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चिंतन: जजों की संख्या बढ़ाने की सरकार करे पहल

न्याय में देरी का बड़ा कारण सभी स्तरों पर अदालतों में जजों के टोटे हैं।

चिंतन: जजों की संख्या बढ़ाने की सरकार करे पहल

अदालतों पर केसों के बढ़ते बोझ को लेकर अगर हमारे चीफ जस्टिस भावुक हो जाए और प्रधानमंत्री को सांत्वना देना पड़े, तो समझना चाहिए कि न्यायपालिका की स्थिति बहुत भयावह है। पेंडिंग केस देश भर की अदालतों की बड़ी समस्या है। अकेले हाईकोटरें में 38 लाख केस पेंडिंग हैं। सुप्रीम कोर्ट में तकरीबन 84 हजार केस लंबित हैं। निचली अदालतों में यह संख्या करीब तीन करोड़ से ज्यादा है। पेंडिंग केस दो से 20 साल तक के हैं। लंबित मामलों के चलते ही हजारों आरोपी संबंधित अपराध में होने वाली सजा से अधिक समय जेल में काट चुके होते हैं। कई मामलों में तो आरोपी बेगुनाह होते हैं, लेकिन सजा वो जिस अपराध के आरोप बंद होते हैं, उससे अधिक भुगत चुके होते हैं। कहा जाता है कि 'डिलेड जस्टिस इज डिनाइड जस्टिस'।

यानी देर से मिला इंसाफ न्याय नहीं मिलने के बराबर है। न्याय में देरी का बड़ा कारण सभी स्तरों पर अदालतों में जजों के टोटे हैं। 1987 में ही लॉ कमीशन ने प्रति दस लाख की आबादी पर जजों की संख्या पचास करने की सिफारिश की थी। उस वक्त प्रति दस लाख पर केवल दस जज थे। तब से अब तक जजों की संख्या बढ़ाने के लिए विधि आयोग की सिफारिशों को लागू करने की दिशा में कुछ नहीं हुआ है। अभी जजों की संख्या को 21 हजार से बढ़ा कर 40 हजार तुरंत करने की जरूरत है। नई दिल्ली के विज्ञान भवन में मुख्यमंत्रियों और हाईकोर्ट के चीफ जस्टिसों के सम्मेलन में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में अदालतों में जजों की कमी का मुद्दा उठाकर सही समय पर सरकार का ध्यान खींचा है।
ठाकुर ने कहा कि उन्होंने कहा कि देश में मुकदमों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन जजों की नहीं। कोई इस बारे में बात नहीं करता कि जजों ने कितने केस निपटाए। जजों की भी काम करने की क्षमता की लिमिट है। उन्होंने हाईकोर्ट में रिटायर्ड जजों की नियुक्ति की भी वकालत की। उन्होंने कहा कि ऐसे तौर-तरीके अपनाए जाने की जरूरत है जिससे कि पेंडिंग पड़े केस जल्द से जल्द सुलझे और ज्युडिश्यरी की गरिमा बरकरार रहे। सरकार सारा दोष न्यायपालिका के मत्थे नहीं मढ़ सकती। उन्होंने कहा कि अमेरिका में नौ जज पूरे साल में 81 केस सुनते हैं जबकि भारत में छोटे से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक एक-एक जज 2600 केस सुनता है। यह सही है कि अभी कुछ वर्षों से अदालतों पर केस की सुनवाई का बोझ बढ़ा है। मीडिया ट्रायल की प्रवत्ति बढ़ने से भी अदालतों पर दबाव बढ़ जाता है।
ऐसे में जजों की संख्या बढ़ाने की मांग जायज ही है। हालांकि अदालतों पर केसों का दबाव कम करने के लिए केवल जजों की संख्या बढ़ाना ही उपाय नहीं है। न्यायपालिका की पूरी अदालती प्रक्रिया में ही बदलाव की जरूरत है। इसमें तकनीक का अधिक से अधिक इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसके साथ ही बेकार और व्यर्थ कानूनों को समाप्त करने की जरूरत है। कानूनों का सरलीकरण भी किया जाना चाहिए और लोगों में कानूनी साक्षरता बढ़ाने की भी चेष्टा करनी चाहिए। न्यायपालिका को भी सरकार से टकराव की स्थिति से बचने की आवयकता है। पीएम मोदी ने बेकार कानूनों को खत्म करने की प्रक्रिया शुरू भी की है। पीएम ने कहा भी कि न्यायपालिका का कार्यपालिका के साथ टकराव ठीक नहीं है। हालांकि पहले कोलेजियम पर सरकार और सुप्रीम कोर्ट में टकराव हो चुका है। अब सरकार को न्यायिक सुधार पर जल्द से जल्द ध्यान देना चाहिए।
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