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डा. आलोक पुराणिक का लेेख : अर्थशास्त्र बनाम राजनीति

पेट्रोल की कीमतों का अर्थशास्त्र यह है कि पेट्रोल की जो कीमत उपभोक्ता चुकाता है, उसका करीब 60 फीसदी तो सिर्फ कर ही होता है। उपभोक्ता द्वारा दिये जानेवाले सौ रुपये में से औसतन 37 रुपये की कर वसूली केंद्र सरकार कर लेती है और करीब 23 फीसदी की कर वसूली राज्य सरकारें करती हैं। कर पूर्व पेट्रोल की कीमत तो 40 रुपये ही होती है। अगर केंद्र सरकार औऱ राज्य सरकारों अपनी जेब की चिंता छोड़ दें, तो उपभोक्ता को सस्ता पेट्रोल वगैरह मिल सकता है। पेट्रोल डीजल के भाव अगर लगातार बढ़ते ही रहे, तो महंगाई का मामला गंभीर हो जायेगा। बहरहाल, सरकार को चाहिए कि वह करों में कटौती कर आम जनता को पेट्रोल-डीजल में राहत दे। महंगाई पर भी लगाम लगेगी।

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पेट्रोल- डीजल 

डा. आलोक पुराणिक

पेट्रोल कीमतों के मामले में शतक लगा रहा है, यानी सौ रुपये लीटर के आसपास। पीछे से छीजल की कीमतें भी तेजी से बढ़ रही हैं। उधर, इस पर राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। केंद्र सरकार पर विपक्षी दलों ने निशाना साधा है, तो प्रधानमंत्री मोदी ने इस स्थिति की जिम्मेदारी पूर्ववर्ती सरकारों पर डाल दी है। पीएम मोदी ने हाल में एक संबोधन में कहा कि देश अपनी तेल जरूरतों का 85 फीसदी से ज्यादा आयात करता है और गैस जरूरतों का भी 53 प्रतिशत से ज्यादा आयात करता है। अगर वक्त रहते हालात पर ध्यान दिया गया होता, तो आज मध्यमवर्ग को पेट्रोल की बढ़ती कीमतों का भार ना उठाना पड़ता। गन्ने से निकाले गये एथानोल को पेट्रोल के साथ मिलाकर ईंधन की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। वर्तमान में 8.5 फीसदी पेट्रोल एथानोल है, इस अनुपात को 2025 तक बीस फीसदी करने की योजना है।

इस किस्म के लक्ष्य दूरगामी लक्ष्य हैं, जबकि उपभोक्ता की जेब अभी ही हल्की हुई जा रही है। अभी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव 63 डॉलर प्रति बैरल चले जाने से पेट्रोल व डीजल के दाम बढ़े हैं। केंद्र व राज्य सरकारें अपने अपने टैक्स में भी कटौती नहीं कर रही हैं, इससे भी राहत नहीं मिल पा रही है। पेट्रोल की कीमतों का अर्थशास्त्र यह है कि पेट्रोल की जो कीमत उपभोक्ता चुकाता है, उसका करीब 60 फीसदी तो सिर्फ कर ही होता है। उपभोक्ता द्वारा दिये जानेवाले सौ रुपये में से औसतन 37 रुपये की कर वसूली केंद्र सरकार कर लेती है और करीब 23 फीसदी की कर वसूली राज्य सरकारें करती हैं। कर पूर्व पेट्रोल की कीमत तो 40 रुपये ही होती है। कुल मिलाकर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों का स्वार्थ यह है कि अपना खजाना भरा जाये। तमाम राज्यों की कांग्रेस सरकारें जब केंद्र सरकार पर महंगाई का आऱोप लगाती हैं, तब वो यह भूलती प्रतीत होती हैं कि वे चाहें, तो अपने स्तर के करों में कटौती करके जनता को राहत दे सकती हैं, पर यह कर पाना मुश्किल काम है। उधर केंद्र सरकार के सामने भी यही मुश्किल है। संसाधनों का संकट गहरा है ऐसी सूरत में अपने स्तर के कर छोड़ पाना केंद्र सरकार के लिए भी मुश्किल होता है। केंद्र सरकार के जो आर्थिक स्वार्थ हैं और वही आर्थिक स्वार्थ राज्य सरकारों के भी है। अपने-अपने स्वार्थों को ये सरकारें छोड़ पायेंगी या कम करेंगी, तभी कीमतें कम होने की गुंजाइश बन सकती है।

पश्चिम बंगाल की सरकार दिल्ली के भावों पर क्या टिप्पणी कर सकती है, जब कलकत्ता में पेट्रोल के भाव दिल्ली के मुकाबले ज्यादा महंगे हैं। महाराष्ट्र की शिवसेना सरकार मुंबई के 96.62 रुपये के भावों पर चिंता व्यक्त कर सकती है, पर उसका खंडन के लिए भाजपा के नेता खड़े हैं कि महाराष्ट्र की सरकार चाहे तो अपने हिस्से के टैक्स कम कर दे। करों को कम करके डीजल पेट्रोल की महंगाई कम हो सकती है। यह तो बहुत आसान अर्थशास्त्र है, पर स्वार्थों का अर्थशास्त्र जटिल होता है। ना राज्य सरकार ना केंद्र सरकार संसाधनों के एक महत्वपूर्ण स्रोत को अवरुद्ध करना चाहती है।

अगर केंद्र सरकार औऱ राज्य सरकारों अपनी जेब की चिंता छोड़ दें, तो उपभोक्ता को सस्ता पेट्रोल वगैरह मिल सकता है। पर ऐसा कर पाना संभव नहीं है। कोरोना के बाद केंद्र सरकार और राज्य सरकारें संसाधनों के संकट से जूझ रही हैं। ऐसे में राजनीतिक बयानबाजी चाहे जितनी हो जाए, पेट्रोल आदि के भाव नीचे आने के आसार नहीं हैं। ना राज्य सरकारें और न ही केंद्र सरकार अपने संसाधनों के स्त्रोत को अवरुद्ध करना चाहेंगी। इसलिए अगर राजस्थान से आवाज उठती है कि पेट्रोल के भाव कम करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है, तो केंद्र सरकार के राजनीतिक प्रवक्ता सलाह दे डालते हैं कि राजस्थान की सरकार अपने करों को कम कर दे। इसलिए कुल मिलाकर पेट्रोल और संबंधित उत्पादों पर राजनीति तेज हो सकती है, पर उनके भावों में कमी आने के कोई आसार नहीं हैं। पर महत्वपूर्ण मसला यह है कि पेट्रोल आदि के भाव अगर लगातार बढ़ते ही रहे, तो महंगाई का मामला गंभीर हो जायेगा। पेट्रोल डीजल की महंगाई हर वस्तु और सेवा के भाव को महंगा कर देती है, क्योंकि परिवहन लागत का तत्व तो हर वस्तु और सेवा में होता है। तो कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था को और ज्यादा महंगाई के लिए तैयार हो जाना चाहिए।

1.72 लाख कमाए थे केंद्र ने 2014-15 में पेट्रोलियम पदार्थों पर उत्पाद शुल्क से, 3.34 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया यह आंकड़ा 2019-20 में। 43% बढ़ी राज्यों को वैट लगाने से होने वाली कमाई पांच साल में। इसलिए पेट्रोल डीजल के भावों पर राजनीतिक बयानबाजी करना बहुत आसान है, पर इससे हो रही कमाई का लोभ छोड़ पाना किसी राज्य सरकार के लिए मुमकिन नहीं है। सो उपभोक्ताओं को यह मानकर चलना चाहिए कि अब पेट्रोल डीजल के भावों में राहत मिल पाना संभव नहीं है।

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि इलेक्ट्रीक व्हीकल लेकर आ रहे हैं। बिना डीजल पेट्रोल के भी काम चलेगा। लोगों को साइकिल का ट्रेंड शुरू करना चाहिए, आस-पास अगर ऑफिस है तो, इससे लोग हेल्दी रहेंगे। भारत में बिजली चालित वाहन आयें, तो पेट्रोल जनित महंगाई का प्रकोप कम हो, पर यह कहना आसान है, इस बात को जमीन पर उतारना आसान नहीं है। बिजली से चलने वाले वाहनों में अभी बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनियों ने ठोस दिलचस्पी नहीं दिखायी है। फिर बिजली से चलनेवाले वाहनों के लिए सिर्फ वाहन की आवश्यकता नहीं है, बिजली के वाहनों की चार्जिंग के लिए जगह-जगह पर व्यवस्थाएं करनी पड़ेंगी। ये व्यवस्थाएं फिलहाल नहीं दिखायी पड़ रही हैं। बिना ठोस व्यवस्थाओं के बिजली के वाहनों का मुख्यधारा में आना संभव नहीं है। ऑटोमोबाइल कंपनियां फिलहाल बिजली वाहनों के लिए तैयार नहीं दिखतीं। उनके भारी निवेश पुराने टाइप के वाहन बनाने में हैं। बिजली के वाहनों की तरफ आना उनके लिए आसानी से संभव ना होगा। इसलिए बिजली की वाहनों का बातें हैं, और ऐसी बातें हैं, जो फिलहाल दूर की ही बातें हैं।

पेट्रोल डीजल के भावों में महंगाई का आशय है कि देर सबेर तमाम वस्तुओं और सेवाओं के भाव बढ़ेंगे, यानी खुदरा स्तर पर महंगाई बढ़ने के आसार हैं। यहां से नयी किस्म की चिंताएं शुरू होती हैं। खुदरा महंगाई के बढ़ने पर रिजर्व बैंक चिंतित होता है और फिर रिजर्व बैंक की चिंताओं का मतलब है कि फिर ब्याज दरों में गिरावट की संभावनाएं कम होती जाती हैं। रिजर्व बैंक का आकलन यही होता है कि अगर ब्याज दर गिरायी गयी, तो खरीदना सस्ता हो जायेगा, खरीदना सस्ता हुआ, मांग बढ़ी तो फिर महंगाई बढ़ जायेगी। इसलिए महंगे होते पेट्रोल के दौर में ब्याज दरों का कम होना मुश्किल होता जायेगा। पेट्रोल के भाव सिर्फ पेट्रोल के भाव ही नहीं होते अंतत वो ब्याज दरों पर भी असर डालते हैं। बहरहाल, सरकार को चाहिए कि वह करों में कटौती कर आम जनता को पेट्रोल-डीजल में राहत दे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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