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डॉ ऐश्वर्या झा का लेख : अनंत संभावनाओं की भाषा हिंदी

आज भाषा को केवल किताबी साहित्य तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि इसके दायरे से कुछ भी अछूता नहीं है। जो भाषा रोजगार नहीं दे पाती, वह बोझ बनने लगती है। सदियों की गुलामी से जकड़ी मानसिकता और मैकाले की शिक्षा नीति से ऐसा लगने लगा था कि हिंदी का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ आज हिंदी शिक्षा, व्यवसाय, विज्ञान, वाणिज्य के क्षेत्र की भाषा के रूप में उभर रही है। इस भाषा में वैज्ञानिक, तकनीकी और उद्यमिता की अपार संभावनाएं हैं। ग्रामीण क्षेत्र में भी बैंकिंग कारोबार, जनसंपर्क, विज्ञापन, विदेशी ब्रांड के दुकान के प्रवेश के साथ स्थानीय लोगों को मौका मिल रहा है। महामारी के बाद वर्क फ्रॉम होम का उपयोग कर मोबाइल एप के जरिये कारोबार स्थानीय भाषाओं में बढ़ा है। सेवा व्यापार में भी हिंदी में गतिविधियां बढ़ी हैं। गेम, ऑनलाइन पढ़ाई आदि ने भी हिंदी के क्षेत्र में रोजगार के नए रास्ते बनाए हैं।

डॉ ऐश्वर्या झा का लेख : अनंत संभावनाओं की भाषा हिंदी
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डॉ ऐश्वर्या झा

डॉ ऐश्वर्या झा

हिंदी के वैश्विक भाषा के रूप में प्रचार प्रसार के लिए पहला विश्व हिंदी सम्मेलन 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित किया गया था जहां 30 देशों के 122 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस दिन विश्व हिंदी दिवस मनाने की अधिकारिक घोषणा वर्ष 2006 में हुई थी, जिसके बाद हर साल 10 जनवरी को, विश्व हिंदी दिवस मनाया जाने लगा। संयुक्त राष्ट्र की शैक्षिक और सांस्कृतिक एजेंसी यूनेस्को के अनुसार, विश्व में 7,000 से अधिक भाषाएं हैं जिसमें भारत की 1635 मातृभाषाएं व प्रमुख 22 भाषा को आधिकारिक मान्यता प्राप्त है। हिंदी हिंदी समूह भाषियों की अनुमानित संख्या सौ करोड़ से भी अधिक है। वर्ल्ड लैंग्वेज डेटाबेस के इथोनोलॉज को मानें तो 61.5 करोड़ से अधिक लोग हिंदी भाषी हैं,जो संख्या के आधार पर विश्व में तीसरा है। पहले स्थान पर अंग्रेजी (113.2 करोड़), चीन की मैंड्रेन भाषा (111.7 करोड़) हैं। भारत एक बहुभाषी देश है, संसार में 20 ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में 6 भारतीय भाषाएं हैं जिसमें हिंदी (तीसरे), बंगाली भाषा (सातवें ), उर्दू (11वें), मराठी(15वें), तेलगू (16वें) एवं तमिल भाषा (19वें ) स्थान पर है।

देश में आपसी संवाद का सबसे सरल माध्यम हिंदी है। कुछ साल पूर्व तक ये लगता था कि ये आमजन के दिल की भाषा तो हो सकती है, किन्तु अच्छे रोजगार के लिए तो अंग्रेज़ी ही जरूरी है। अंग्रेजी के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबदबे का मुख्य कारण इस भाषा के व्यवसाय या टेक्नोलॉजी से जुड़ाव है। आज के समय में किसी भी भाषा की जीवंतता सिर्फ बोलने वालों की संख्या से नहीं बल्कि भाषा का रोज़गारोन्मुख होना भी ज़रूरी है। आज भाषा को केवल किताबी साहित्य तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि इसके दायरे से कुछ भी अछूता नहीं है। जो भाषा रोजगार नहीं दे पाती, वह बोझ बनने लगती है। सदियों की गुलामी से जकड़ी मानसिकता और मैकाले की शिक्षा नीति से ऐसा लगने लगा था कि हिंदी का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ आज हिंदी शिक्षा, व्यवसाय, विज्ञान, वाणिज्य के क्षेत्र की भाषा के रूप में उभर रही है। 1991 के उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण नीति के बाद में इंटरनेट खास कर मोबाइल इंटरनेट क्रांति ने आमजन के गणित को बदल दिया है। आज हिंदी रोजगार की भाषा बनती जा रही है, इस बात में कोई संशय नहीं। हिंदी राष्ट्रीय स्तर हो या अंतरराष्ट्रीय, हर स्तर पर अपना दायरा बढ़ा रही है। नई संभावनाओं के द्वार खोल रही है। कुछ दशक पहले हर माता पिता को लगने लगा था कि उसके बच्चे का भविष्य अंग्रेजी से जुड़ा है। माता-पिता अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में ही पढ़ाना चाहते थे जिससे बच्चा अंग्रेजी सीख सके। चाहे वह उस परायी भाषा में असहज महसूस करे। जीविका के लिए मातृभाषा और विदेशी भाषा की लड़ाई में बच्चे की मेधा शहीद हो जाती थी। आज इस स्थिति में परिवर्तन आया है। हिंदी में भौगोलिक विस्तार के साथ, बोलने वालों की संख्या में भी सबसे तेजी से फैल रही है। अप्रवासी भारतीय व सिनेमा ने हिंदी के विस्तार को नई ऊर्जा दी है। विदेश में न सिर्फ हिंदी पढ़ने वाले बढ़ रहे हैं, बल्कि हिंदी तीसरी भाषा के रूप में स्थापित होने की ओर अग्रसर है । हिंदी भाषा ने इंटरनेट में अपनी बढ़त बनानी शुरू कर दी है। गांव में फैलती मोबाइल क्रांति, ई-कॉमर्स के जाल में हिंदी को पहले से बढ़त प्राप्त है। इस बाजार में इंग्लिश में न व्यापार संभव है न प्रचार।

रोजगार के लिए हिंदी को अर्थशास्त्र के मांग एवं पूर्ति के सिद्धांत पर खरा उतरना होगा। व्यावसायिक कारण से किसी अन्य भाषा को सीखने में कोई बुराई नहीं है, किंतु अपनी भाषा का त्याग करके नहीं। हिंदी भाषी की अच्छी इंग्लिश हो तो वो सोने पर सुहागा की तरह होता है, उनका विकास केवल इंग्लिश जानने वाले से कई गुना अधिक हो सकता है। भारत के लोग संसार के हर कोने में फैले हैं। हिंदी भाषा में रोजगार के लिए इंग्लिश की बेसिक समझ जरूरी है। हिंदी भाषी को अगर गूगल इनपुट टूल सिखा दिया जाए, जो कुछ मिनटों का काम है तो हिंदी टाइपिंग की जटिलता को दूर किया जा सकता है। हिंदी किसी भाषा की विरोधी नहीं रही है। आज हिंदी रोजगार में बाधक नहीं बल्कि रोजगार का जरिया बन रही है। आर्टफिशियल इंटेलिजेंस एवं मशीन लर्निंग का अभी बहुत कम पैमाने पर हिंदी में उपयोग हुआ है, किंतु जल्दी ही ये बहुत बड़ा बाजार बनेगा। मोबाइल क्रांति आने पर भारत इतना बड़ा बाजार बन गया है कि विदेश की कंपनी को हिंदी में काम करना पड़ रहा है। हिंदी भाषी स्कूल एवं कॉलेज, यूनिवर्सिटी को अभी से तैयारी करनी होगी जिस से हिंदी भाषी लोग इस आने वाले अवसर का अधिक फायदा उठा सके। मोबाइल चलाना सीखना या सोशल मीडिया पर अपना अकाउंट चलाना किसी भी भाषा के लोगों के लिए मुश्किल नहीं है, उतनी ही तेज़ी से अंग्रेजी सीख सकते हैं क्या? उत्तर होगा नहीं। पर ये टेक्नोलॉजी हिंदी में आई तो ये रोजगार के साथ भाषा के लिए भी नई संभावनाएं लाएगा। ऑनलाइन हिंदी शिक्षण के कई निजी पाठ्यक्रम स्वरोजगार की दिशा में महत्वपूर्ण वैश्विक प्रयास है। संचार-सूचना प्रौद्योगिकी में दिनों-दिन बढ़ रही हिंदी की उपयोगिता और अनिवार्यता अधिकतम कार्य सक्षम युवाओं को रोजगार दिला रही है। ऑनलाइन शॉपिंग और मार्केटिंग और विकिपीडिया के लिए हिंदी में लेखन सृजनात्मक संतुष्टि के साथ वित्तीय लाभ का अवसर भी दे रहा है। भारतीय मीडिया के माध्यम से आम जनमानस तक हिंदी के पहुंच को धार देने का काम किया है। देश में हिंदी अखबारों और समाचार चैनलों का सबसे बड़ा क्षेत्र है। अगर टॉप 20 अखबारों की बात करें तो इसमें ज्यादातर हिंदी के हैं, वहीं टॉप टेन न्यूज चैनलों में अधिकांश हिंदी के हैं। हिंदी की लोकप्रियता का आलम ये है कि हाल में इंग्लिश न्यूज़ चैनल में हिंदी में बोलने वाले एंकर की संख्या रोज बढ़ रहा है। विज्ञान और तकनीक के रोजमर्रा के काम में उपयोग के बाद, हिंदी का महत्त्व बढ़ने के साथ रोजगार के नए अवसर लाएगा। अनुवाद प्रौद्योगिकी की कई नई तकनीक आई हैं, गूगल, नेटफ्लिक्स, अमेज़न आदि ने हिंदी में लोकलाइज़ेशन पर काम शुरू किया है। इस भाषा में वैज्ञानिक, तकनीकी और उद्यमिता की अपार संभावनाएं हैं। ग्रामीण क्षेत्र में भी बैंकिंग कारोबार, जनसंपर्क, विज्ञापन, विदेशी ब्रांड के दुकान के प्रवेश के साथ स्थानीय लोगों को मौका मिल रहा है। महामारी के बाद वर्क फ्रॉम होम का उपयोग कर मोबाइल एप के जरिये कारोबार स्थानीय भाषाओं में बढ़ा है। सेवा व्यापार में भी हिंदी में गतिविधियां बढ़ी हैं। गेम, ऑनलाइन पढ़ाई आदि ने भी हिंदी के क्षेत्र में रोजगार के नए रास्ते बनाए हैं।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के तार्किक बात कही थी-निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल। अर्थात निज भाषा के बिना उन्नति संभव नहीं है। हिंदी को केवल आधुनिक तकनीक को अंगीकृत कर, समय के मांग के अनुरूप चलना होगा। इस में विद्यार्थी एवं शिक्षक वर्ग को दुनिया में हो रहे बदलाव को समझना होगा। 21वीं सदी निःसंदेह हिंदी भाषा की होगी।

(लेखक हिंदी की प्रोफेसर हैँ, ये उनके अपने विचार हैं।)

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