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चिंतन: कारोबार के लिए किराये पर कोख देना सही नहीं

भारत में किसी भी महिला को कर्मशियल सरोगेसी का कानून अधिकार नहीं है।

चिंतन: कारोबार के लिए किराये पर कोख देना सही नहीं
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भारत में सरोगेसी (किराये की कोख) पर एक बार फिर से केंद्र सरकार ने कानूनी स्थिति को साफ किया है। सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने हलफनामा देकर स्पष्ट किया है कि भारत में किसी भी महिला को कर्मशियल सरोगेसी का कानून अधिकार नहीं है। सरकार ने कहा कि देश में किसी भी भारतीय महिला को जरूरतमंद भारतीय विवाहित निसंतान दंपति के लिए परोपकार के तहत सरोगेट मदर (किराये की मां) बनने का हक है, लेकिन वह अपने इस हक का इस्तेमाल किसी विदेशी या भारतीय के लिए कर्मशियल यानी कमाई के लिए नहीं कर सकती है। दरअसल भारत में सरोगेसी पर कानूनन प्रतिबंध नहीं है, लेकिन यह सुविधा निसंतान भारतीय नागरिकों के साथ-साथ ओवरसीज सिटिजंस ऑफ इंडिया, भारतीय मूल के लोग, नॉन रेजिडेंट इंडियंस और भारतीय नागरिक से विवाह करने वाले किसी भी विदेशी (सभी मामले में निसंतान) के लिए ही है। यानी कि उसके लिए जिसका कनेक्शन किसी न किसी रूप में भारत से हो। चूंकि ब्रिटेन, फ्रांस, र्जमनी समेत समस्त यूरोप, आस्ट्रेलिया, थाईलैंड में सरोगेसी पर बैन है और अमेरिका में नियम सख्त है। इसलिए देखा यह गया है कि कई विदेशी नागरिक भारत में कानूनी ढील का लाभ उठाने की कोशिश करते हैं। दूसरा बड़ा कारण है कि भारत में सरोगेसी की तकनीक (सहायक प्रजनन टेक्नीक यानी एआरटी) विश्व से 10 गुणा तक सस्ती है, यहां अच्छे डॉक्टरों से लैस वर्ल्ड क्लास आईवीएफ सेंटर हैं और स्थानीय महिलाओं की आसान उपलब्धता है, जो विदेशियों को आकर्षित करता है। विदेश में जहां 10 से 50 लाख रुपये तक खर्च है, वहीं भारत में मात्र ढाई से छह लाख रुपये ही खर्च आता है। भारत में 2002 में सरोगेसी को मान्यता दी गई थी। भारत में 23 जून 1994 में प्रथम सरोगेट शिशु के साथ सरोगेसी की शुरूआत हुई, लेकिन विश्व का ध्यान इस ओर 2004 में गया, जब एक महिला ने अपनी ब्रिटेन में रहने वाली बेटी के लिए एक सरोगेट शिशु को जन्म दिया। इसके बाद तो जैसे भारत सरोगेसी हब के रूप में तेजी से उभरा। गुजरात के आणंद 150 से ज्यादा आईवीएफ केंद्र हैं। अभी देशभर में कृत्रिम गर्भाधान, आईवीएफ और सरोगेसी मुहैया कराने वाले करीइ दो लाख क्लीनिक हैं। सरोगेसी सालाना 25 अरब रुपये का कारोबार बन गई है। इसके चलन में तेजी की वजह निसंतान दंपति के अलावा सिंगल मदर/फादर, वर्किंग क्लास और गोद लेने की जटिल क्रिया भी है। इसके अलावा सरोगेट बच्चे की सामाजिक मान्यता भी है। साथ ही इसमें लोग जैविक रूप से अपनी संतान प्राप्त करते हैं। लेकिन इसी के साथ भारत में कई लोगों ने इसे धंधा बना लिया। यह कहीं से भी स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में सही पक्ष रखा है कि गैरकानूनी कर्मशियल सरोगेसी से महिलाओं की रक्षा करना जरूरी है। देश में बहुत से गरीब महिलाएं हैं, जो मजबूरन इसका शिकार बन सकती हैं। इन्हें बचाना जरूरी है। जरूरतमंद इस तकनीकी वरदान का लाभ जरूर लें, लेकिन मुनाफे के लिए इसे तिजारत नहीं बनाएं। सामाजिक स्तर पर भी सरोगेसी पर एक व्यापक संवेदनशीलता की जरूरत है।
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