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आप पर अपने सिद्धांतों से दूर होने का आरोप

केजरीवाल पर आरोप लगने लगे कि मीडिया में चर्चा में बने रहने के लिए ही वे ऐसे हथकंडे अपना रहे हैं।

आप पर अपने सिद्धांतों से दूर होने का आरोप
नई दिल्ली. जिन सिद्धांतों या विचारों पर कोई पार्टी या संगठन का वजूद टिका होता है, यदि वे ही दरकने लगें या पार्टी उनसे अलग दूसरा रास्ता अख्तियार कर ले तो उसका क्षरण तय मानिए। अब तक जितने भी लोगों ने करीब डेढ़ साल पहले वजूद में आई आम आदमी पार्टी का दामन छोड़ा है सबका यही आरोप हैकि पार्टी अपने सिद्धांतों से भटक गई है। शनिवार को आप की संस्थापक सदस्य शाजिया इल्मी और कैप्टन गोपीनाथ ने यही आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ी कि उसमें आंतरिक लोकतंत्र नहीं रह गया है। पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र न होने की बात कहते हुए ही दिल्ली के विधायक विनोद कुमार बिन्नी भी आप से दूर गए थे। इससे पहले पूर्व राजनयिक मधु भादुड़ी और अश्विनी उपाध्याय भी इसी तरह के आरोप लगाते हुए आप को छोड़ चुके हैं।
प्रख्यात नृत्यांगना मल्लिका साराभाई सहित कईलोगों ने भी कुछ ऐसे ही कारणों से आप से दूरी बना ली है। अरविंद केजरीवाल देश में स्वराज लाने की बात करते हैं और पार्टी में ही यदि स्वराज नहीं है तो यह चिंता की बात है। जब संस्थापक सदस्य दूरी बना रहे हैं तो भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन की कोख से पैदा हुई इस पार्टी में कहीं कुछ गड़बड़ी तो जरूर है। यदि पार्टी को जिंदा रखना है तो उसके सभी नेताओं को इस पर गंभीरता से सोचने की दरकार है। गत वर्ष दिसबंर में दिल्ली विधानसभा चुनावों में जिस तरह से पार्टी को अप्रत्याशित सफलता मिली थी, उसके बाद से लोगों को लगा था कि देश में एक नई तरह की राजनीति का आगाज हो गया है। जो परंपरागत राजनीति और उसके कारण भारतीय लोकतंत्र में समा गई बुराइयों के अंत का कारण बनेगी। दिल्ली की जनता ने बड़ी उम्मीद से वोट दिए थे परंतु कुछ राजनीतिक अपरिपक्वता और कुछ गलत फैसलों ने पार्टी के सामने कई समस्याएं खड़ी कर दी हैं।
अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में सरकार बनाई और 49 दिनों में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर चुनावों के दौरान उन्होंने जो वादे किए थे, उसे पूरा करने का सुनहरा मौका गवां दिया। माना जा रहा हैकि वहीं से लोगों का उनसे मोहभंग होने लगा। लोकसभा चुनावों में करारी हार उसी का नतीजा है। रही सही कसर उसके बाद के घटनाक्रमों ने पूरी कर दी। आम आदमी पार्टी ने राजनीति का जो रास्ता पकड़ा उससे कानून और संवैधानिक संस्थाओं के साथ बेजा टकराव और अराजकता का माहौल बनने लगा। देश में आरोप प्रत्यारोप की राजनीति का दौर शुरू हो गया।
केजरीवाल पर आरोप लगने लगे कि मीडिया में चर्चा में बने रहने के लिए ही वे ऐसे हथकंडे अपना रहे हैं। बनारस में नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने को भी इसी रूप में लिया गया। इन दिनों वे नितिन गडकरी से जुड़े मानहानि के मामले में न्यायिक हिरासत में हैं। हालांकि जेल वे अपनी र्मजी से गए हैं। आरोप लग रहे हैं कि उनका मकसद इससे चर्चामें बने रहना और सियासी लाभ लेना है पर इस चक्कर में वे पूरी तरह एक्सपोज हो गए हैं। न तो चर्चा में हैं और ना ही लोगों की सहानुभूति उनके साथ है। उनका यह कदम उनके साथी नेताओं को भी रास नहीं आ रहा है और पार्टी छोड़कर जा रहे हैं। आप को यह तय करना होगा कि उसे टकराव की राजनीति ही करनी है, जिसका हर्श सामने है या सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ना है। क्योंकि लोग अब बार-बार धरना, प्रदर्शन की राजनीति से ज्यादा विकास की राजनीति की अपेक्षा रखते हैं।
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