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करारी हार से कांग्रेस के भीतर आत्ममंथन शुरू

चिंतन

करारी हार से कांग्रेस के भीतर आत्ममंथन शुरू
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सत्ता का सेमीफाइनल माने जा रहे विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद क्या पार्टी यह कयास लगाने लगी हैकि आगामी लोकसभा चुनाव के नतीजे उसके खिलाफ जाने वाले हैं? कांग्रेस के सांसद मणिशंकर अय्यर के बयान, जिसमें उन्होंने कहा हैकि 2014 में कांग्रेस शायद हार सकती है, और यूपीए सरकार के घटक दलों में नतीजों को लेकर जिस तरह से हाहाकार मची है, उससे तो कम से कम यही आभास होता है। वहीं यह भी अब बिल्कुल साफ होने लगा हैकि अगली केंद्र सरकार का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टीकरने जा रही है। मतदाताओं में भाजपा के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की स्वीकारोक्ति बढ़ रही है, जिसका विधानसभा चुनावों में उन्होंने संकेत भी दिया है। कांग्रेस की मौजूदा हार संगठन और नेतृत्व के साथ ही यूपीए सरकार की नीतियों और कांग्रेस की आंतरिक रणनीतियों की भी नाकामी का नतीजा है। देश की करीब सवा सौ वर्ष पुरानी पार्टी अपनी राजनीतिक जमीन ही नहीं खो रही है, बल्कि लगातार सिमटती भी जा रही है, तो इसके कईवजह हैं। कांग्रेस भी इसे अच्छी तरह जानती है, परंतु हैरानी की बात यह है कि वह उन्हें दूर करने की बजाय नजरअंदाज करती दिख रही है। वर्ष 2009 के बाद से हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे अपवादों को छोड़ दें तो पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी अब तक कोई करिश्मा नहीं दिखा पाए हैं, परंतु उनके नेतृत्व पर पार्टी कोई चर्चा तक नहीं करना चाहती। यही स्थिति प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की है, वे देश की जनता से सीधे संवाद करने की स्थिति में नहीं हैं। दरअसल, कांग्रेस की दुर्दशा की सबसे बड़ी वजह कमजोर नेतृत्व, आम आदमी से कटना, कुशासन, महंगाई, भ्रष्टाचार और पार्टी के अंदर गुटबाजी है। यूपीए के घटक दल भी अब समझने लगे हैं कि आगामी लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का क्या हर्श होने वाला है, लिहाजा उनके सुर बदलने लगे हैं। कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा है कि लोग कमजोर नेता को स्वीकार नहीं करते। शासक को सशक्त होना चाहिए, जो न सिर्फ प्रभावी कदम उठा सके, बल्कि फैसला लेने और उसे लागू कराने की भी क्षमता रखता हो। भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी में इन सारी खूबियां होने के कारण ही मतदाता उन्हें आगामी प्रधानमंत्री के रूप में पसंद करते दिख रहे हैं। वहीं सपा और बसपा ने भी यूपीए को नसीहत देते हुए यह संकेत दे दिया है कि वे भी हारी हुई कांग्रेस का साथ देकर अपनी लुटिया नहीं डुबोएंगी, बल्कि जरूरत आने पर साथ छोड़ भी देंगे। दूसरी ओर तृणमूल की ममता बनर्जी और नीतीश कुमार आप की जीत से उत्साहित हों, जिस तरह का राग आलाप रहे हैं उससे लग रहा है कि आगामी चुनावों में आप पार्टी से इतर भाजपा और कांग्रेस के साथ एक तीसरा मोचरे भी खड़ा हो सकता है। आठ दिसंबर के बाद से देश में तेजी से राजनीतिक हालात बदले हैं वह भी अप्रत्याशित है। मणिशंकर अय्यर जैसे नेता स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि कांग्रेस को सत्ता के ठेकेदारों को बाहर करना होगा और खुद में आमूल-चूल परिवर्तन करने होंगे, लेकिन यह आसान नहीं है और न ही छह महीनों में होने वाला है। इसके लिए वक्त चाहिए और साहसी नेतृत्व भी, जो क्षत्रपों से निपट सके और आम आदमी के एजेंडे को पार्टी के अंदर लागू कर सके। क्या कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व यह कर पाएगा? यह बड़ा सवाल है।

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