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पूर्वोत्तर में विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा समझौता

यह समझौता पूर्वोत्तर में शांति और सौहार्द स्थापित करने में सहायक होगा।

पूर्वोत्तर में विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा समझौता
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नेशनल सोशल काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन-इसाक मुइवा) और केंद्र सरकार के बीच शांति समझौता होना पूर्वोत्तर के लिए एक ऐतिहासिक कामयाबी है। ऐसा कर नगा अलगाववादियों के एक बड़े गुट को केंद्र सरकार ने मुख्य धारा में ला दिया है। इससे देश की सबसे पुरानी अलगाववादी समस्या खत्म होगी ही, आंतरिक और बाह्य सुरक्षा में मजबूती आने से सीमावर्ती इलाके पर भारत की पकड़ भी मजबूत होगी। इस समझौते से पूर्वोत्तर खासकर नागालैंड के लोगों का भी भला होगा, क्योंकि वहां शांति आएगी।

सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि नगा अलगाववाद की छह दशक पुरानी समस्या को हल करने के बाद अब दूसरे विद्रोही संगठन जो हिंसा का रास्ता अपनाए हुए हैं, उन्हें भी सही रास्ते पर आने की प्रेरणा मिलेगी। उन्होंने माना कि नगा समस्या को खत्म होने में इतना समय इसलिए लगा, क्योंकि हम एक दूसरे की विशिष्टताओं को समझने के लिए तैयार नहीं थे। ब्रिटिश राज ने इसके बीज बोए थे। उन्होंने फूट डालो और शासन करो की नीति के तहत नगा लोगों में बाकी देश के बारे में भ्रांतियां फैलाई और बाकी हिस्सों में नगा लोगों के बारे में भ्रम फैलाया।

पिछले साल केंद्र में मोदी सरकार के आने बाद से ही पूर्वोत्तर के विकास पर काफी जोर दिया जा रहा है। विकास कायरें में तेजी लाने के लिए बाकायदा अलग से एक मंत्रालय भी बनाया गया है। ऐसे में पूवरेत्तर में अमन कायम करना बहुत जरूरी है। इसके लिए पूर्वोत्तर के उग्रवादी गुटों से संवाद कायम कर उन्हें मुख्य धारा में लाने की कवायद करनी ही होगी। नई सरकार इस दिशा में काफी सोच समझकर आगे बढ़ती दिख भी रही है।

दरअसल, आजादी के बाद से ही नगा के करीब आधा दर्जन जनजाति मिलकर नगालिंगम नाम से अलग देश की मांग कर रहे थे। वे नागालैंड और आसपास के इलाके में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ नागालैंड के नाम से अपनी स्वायत्त सरकार भी चला रहे थे। उनका कहना था कि वे कभी भारत का हिस्सा नहीं बनेंगे। यही वजह है कि वे भारत सरकार के खिलाफ लंबे समय तक हिंसक युद्ध करते रहे। इसमें उन्हें चीन और म्यांमार से मदद भी मिली, लेकिन समय के साथ-साथ हालात बदले। बाद में दूसरे देशों से मदद मिलनी बंद हो गई।

स्थानीय जनता का भी सर्मथन मिलना कम हो गया। उन्हें लगने लगा कि वे सशस्त्र लड़ाई में सफल नहीं हो सकते। लिहाजा वे वार्ता के जरिए इस समस्या को हल करने के लिए आगे आए। इस दिशा में पहला मील का पत्थर 1997 का संघर्ष विराम समझौता रहा। उसके बाद से लगातार बातचीत चलती रही और आपसी विश्वास बढ़ता गया। अब इस समझौते के जरिए इस भरोसे को औपचारिक रूप प्रदान किया गया है।

यह समझौता पूर्वोत्तर में शांति और सौहार्द स्थापित करने में सहायक होगा। दरअसल, पूवरेत्तर के राज्यों में जितनी भी उग्रवादी गतिविधियां चल रही हैं, सबको कहीं न कहीं नगालैंड के विद्रोहियों की मदद मिलती रही है। पूर्वी एशिया के देशों से संबंध मधुर बनाने की एक्ट ईस्ट नीति भी तभी रफ्तार पकड़ेगी जब पूवरेत्तर में शांति हो। वहीं एनएससीएन (खपलांग) गुट इस समझौते से दूर रहा है। जाहिर है, अभी वह सुरक्षा की दृष्टि से चुनौती बना रहेगा।

हाल ही में इस गुट ने मणिपुर में 18 जवानों की हत्या कर दी थी। हालांकि, भारत ने उस पर शिकंजा कसना आरंभ कर दिया है। उम्मीद है कि देर सबेर वह भी हाथ आ जाएगा। इस प्रकार छह दशक पुराने उग्रवाद का राजनीतिक हल निकालने में मिली सफलता नक्सलवादियों सहित दूसरे उग्रवादी गुटों के लिए भी सबक है।

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