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विश्लेषण : भारतीय राजनीति में पीएम के लिए शर्मनाक बयान, विपक्ष की हताशा का परिचय

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू सोमवार को दिल्ली में आंध्र भवन में धरने पर बैठे। उन्होंने आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर केंद्र के खिलाफ धरना दिया है। इस दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, पूर्व पीएम डा. मनमोहन सिंह भी चंद्रबाबू नायडू को अपना समर्थन देने के लिए आए। लेकिन चंद्रबाबू के धरनास्थल पर एक तख्ती लगी हुई थी, जिस पर पीएम नरेंद्र मोदी के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया है। तख्ती पर लिखा है कि ‘जिसके हाथ में चाय का झूठा कप देना था, उसके हाथ में जनता ने देश दे दिया’।

विश्लेषण : भारतीय राजनीति में पीएम के लिए शर्मनाक बयान, विपक्ष की हताशा का परिचय

भारतीय राजनीति में दिनोंदिन भाषा की गिरती स्तर चिंता पैदा करती है। खासकर जब चुनाव नजदीक हो तो हमारे नेताओं की भाषा निम्न स्तर की हो जाती है। साठ के दशक में जहां राजनीति में मर्यादित भाषा का इस्तेमाल होता था, राजनीतिक सोच अलग होने के बावजूद एक-दूसरे के प्रति सम्मान का भाव रहता था, आज 21वीं सदी में विरोधियों के लिए निकृष्ट भाषा का प्रयोग हो रहा है।

यह हमारी राजनीति की गिरावट का परिचायक है, जबकि ये उच्च स्तर पर जाना चाहिए था। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू सोमवार को दिल्ली में आंध्र भवन में धरने पर बैठे। उन्होंने आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर केंद्र के खिलाफ धरना दिया है। इस दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, पूर्व पीएम डा. मनमोहन सिंह भी चंद्रबाबू नायडू को अपना समर्थन देने के लिए आए।

लेकिन चंद्रबाबू के धरनास्थल पर एक तख्ती लगी हुई थी, जिस पर पीएम नरेंद्र मोदी के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया है। तख्ती पर लिखा है कि ‘जिसके हाथ में चाय का झूठा कप देना था, उसके हाथ में जनता ने देश दे दिया’। दरअसल, मोदी के बारे में कहा जाता है कि बचपन में गरीबी के चलते उन्होंने अपने पिता की चाय की दुकान में हाथ बंटाया था, वे खुद स्टेशन पर चाय बेचते थे।

मोदी के इस अतीत को विपक्षी दल निशाना बनाते रहते हैं। 2014 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने मोदी पर ताना मारा था कि ‘हम आम चुनाव के नतीजे के बाद कांग्रेस मुख्यालय के बाहर एक चाय की दुकान खुलवा देंगे’। यह कांग्रेस के अभिमान का परिचायक था। चुनाव नतीजे में देश की जनता ने कांग्रेस को अर्श से फर्श पर पहुंचा दिया था।

गुजरात दंगे को ध्यान में रखकर भी कांग्रेस मोदी के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करती रही है। पीएम मोदी के लिए राहुल गांधी ने भी खून की दलाली समेत कई बार निम्न स्तर का भाषा का इस्तेमाल किया है। राहुल तो पीएम के लिए आदरसूचक संबोधन तक नहीं कर पाते हैं, जोकि उनके सामंती अहंकार को दर्शाता है।

इस बार चंद्रबाबू के धरने स्थल पर मोदी को टार्गेट करने के लिए जिस तरह की बदजुबानी की गई है, वह विपक्ष की हताशा को ही दर्शाती है। चंद्रबाबू ने एक दिन पहले ही रविवार को मोदी की पत्नी के बहाने उन पर छींटाकशी की थी। दरअसल, मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और भाजपा की बढ़ती ताकत से समूचा विपक्ष घबराया हुआ है, उसे समझ नहीं आ रहा है कि वे क्या करें?

विपक्ष के पास किसी तरह का नीतिगत एजेंडा नहीं होने के चलते वे केवल मोदी को निशाना बनाते हैं, वे उनके व्यक्तित्व पर कीचड़ उछालने का प्रयास करते हैं, जैसा आजकल राहुल गांधी राफेल मिसाइल छोड़कर कर रहे हैं। ईमानदारी व मेहनत से किया गया कोई भी काम बुरा नहीं है, शर्मनाक नहीं है। दुर्भाग्य से भारत में श्रम की कद्र नहीं है।

भारतीय चिंतन में श्रम को वह स्थान प्राप्त नहीं है, जो कभी सोने की चिड़िया के समय हुआ करता था। परजीवी वर्ग जबसे सत्ता में हावी होने लगा, तब से श्रम की महत्ता कम होने लगी। यही वजह है कि चाहे कांग्रेस के शीर्ष नेता हो, चाहे चंद्रबाबू जैसे पारिवारिक नेता हो, अपनी सामंती सोच के चलते वे चाय बेचने, ढाबा पर खाना बेचने जैसे श्रम प्रधान काम करने वालों को हेय की दृष्टि से देखते हैं, उनके प्रति हिकारत का भाव रखते हैं।

जबकि श्रम का आदर होना चाहिए। चाय बेचना गलत नहीं है। गरीब होना अभिशाप नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती है कि एक आम इंसान भी देश के शीर्ष पद तक पहुंच सकता है। भारतीय राजनीति को सामंती सोच से ग्रस्त वंशवाद-परिवारवाद से छुटकारा मिलनी चाहिए। राजग के कुछ नेता भी बदजुबानी करते हैं, उन्हें भी अपने में सुधार करना चाहिए। सियासत में हमें भाषा की शालीनता बनाए रखनी चाहिए। सभी दल यह कोशिश करें, तभी हमारी राजनीति की गरिमा बरकरार रहेगी।

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