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सवाल राजनीति के अपराधीकरण का

एडीआर संस्था के अनुसार देश में 30 प्रतिशत से अधिक जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध विभिन्न अदालतों में आपराधिक मुकदमे लंबित हैं

सवाल राजनीति के अपराधीकरण का
नई दिल्‍ली. राजनीति के अपराधीकरण का मुद्दा भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी समस्या के रूप में आज हमारे सामने खड़ा है। गुजरते समय के साथ संसद और विभिन्न राज्यों के विधानसभाओं में दागियों की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में राजनीति से इस व्याधि को दूर करने की मुहिम में लोकतंत्र के चारों स्तंभों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस समस्या से छुटकारा दिलाने के लिए बार-बार सक्रियता दिखाई है। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट की एक संवैधानिक पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को सलाह दी कि वे ऐसे जनप्रतिनिधियों को मंत्री ना बनाएं, जिनके खिलाफ आपराधिक आरोप तय हो गए हों।
पीठ ने यह स्पष्ट किया है कि किसी सांसद या विधायक को कैबिनेट में शामिल करना या नहीं करना प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का संवैधानिक विशेषाधिकार है, लिहाजा कोर्ट किसी की नियुक्ति को खारिज करने के संबंध में कोई आदेशात्मक निर्देश नहीं दे सकता। बल्कि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री से यह उम्मीद की जाती है कि वे किसी दागी को अपने मंत्रिमंडल में शामिल नहीं करेंगे। दरअसल, याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में कैबिनेट से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले मंत्रियों को हटाने की मांग की थी। गत वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि दो साल या उससे अधिक की सजा होने पर जनप्रतिनिधियों की सदस्यता स्वत: रद्द हो जाएगी और वे चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। लालू प्रसाद यादव और रशीद मसूद इसके शिकार भी हुए।
एक दूसरे फैसले में कोर्ट ने कहा था कि निचली अदालतों को सांसदों एवं विधायकों पर चल रहे आपराधिक मुकदमों का निपटारा आरोप-पत्र दाखिल होने के साल भर के भीतर करना होगा। और यदि नहीं कर पाए तो कारण बताना होगा। अकसर देखा जाता हैकि अदालतों पर मुकदमों के भारी बोझ के कारण ऐसे मामले सालों तक लटके रहते हैं। जिसकी वजह से सांसद और विधायक आरोपी बनाए जाने के बाद भी वर्षों तक पद पर बने रहते हैं। विधि आयोग ने भी अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि सदस्यता रद्द करने का निर्णय मुकदमों के लंबे समय तक लंबित रहने के कारण प्रभावी नहीं हो पा रहा है।
इस संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुझाव दिया था कि सभी दागियों से जुड़े मुकदमों की सुनवाई त्वरित अदालतों में करते हुए साल भर के अंदर पूरी की जानी चाहिए। ताकि जो दोषी हैं, उन्हें सजा मिले और जो निर्दोष हैं, उन्हें आरोपों से मुक्त किया जा सके, परंतु सुप्रीम कोर्ट ने इसे नहीं माना। हालांकि मुकदमों की जल्दी सुनवाई की व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि आज देश में शायद ही कोई राजनीतिक दल होगा जिसमें दागी नेता नहीं हों और उन पर आपराधिक मुकदमे नहीं चल रहे हों।
एडीआर संस्था के अनुसार देश में 30 प्रतिशत से अधिक जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध विभिन्न अदालतों में आपराधिक मुकदमे लंबित हैं, जिनमें से आधे से अधिक गंभीर प्रकृति के अपराधों से संबंधित हैं। यह निष्कर्ष स्वयं सांसदों और विधायकों द्वारा चुनाव आयोग के समक्ष जमा शपथ-पत्रों के आधार पर निकाला गया है। यह स्थिति स्वस्थ लोकतंत्र के लिए कतई शुभ संकेत नहीं है। यह सही नहीं कि जिनके खिलाफ गंभीर धाराओं में मामले दर्ज हैं, वही शासन चलाएं। यदि ऐसा होगा तो लोकतंत्र कहां बचेगा?
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