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प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था में सुधार जरूरी

देश के अधिकांश सरकारी प्राथमिक स्कूलों में न तो पर्याप्त शिक्षक हैं और न ही वे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे पा रहे हैं।

प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था में सुधार जरूरी
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बच्चों का भविष्य उनको मिलने वाली प्राथमिक शिक्षा पर निर्भर करता है। अर्थात हम अपने बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा किस प्रकार की देते हैं, उनके भावी भविष्य का निर्धारण भी इसी से होता है, लेकिन देश में प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था किस कदर बदहाल है, यह समय समय पर प्रकाशित होने वाले आंकड़ों से साफ हो जाता है।

शिक्षा का अधिकार फोरम ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि देश में 98443 सरकारी प्राथमिक स्कूल सिर्फ एक शिक्षक की बदौलत चल रहे हैं। अर्थात देश के करीब 11.46 फीसदी प्राथमिक स्कूलों में कक्षा एक से पांचवीं तक के छात्रों की पढ़ाई-लिखाई का पूरा जिम्मा सिर्फ एक शिक्षक के कंधों पर है। जाहिर है, ये शिक्षक अलग-अलग कक्षा के छात्रों को शिक्षा देने के नाम पर मात्र खानापूर्ति ही करते होंगे। और जिस दिन ये शिक्षक अनुपस्थित रहते होंगे उस दिन स्कूल भी बंद रहते होंगे।

इस साल के शुरुआत में ग्रामीण इलाके के सरकारी स्कूलों की शैक्षिक स्थिति पर गैर-सरकारी संस्था ‘प्रथम’ द्वारा जारी 10वीं एनुअल स्टेट्स ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर)-2014 में कहा गया था कि सरकारी स्कूलों में बच्चों के सीखने, सिखाने व समझने का स्तर लगातार गिर रहा है। उसके अनुसार कक्षा-पांच में 48 फीसदी बच्चे कक्षा-दो का पाठ नहीं पढ़ पाते हैं। कक्षा दो के बच्चे तो नौ से ऊपर के अंकों को भी नहीं पहचान पाते हैं।

इससे स्पष्ट होता है कि देश के अधिकांश सरकारी प्राथमिक स्कूलों में न तो पर्याप्त शिक्षक हैं और न ही वे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे पा रहे हैं। देश में इस समय 13.62 लाख प्राथमिक स्कूल हैं, परंतु इनमें 41 लाख शिक्षकों की ही नियुक्ति हो पाई है। देश में बारह लाख से भी ज्यादा शिक्षकों के पद आज भी खाली पड़े हैं तथा जो शिक्षक हैं भी उनमें 8.6 लाख शिक्षक अप्रशिक्षित हैं। ऐसी परिस्थितियों में देश में प्राथमिक शिक्षा की ढांचागत गुणवत्ता, शिक्षक का शिक्षण-प्रशिक्षण तथा शिक्षक-छात्र अनुपात तथा शिक्षा गारंटी जैसे लक्ष्यों की वास्तविक दशा का अनुमान स्वत: ही लगाया जा सकता है।

देश में बुनियादी शिक्षा के ढांचे के लगातार कमजोर होने का दुष्परिणाम यह हो रहा है कि उससे हमारी माध्यमिक व उच्च शिक्षा भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रही है। इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता कि मिड डे मील, वेशभूषा, साइकिल और पाठ्य पुस्तकों के लालच से सरकारी स्कूलों में 96 फीसदी तक प्रवेश बढ़े हैं, परंतु क्या बुनियादी शिक्षा का उद्देश्य मात्र स्कूलों में भर्ती बढ़ाने तक ही सीमित रहना चाहिए? देश की प्राथमिक शिक्षा में योग्य व प्रतिबद्घ शिक्षकों और इसके बुनियादी तंत्र को र्शेष्ठता के आधार पर विकसित करने की जरूरत है।

इसकी शुरुआत शिक्षा व्यवस्था में व्यापक और जमीनी सुधार से करनी होगी, तभी हम वैश्विक प्रतियोगिता का सामना कर पाएंगे। शिक्षा पर समुचित खर्च के साथ-साथ यदि उसकी गुणवत्ता पर ध्यान दे दिया जाए तो हम अपने उद्देश्य में सफल हो जाएंगे और भारत को विकसित करने की दिशा में बढ़ पाएंगे। वर्तमान ज्ञान आधारित विश्व में अपनी पूर्ण क्षमता का दोहन करने के लिए सबसे जरूरी है कि हम पहले अपनी प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था में अपेक्षित सुधार लाएं।

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