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चिंतन: समलैंगिकता पर सूझबूझ भरे संतुलन की जरूरत

सुप्रीम कोर्ट दो बार धारा 377 को अमान्य ठहराने से इन्कार कर चुका है।

चिंतन: समलैंगिकता पर सूझबूझ भरे संतुलन की जरूरत
भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 के तहत समलैंगिकता अपराध बनी रहेगी या इसे अपराध की र्शेणी से हटाया जाएगा, यह प्रश्न अब सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ के पास चला गया है। इस अहम मसले पर दायर क्यूरेटिव पिटीशन की शीर्ष अदालत के तीन जजों की बेंच ने सुनवाई की और बेंच ने इसे संविधान पीठ को भेज दिया। माना जा रहा है कि इस पर विस्तार से सुनवाई होगी। दरअसल, आईपीसी की धारा 377 के तहत समलैंगिक संबंधों को अपराध घोषित किया गया है। इस मामले में 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने दो वयस्कों की सहमति से निजी तौर पर संबंध बनाने को अपराध की र्शेणी में नहीं रखने का फैसला किया था। लेकिन हाईकोर्ट के इस फैसले को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, 11 दिसंबर, 2013 को सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए समलैंगिकता को आईपीसी की धारा 377 के तहत अपराध बरकरार रखा। उसके बाद 28 जनवरी 2014 को दो जजों की बेंच ने भी इस फैसले पर दाखिल पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी थी। उसके बाद इस मामले में नाज फाउंडेशन, श्याम बेनेगल और समलैंगिकों के संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन दायर किया। 23 अप्रैल, 2014 को चार जजों- तत्कालीन चीफ जस्टिस पी सदाशिवम, जस्टिस आरएम लोढ़ा, जस्टिस एचएल दत्तू और जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय - की बेंच ने क्यूरेटिव पिटीशन पर खुली अदालत में सुनवाई करने का फैसला दिया था, हालांकि इस समय ये चारों जज रिटायर हो चुके हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों ने इस की सुनवाई की और मामले को संविधान पीठ को भेज दिया। शीर्ष अदालत के इस मूव से एलजीबीटी (लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल व ट्रांसजेंडर) समुदाय समलैंगिकता को अपराधमुक्त बनाने की अपनी मुहिम को उत्साहित है। उन्हें संविधान पीठ से उम्मीद जगी है। 2013 में सुप्रीम कोर्ट के ट्रांसजेंडरों को तीसरी कैटेगरी में शामिल कर उन्हें ओबीसी के तहत आरक्षण और दूसरी सुविधाएं देने के आदेश से भी एलजीबीटी समुदाय की उम्मीदें सुप्रीम कोर्ट से बढ़ गई हैं। पर समलैंगिकता के मसले पर भारत की स्थिति देखें तो यहां के धार्मिक संगठन इसके खिलाफ है, केंद्र सरकार भी विरोध में है। सुप्रीम कोर्ट भी दो बार धारा 377 को अमान्य ठहराने से इन्कार कर चुका है। राजनीतिक दल वक्तव्यों में एलजीबीटी समुदाय के साथ खड़े दिखते हैं और मौके पर सहानुभति दिखाते हैं, लेकिन व्यवहार में कुछ नहीं कर रहे हैं। हमारी संस्कृति भी इसकी इजाजत नहीं देती। लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि हमारा संविधान धारा 21 के तहत सबको समान मौलिक अधिकार देता है और दुनिया के अनेक देशों में समलैंगिकों को कानूनी मान्यता है। भारत में भी इसकी बड़ी आबादी है, इसलिए बदलते समाज में इसे अनदेखा नहीं कर सकते। अच्छा तो यही होता कि राजनीतिक दल इस मसले पर संसद के जरिये बोल्ड स्टेप लेता और धारा 377 पर विचार करता। संविधान पीठ का फैसला जो भी हो, लेकिन इस मसले पर सूझबूझ के साथ सभी पक्षों को केंद्र में रखकर संतुलन बनाने की जरूरत है।
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