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होली का हुड़दंग: सारे रंग चुनावी बाल्टी में, बुरा ना मानों होली में

होली में सभी नेता दूसरों को अपने सफेद कपड़े दिखा रहे हैं। साथ ही दूसरों के कपड़ों की कीचड़ दिखाना नहीं भूलते। देखो, तुम पर कितना कीचड़। तुम तो ऊपर से लेकर नीचे तक कीचड़ में लथपथ हो।

होली का हुड़दंग: सारे रंग चुनावी बाल्टी में, बुरा ना मानों होली में

लीजिए लोकतांत्रिक होली का हुड़दंग शुरू हो गया। अब साहब होली है तो हुड़दंग होना स्वाभाविक है। बिना हुड़दंग के कैसी होली। थोड़ा रंग, थोड़ा गुलाल। थोड़ी पानी की बौछार। अब होली है तो थोड़ी छींटाकशी स्वाभाविक है, थोड़ी भंग, थोड़ी तरंग। थोड़ी त्यौहार की उमंग। लोकतांत्रिक होली है तो किसी को बुरा नहीं मानना चाहिए। थोड़ा कीचड़ भी उछालना चाहिए।

अब कब तक गुलाल और फूल से होली खेलते रहोगे। रंग की पिचकारी तो साल भर चलती रहती है, पर होली पर तो थोड़ा ज्यादा हुड़दंग बनता है। यही तो है कीचड़ उछालने का समय। यही तो है मुंह पर कालिख पोतने का समय। अब बिचारे लोकतांत्रिक होलीकर्ता भी क्या करे। जनता की आदतें ही बिगड़ गई हैं। जनता को आहिस्ता-आहिस्ता, शिष्टाचार से कहते हैं तो वो सुनती नहीं है।

नम्रता से कहते हैं, वो समझती है कि नौटंकी कर रहे हैं। अच्छे-अच्छे शब्दों का प्रयोग करते हैं। तो हंसती है, इसीलिए बेचारे एक-दूसरे से बढ़कर होली खेल रहे हैं। भई दूसरों के ऊपर कीचड़ नहीं फेंकेंगे तो खुद का साफ होना कैसे दिखेगा। सभी नेता दूसरों को अपने सफेद कपड़े दिखा रहे हैं। साथ ही दूसरों के कपड़ों की कीचड़ दिखाना नहीं भूलते। देखो, तुम पर कितना कीचड़।

तुम तो ऊपर से लेकर नीचे तक कीचड़ में लथपथ हो। एकमात्र केवल मैं ही साफ हूं। सब अपनी सफेदी की पिचकारी लेकर घूम रहे हैं। बार-बार अपने रंग का प्रचार। सिर्फ एक रंग है ‘मेरा रंग' बाकी सब बेकार। होली पर सभी के मन में उल्लास है। सभी के मन में फागुनी बयार बह रही है। बस इस बार की होली तो अपनी ही रहेगी। इतने सारे रंग चुनावी बाल्टी में ले लिए हैं।

कितने सारे रंग है, काला, पीला, सफेद, लाल, कितना अच्छा घोल बना है। भारतवर्ष की सत्तामय होली पर सिर्फ इस बार अपना इंद्रधनुष ही चमकेगा, पर इंद्रधनुष में प्रमुख रंग की परेशानी आ जाती है। कौन सा रंग प्रमुख रहेगा। इस चक्कर में सारे रंग धूमिल पड़ जाते हैं। बेचारी जनता हतप्रभ है। उन्हें समझ नहीं आता कि कौन सही है। सभी अपनी सफेदी को सर्वश्रेष्ठ बता रहे हैं। सफेदी लग भी ऐसी रही है।

ऐसा उजाला कर रही है कि आंखें चौंधिया जाती हैं, पर जब वो दूसरी पार्टी की कमीज देखती है। तो वो भी वैसी ही नजर आती है। जनता जब अपनी आंखों से देखती है तो उन्हें दाग ही दाग नजर आते हैं। जहां देखो वहां दाग। सफेदी तो कहीं नजर ही नहीं आती। पता नहीं ऐसा क्यों हो रहा है। सब जगह बस प्रचार ही प्रचार चल रहा है। सरकार बस उपलब्धियां ही उपलब्धियां बताए जा रही है।

जब वो पिटारा दिखाती है तो लगता है कि रंग ही रंग है, पर जब पिटारा खुलता है तो सारे रंग न जाने कहां उड़ जाते हैं। फिर विपक्ष विरोध का रंग लेकर आता है तो लगता है कि देश का रूप इसी रंग से निखरेगा। थोड़ी देर बाद वो भी अपना असर छोड़ देता है। सचमुच इस होली पर बहुत गड़बड़झाला है। कितना कीचड़, कितनी कालिमा, कितनी गालियां। पर क्या करें। साहब आखिर लोकतांत्रिक होली जो ठहरी, इतना तो बनता ही है। सो बस कीचड़ फेंके जा रहे हैं।

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