभट्ट से लेकर इसरो की अंतरिक्ष यात्रा उसके वैज्ञानिकों के कठिन पर्शिम के दम पर यहां तक पहुंची है। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैज्ञानिकों को सार्क सैटेलाइट बनाने का सुझाव दिया है, जिसे पड़ोसी देशों को उपहार स्वरूप दिया जा सके। इससे पड़ोसी देशों के विकास में भागीदार बनने और करीब आने में मदद मिलेगी। लोग इसे उपग्रह कूटनीति का नाम दे रहे हैं। वैसे भी तकनीकी का अंतिम उद्देश्य मानव कल्याण ही होना चाहिए।

उपग्रह आपदा प्रबंधन से लेकर सूचना मुहैया कराने तक किस तरह मानव को सशक्त बनाने में अपनी भूमिका निभा रहे हैंयह किसी से छिपा नहीं है।यही नहीं हमारी उपग्रह प्रक्षेपण प्रणाली विश्वसनीय होने के साथ साथ सस्ती भी है। दूसरे देशों से काफी कम लागत में इसरो उपग्रहों का प्रक्षेपण कर रहा है और देश के लिए महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा अजिर्त कर रहा है। यह इसकी वाणिज्यिक सफलता है। भारत के मंगल मिशन पर 7.5 करोड़ डॉलर की लागत आई है जबकि नवंबर में ही अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भी मेवन नामक अंतरिक्ष यान मंगल के मिशन पर भेजा था।

जिसकी लागत 67.1 करोड़ डॉलर बताई गई थी। यही वजह है कि खुद उपग्रह भेजने में सक्षम होने के बाद भी कई देश इसरो की सेवा ले रहे हैं। इसरो अपने प्रक्षेपण यान का व्यावसायिक उपयोग कर रहा है। निश्चित रूप से इससे इसरो को अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों के विस्तार में मदद मिलेगी। अभी भारत का मंगल मिशन चल ही रहा है जिसकी शुरुआत गत वर्षनवंबर में हुई थी। पूर्व में उपग्रह चंद्रमा के बारे में जानने के लिए भेजा गया चंद्रयान-1 सफल रहा था।

चंद्रयान-2 मिशन की तैयारी चल रही है। वहीं भारतीय वैज्ञानिक आज खुद का सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम तैयार कर रहे हैं। आज देश अंतरिक्ष कार्यक्रम में आत्मनिर्भर है। यदि प्रसारण, संचार, मानचित्रण एवं नेविगेशन के मामले में दूसरे देशों पर निर्भर रहते तो हमें काफी धन खर्च करना पड़ता। हालांकि इसरो के प्रक्षेपण यान के रूप में पीएसएलवी की स्थिति लंबी रेस के घोड़े जैसी है परंतु बड़े मिशन को पीएसएलवी की जगह जीएसएलवी से ही भेजा जाना उचित होता है। अब समय आ गया है कि इसरो के वैज्ञानिक क्रायोजेनिक इंजन पर आधारित जीएसएलवी में महारत हासिल करें।

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