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ऐसे में तो मिस्र अराजकता का शिकार हो जाएगा

आधुनिक दुनिया के इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में लोगों को एक साथ मौत की सजा सुनायी गई है।

ऐसे में तो मिस्र अराजकता का शिकार हो जाएगा
मिस्र की एक अदालत द्वारा मुस्लिम ब्रदरहुड के 529 सदस्यों को एक पुलिस अधिकारी की हत्या और पुलिस पर हमले के आरोप में मौत की सजा सुनाना दर्शाता है कि तमाम आंदोलनों के बाद भी देश तानाशाही के चंगुल से निकल नहीं पाया है। आधुनिक दुनिया के इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में लोगों को एक साथ मौत की सजा सुनायी गई है। पिछले साल मुस्लिम ब्रदरहुड के मोहम्मद मोर्सी को राष्ट्रपति पद से अपदस्थ किए जाने के बाद से मिस्र प्रशासन लगातार इस्लामियों पर कठोर कार्रवाई कर रहा है। ये सभी कार्रवाइयां एकतरफा हो रही हैं। जैसा कि बचाव पक्ष के वकीलों का भी आरोप है कि उन्हें अपना केस रखने का मौका नहीं दिया गया। मुस्लिम ब्रदरहुड एक मुस्लिम राजनीतिक संस्था है जिसे वहां की सैनिक सरकार आतंकी संगठन मानती है। इतना ही नहीं अब इस संगठन को रूस, सीरिया, सउदी अरब और यूएई में भी आतंकी संगठन के तौर पर ही देखा जाने लगा है। तीन साल पहले तानाशाही से मुक्ति पाने के लिए मिस्र की जनता सड़कों पर आई थी। तहरीर चौक दुनिया में आंदोलन की नई परिभाषा गढ़ रहा था। हालांकि वह स्वत: उठा आंदोलन था, जिसने सोशल मीडिया से ताकत पायी थी। होस्री मुबारक को अंतत: सत्ता छोड़नी पड़ी और तीस वर्ष के तानाशाही शासन का अंत हो गया। हालांकि उस आंदोलन के साथ समस्या यह भी थी कि उसका नेतृत्व करने वाला कोई नहीं थी। यही वजह रही कि होस्री मुबारक के बाद हुए चुनावों में मुस्लिम ब्रदरहुड की सरकार बनी और मोहम्मद मोर्सी राष्ट्रपति चुने गए। शुरू में लगा की मिस्र को लोकतंत्र के रास्ते पर चलने से अब कोई नहीं रोक पाएगा, परंतु मिस्रवासियों को तब गहरा आघात पहुंचा जब निर्वाचित राष्ट्रपति देश को कट्टरपंथी इस्लाम के रास्ते पर ले जाने के लिए संविधान में कई संशोधन करा लिए। ऐसा कर उन्होंने खुद को न्यायिक शक्तियों से भी मुक्त कर लिया था। इसके बाद खुद को छला हुआ महसूस कर रही जनता तहरीर चौक पर जुटने लगी थी। ऐसे हालात का वहां की सेना ने फायदा उठाया और मोहम्मद मोर्सी को राष्ट्रपति पद से हटना पड़ा। जाहिर है, मिस्र जहां से चला था वहीं पहुंच गया है। तमाम आंदोलनों और बलिदानों का कुछ नतीजा नहीं निकल पाया है। मध्य-पूर्व देश के जानकार प्रोफेसर कमर आगा के अनुसार मिस्र की सेना ऐसा दमन की नीति के तहत कर रही है। सेना चाहती है कि मुस्लिम ब्रदरहुड को दबा दिया जाए। इस तरह सेना न तो उदारवादियों को आगे आने देना चाहती है और न ही मुस्लिम ब्रदरहुड को।ऐसा कर वह स्वयं सत्ता कब्जाए रखना चाहती है। ऐसी कार्रवाइयों से मिस्र और उसकी जनता को कोई विशेष लाभ नहीं होंगे, उल्टे वहां अराजकता ही फैलेगी। एक अराजक मिस्र विदेश शांति के लिए खतरा बन सकता है। वहां की सेना को चाहिए था कि गत वर्ष जुलाई में सत्ता की बागडोर अपने हाथ में लेने के बाद राजनीतिक सुधार की प्रक्रिया की शुरुआत करती और मिस्र को लोकतंत्र के रास्ते पर लाने के लिए चुनाव कराती पर दुर्भाग्यवश वह भी पिछली तानाशाही सरकारों के नक्शेकदम पर चलते हुए बदले की कार्रवाई में ही वक्त जाया कर रही है, जो उचित नहीं है।
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