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करंसी वार छिड़ा तो गहराएगा संकट

चीन की अर्थव्यवस्था में गिरावट के संकेत मिलने के बाद विशेषज्ञों की ओर से ऐसा अनुमान जाहिर किया जा रहा है।

करंसी वार छिड़ा तो गहराएगा संकट

गत दिनों चीन द्वारा अपनी मुद्रा युआन के अवमूल्यन के बाद दुनिया में करंसी यानी मुद्रा वार छिड़ने की आशंका जताई जाने लगी है। रिर्जव बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने कहा हैकि मौजूदा स्थिति चिंताजनक नहीं है, लेकिन आने वाले दिनों में चीन युआन के मूल्य को और कम करता है, तो भारत सहित दूसरे देशों को भी वैसा कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ेगा। दरअसल, चीन की अर्थव्यवस्था में गिरावट के संकेत मिलने के बाद विशेषज्ञों की ओर से ऐसा अनुमान जाहिर किया जा रहा है कि वह अपनी मुद्रा को दस फीसदी तक अवमूल्यन कर सकता है। आमतौर पर चीन स्थिर मुद्रा का सर्मथक रहा है, लेकिन निर्यात में आ रही गिरावट को दूर करने के लिए उसने युआन के मूल्य को पिछले दिनों करीब तीन फीसदी कम कर दिया। जिससे दुनिया भर में उसका निर्यात सस्ता हो गया है। मालूूम हो कि चीन की अर्थव्यवस्था निर्यात आधारित है, लेकिन विश्व बाजार में सुस्ती की वजह से प्रमुख देशों में मांग घटी है, जिसका सबसे ज्यादा प्रभाव चीन पर पड़ा है। मांग कम होने का परिणाम यह हुआ है कि चीन का निर्यात गिर गया है।

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चीन इसे बढ़ाना चाहता है, उसे उम्मीद हैकि निर्यात सस्ता होने से दुनिया में उसकी वस्तुओं की मांग बढ़ेगी, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था में गति आएगी। दूसरी ओर इसका खामियाजा भारत जैसे देशों को उठाना पड़ रहा है। यदि ऐसे हालात लंबे समय तक बने रहे तो दूसरे देश भी अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए अपनी-अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करने लगेंगे। भारत लंबे समय से मुद्रा संकट से जूझ रहा है। युआन के मूल्य में गिरावट करने के बाद से रुपये में डॉलर की तुलना में दो फीसदी की गिरावट आ गई है। यही नहीं डॉलर के मुकाबले एक के बाद एक मुद्रा गिरती जा रही है। ब्राजील का रियाल इस साल के शुरू से अब तक 23 फीसदी कमजोर हो चुका है। रूसी रूबल 2013 से अपनी आधी से ज्यादा मूल्य गंवा चुका है। इससे लगता है कि आयात घटाने और निर्यात बढ़ाने के लिए एक-दूसरे की होड़ में अपनी मुद्रा का मूल्य घटाने का दौर शुरू हो गया है। 2008 में आई वैश्विक मंदी ने दुनियाभर में आर्थिक विकास पर असर डाला था। फिर भी तब देशों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं को बचाने के लिए न तो मुद्रा का मूल्य घटाने की होड़ मचाई थी और न ही आयात पर भारी-भरकम शुल्क लगाया था।

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आर्थिक इतिहास ने सबक दिया है कि 1930 के दशक में आई महामंदी मुद्राओं का मूल्य घटाने और आयात पर सीमा शुल्क बढ़ाने की होड़ के कारण बढ़ गई थी। जब हर देश ने आयात घटाया, तो उसका असर दुनियाभर में निर्यात घटने के रूप में भी सामने आया था और समूची आर्थिक गतिविधि प्रभावित हुई। इस तरह अवमूल्यन की होड़ और ऊंचे सीमा शुल्क के दुष्चक्र में विश्व अर्थव्यवस्था फंस गई थी। दुनिया को मुद्रा के मूल्य घटाने की होड़ में शामिल होने से परहेज करना चाहिए, क्योंकि यह सुस्त होती चीनी ग्रोथ का असर कई गुना बढ़ा देगी और इसके कारण भीषण मंदी का दौर शुरू हो सकता है। जाहिर है, चीन की ग्रोथ सुस्त होने भर से हो सकता है कि दुनिया में मंदी न आए, लेकिन करंसी वार से ऐसा जरूर हो जाएगा।

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