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देश के खेल ढांचे में हर स्तर पर सुधार जरूरी

क्रिकेट को छोड़ कर प्राय: सभी खेल सरकारी संरक्षण में हैं और कोष की कमी से जूझ रहे हैं।

देश के खेल ढांचे में हर स्तर पर सुधार जरूरी
देश की खेल प्रतिभाओं का सम्मान निश्चित ही खेल के विकास में सहायक होता है। सम्मानित खिलाड़ियों का देश के खेल को निखारने के प्रति दायित्व बढ़ जाता है। साथ ही वे नई प्रतिभाओं के लिए प्रेरणा के स्रोत बन जाते हैं। जो खिलाड़ी सम्मान पाते हैं, वे खुद भी गौरवान्वित होते हैं और देश भी उन पर गर्व महसूस करता है। देश में पहली बार चार खिलाड़ियों को खेल रत्न पुरस्कार से नवाजा गया है। इसका र्शेय रियो ओलंपिक में शानदार प्रदर्शन करनी वाली तीन वंडर गल्र्स शटलर पीवी सिंधु, रेसलर साक्षी मलिक व जिम्नास्ट दीपा कर्माकर और संभावनाशील निशानेबाज जीतू राय को जाता है।
इन चारों खिलाड़ियों को राजीव गांधी खेल रत्न सम्मान से नवाजा गया है। सिंधु और साक्षी ने तो रियो में पदक जीते थे, इसलिए खेल रत्न के लिए दोनों का चयन किया गया, लेकिन दीपा व जीतू के चयन के पीछे उनका कमाल का प्रदर्शन है। दीपा ने रियो ओलंपिक में अपनी श्रेणी में चौथा स्थान प्राप्त कर जिम्नास्टिक में क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय महिला बनकर सभी देशवासियों का दिल जीता। जीतू ने 2014 राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण और आईएसएसएफ विश्व कप में पुरुषों की दस मीटर एयर पिस्टल में स्वर्ण पदक जीता था, हालांकि रियो ओलंपिक में वह पदक नहीं जीत सके।
इस बार ओलंपिक में प्रदर्शन को लेकर जिस तरह नारी शक्ति का दबदवा रहा, उसी तरह खेल पुरस्कारों में भी वह आगे रही। ये अन्य क्षेत्रों की तरह खेलों में भी महिलाओं की बढ़ रही भागीदारी के प्रमाण हैं। 15 खिलाड़ियों को अर्जुन पुरस्कार, तीन को ध्यानचंद अवार्ड और छह को द्रोणाचार्य पुरस्कार भी दिए गए हैं। खेल में खिलाड़ियों के प्रदर्शन में उनके कोचों की अहम भूमिका होती है। नागापुरी रमेश (एथलेटिक्स), सागर मल धयाल (मुक्केबाजी), राज कुमार शर्मा (क्रिकेट), बिश्वेस्वर नंदी (जिमनास्टिक), एस. प्रदीप कुमार (तैराकी, लाइफटाइम) और महाबीर सिंह (कुश्ती, लाइफटाइम) को बेहतर कोचिंग के लिए द्रोणाचार्य पुरस्कार दिया गया है।
ये सभी पुरस्कार निश्चित ही खेल में सुधारों के उत्प्रेरक बनेंगे, लेकिन अभी-अभी रियो ओलंपिक में हमारा जितना निराशाजनक प्रदर्शन रहा है, मेडल लिस्ट में हम फिसड्डी रहे हैं और उसके बाद देश में खेलों में सुधार लाने के लिए गंभीर बहस छिड़ी हुई है, ये भी हमारे खेलों की दशा का एक बड़ा पहलू है। ओलंपिक में भारत के प्रदर्शन से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार इतनी निराश हुई कि अगले तीन ओलंपिक के लिए उसने टास्क फोर्स गठित करने का फैसला किया। यह टास्क फोर्स विशेषज्ञों से लैस होगी और और वे खेलों को ओलंपिक स्तर का बनाने के लिए सुझाव देगी। अक्सर हमारे देश के खेल ढांचे की आलोचन होती है। क्रिकेट को छोड़ कर प्राय: सभी खेल सरकारी संरक्षण में हैं और कोष की कमी से जूझ रहे हैं।
अक्सर कहा जाता है कि देश में खेलों पर नौकरशाही व लालफीताशाही हावी है, जिसके चलते प्रतिभाओं को तराशने का काम नहीं हो पाता है। चयन प्रक्रिया भी दोषपूर्ण है जबकि देश में खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं है। कई प्रतिभाएं संसाधन के अभाव में दम तोड़ देती हैं। हमें खेल के मौजूदा ढांचे के हर स्तर पर सुधार करना होगा। खिलाड़ियों का प्रशिक्षण, र्शेष्ठ प्रतिभाओं का चयन, स्टेडियम-मैदान, टैलेंटेड कोचों की फौज और कोषों की उपलब्धता इन सभी स्तर पर व्यापक सुधार करना होगा। खेल पुरस्कारों के मौकों को हमें अपने खेलों के स्तर में सुधारों के संकल्प के रूप में लेना चाहिए, ताकि देश में और प्रतिभाएं निखर सकें।
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