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चुनावी नतीजों के मायने हार-जीत का निर्धारण करने से कहीं बढ़कर हैं

चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों के मायने दलों की हार-जीत का निर्धारण करने से कहीं बढ़कर हैं।

चुनावी नतीजों के मायने हार-जीत का निर्धारण करने से कहीं बढ़कर हैं
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नई दिल्ली. चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों के मायने दलों की हार-जीत का निर्धारण करने से कहीं बढ़कर हैं। इन नतीजों से निकले संदेश यहीं नहीं ठहरेंगे, बल्कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों तक जायेंगे और अपना प्रभाव दिखा सकते हैं, क्योंकि अब उसमें मात्र छह माह से भी कम समय रह गया है। इससे भी एक कदम आगे बढ़कर देखें तो ये नतीजे बहुत हद तक हमारी चुनाव प्रणाली और राजनीति में बदलाव की महसूस की जा रही जरूरत की एक बानगी के रूप में भी परिलक्षित हो रहे हैं।


ये यह भी बताते हैं कि देश में विभिन्न विचारधारा वाली राष्ट्रीय पार्टियों और क्षेत्रीय अस्मिता की बात करने वाले क्षेत्रीय दलों की मौजूदगी के बाद भी किसी वैकल्पिक राजनीति की जगह अभी भी कायम है। कांग्रेस की हार की एक बड़ी वजह केंद्र सरकार की नाकामी और विभिन्न मुद्दों पर उसके खिलाफ जनता में आक्रोश के रूप में भी देखा जाना चाहिए। यह नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के नेतृत्व की भी परीक्षा थी। चुनाव राजनीतिक दलों के लिए सबक और संदेश लेकर आते हैं। जिस तरह से कांग्रेस को करारी हार मिली है वह देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए एक संदेश है कि वह अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव लाए। ऐसा कहा जा सकता है कि सत्ता का सेमीफाइल माने जाने वाले इन चुनावों में कांग्रेस हार गई है।

चार राज्यों में भाजपा का प्रदर्शन बेहतर रहना दिखाता है कि उसकी स्वीकारोक्ति बढ़ी है। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व और उनके कामकाज को वहां की जनता ने सराहा है। प्रदेश में कांग्रेस के पास कोई मजबूत चेहरा न होना और उसके अंदर खेमेबाजी भी इस हार की वजह रही है। राजस्थान की सरकार चार वर्षों तक भ्रष्टाचार, अपराध और उसके विधायकों के चरित्र पर लगे दाग से जूझती रही और जब चुनाव नजदीक आए तो सामाजिक सुरक्षा की कुछ योजनाएं लाई, जिसे मतदाताओं ने नकार दिया।

वहीं भाजपा की वसुंधरा राजे सिंधिया की सशक्त छवि और उनके अभियानों ने भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने में भूमिका निभाई। वहीं छत्तीसगढ़ के नतीजे स्पष्ट संदेश हैं कि सामाजिक योजनाओं के साथ एक सशक्त गवर्नेंस से ही आज मतदाताओं के दिलों में जगह बनाई जा सकती है। दिल्ली की विधानसभा देश की राजनीति की बड़ी प्रयोगशाली साबित हुई है। आप पार्टीकी अप्रत्याशित जीत ने देश में एक नई राजनीति की धारा बहायी है। भ्रष्टाचार के आंदोलन से जन्मी पार्टी आप दिल्ली में जिस तरह से उभरी है उससे स्पष्ट हैकि आम जनता वर्तमान राजनीति से इतर एक नई विकल्प की तलाश कर रही है और मौका मिले तो वह उसे अपना सर्मथन दे सकती है।

आप ने जिस तरह से चुनाव लड़े और एक मानक बनाया है वह दूसरे दलों के लिए संदेश है कि मुद्दे पर और सादगी से भी चुनाव लड़े और जीते जा सकते है। अब केवल थोथे वादे कर जनता को बरगला नहीं सकते। दूसरे दलों के लिए एक संदेश है। अब परंपरागत कार्यसंस्कृति बदलनी होगी। इन नतीजों में कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार के लिए भी संदेश छिपे हैं। वोटर बदल रहा है राजनीतिक दलों को भी खुद को उनके अनुसार ढालना होगा।

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