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कई सवाल खड़ा कर रहा हरक्यूलिस विमान हादसा

पांच दशक बाद कोई अमेरिकी सैन्य विमान भारतीय वायु सेना में शामिल हुआ था।

कई सवाल खड़ा कर रहा हरक्यूलिस विमान हादसा
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भारतीय वायुसेना का हरक्यूलिस सी-130जे परिवहन विमान का दुर्घटनाग्रस्त होना कई सवाल खड़ा कर रहा है। पिछले वर्ष अगस्त में जब यह विमान चीन से लगे एलएसी के निकट लद्दाख के दौलतबेग ओल्डी स्थित हवाई पट्टी पर उतरा था तब लगा था कि भारतीय वायु सेना अपने पुराने दौर को पीछे छोड़ते हुए एक नई ताकत के रूप में उभर रही है। पर इसका दुर्घटनाग्रस्त होना देश के सैन्य तैयारियों के साथ-साथ सेना के आधुनिकीकरण और उसकी प्रक्रिया पर भी एक गंभीर प्रश्न चिह्न् लगा दिया है। हाल के कुछ महीनों के दौरान हमने देखा हैकि नौसेना में एक के बाद एक किस तरह कई हादसे हुए हैं।
ऐसे हादसों में जवानों की असमय जान तो जाती ही है संसाधनों की भी भारी क्षति होती है। बीते दिनों में नौसेना की कई पनडुब्बियां दुर्घटनाग्रस्त हो रही थीं तब कहा जा रहा था कि वे अब पुरानी हो गई हैं। वे नौसेना के बेड़े में दो दशक से ज्यादा समय से हैं। उनके रिप्लेसमेंट की जरूरत है। हालांकि भारतीय सैन्य जगत की यह कटु सच्चाई है कि सेना के तीनों अंग कमोबेश जंग खाए उपकरणों के सहारे ही हैं। देश में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया बेहद धीमी रही है। इसमें तेजी लाने की मांग वर्षों से हो रही है। पुराने उपकरणों का दुर्घटनाग्रस्त होना एक बात है, लेकिन जब हाल ही में शामिल होने वाले विमान हादसों की भेंट चढ़ जाएं तो चिंतित होना लाजमी हो जाता है। माल वाहक विमान हरक्यूलिस चार वर्ष पहले भारतीय वायुसेना में शामिल हुआ था।
पांच दशक बाद कोई अमेरिकी सैन्य विमान भारतीय वायु सेना में शामिल हुआ था। हादसे के बाद अब भारत के पास पांच ही ऐसे विमान बच गए हैं। भारत ने ऐसे छह विमानों के लिए अमेरिका को 6000 करोड़ रुपए चुकाये हैं। ऐसे में एक विमान की कीमत एक हजार करोड़ रुपये आती है। यह छोटी पट्टी पर उतरने और उड़ान भरने में सक्षम है। सैन्य विमानों के इतिहास में हरक्यूलिस सबसे ज्यादा उत्पादित होने वाला एयरक्राफ्ट है। पचास वर्षों के दौर में इसका सैन्य, नागरिक और हादसों के दौरान मानवीय सहायता के क्षेत्र में बेहतर इस्तेमाल हुआ है, हो भी रहा है। इसकी विश्वसनीयता का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि दुनिया के करीब पंद्रह देश इसका विभिन्न कायरें के लिए इस्तेमाल करते हैं। यही नहीं इसमें चार इंजन हैं और यह दुनिया के आधुनिकतम विमानों में से एक होने के साथ सुरक्षा की दृष्टि से भी सर्वर्शेष्ठ माना जाता रहा है। फिर यह क्यों क्रैश हो गया, इसकी जांच होनी चाहिए।
यहां यह भी ध्यान देने वाली बात है कि देश में जो उपकरण खरीदे जाते हैं, उनकी गुणवत्ता का निर्धारण किस तरह से किया जाता है। इससे तो वह प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में आती है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा उपकरण आयातक है और रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार समय-समय पर उजागर होते रहते हैं। गाहे बगाहे यह आरोप भी लगते रहे हैं कि सौदा हथियाने के लिए कंपनियां बड़ी राशि कमीशन के रूप में खर्च कर देती हैं। इस संदर्भ में यह जांच का विषय होना चाहिए कि कहीं दोयम दज्रे के उपकरण तो नहीं खरीदे जा रहे हैं। यदि ऐसा है तो उसे दुरुस्त करने की जरूरत है, नहीं तो असमय हमारे जवानों की जान जाती रहेगी। और देश को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

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